मेरो मन अनत कहाँ सुख पावै
Mero Man Anat Kahan Sukh Pave
Surdas (16th c.) · pad no. ४ as quoted by Hariaudh
Original (Braj Bhasha)
मेरो मन अनत कहाँ सुख पावै। जैसे उड़ी जहाज को पच्छी फिरि जहाजपै आवै। कमल नयन को छाडि महातम और देव को ध्यावै। पुलिन गंग को छाडि पियासो दुरमति कूप खनावै। जिन मधुकर अंबुज रस चाख्यो क्यों करील फलखावै। सूरदास प्रभु काम धेनु तजि छेरी कौन दुहावै।
सरल हिंदी भावार्थ
ड्राफ़्ट · समीक्षा बाकी (draft, under review)मेरा मन (भगवान को छोड़कर) और कहाँ सुख पा सकता है? जैसे जहाज़ से उड़ा हुआ पक्षी (समुद्र में कहीं ठिकाना न पाकर) फिर जहाज़ पर ही लौट आता है। कमल-नयन (श्रीकृष्ण) की महिमा छोड़कर कोई दूसरे देवता का ध्यान क्यों करे? गंगा का किनारा छोड़कर कोई मूर्ख ही प्यासा होकर कुआँ खोदेगा। जिस भौंरे ने कमल का रस चखा हो, वह करील के फल क्यों खाएगा? सूरदास कहते हैं — प्रभु रूपी कामधेनु गाय को छोड़कर बकरी कौन दुहेगा?
🔊 हिंदी अर्थ / Hindi meaning
AI voice (Indic Parler-TTS, Apache-2.0) reading the Hindi meaning.
English meaning
No public-domain English translation added yet.
AI-assisted simple meaning (सरल भावार्थ) based only on the public-domain sources listed; under review.