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सोलह सोमवार व्रत

Solah Somvar Vrat (16 Mondays)

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Overview · परिचय

सोलह सोमवार व्रत में लगातार सोलह सोमवार शिव-पार्वती की पूजा, कथा-श्रवण और एक समय भोजन किया जाता है; सत्रहवें सोमवार को उद्यापन होता है। परंपरा में इसका प्रसाद आटे, घी और गुड़ से बनता है।

Folk vrata kathā (लोक कथा): it has no known Sanskrit original, so none is shown. The story below is our own simple-Hindi retelling of the traditional tale (not copied from any printed edition). Draft, under review.

सोलह सोमवार व्रत कथा (लोक कथा)

लोक कथा · folk kathā (no Sanskrit original)हमारे शब्दों में · draft, under review

यह लोक कथा है — इसका कोई संस्कृत मूल ज्ञात नहीं है, इसलिए संस्कृत नहीं दिखाई गई। कथा अलग-अलग क्षेत्रों में थोड़े अंतर से कही जाती है; यहाँ पारंपरिक कथा हमारे अपने सरल शब्दों में है (किसी छपी पुस्तक से नकल नहीं)। अपने परिवार की परंपरा के अनुसार पढ़ें। draft, समीक्षा बाकी।

कथा (10 अंश)
  1. [1] एक बार शिव जी और माता पार्वती घूमते हुए अमरावती नगरी के एक सुंदर शिव मंदिर में ठहरे। पार्वती जी ने समय बिताने के लिए चौपड़ खेलने का मन बनाया।

  2. [2] मंदिर के पुजारी से पार्वती जी ने पूछा, "बताओ, इस खेल में कौन जीतेगा?" पुजारी ने बिना सोचे कह दिया, "शिव जी जीतेंगे।" खेल में पार्वती जी जीतीं, और झूठी बात कहने पर उन्होंने पुजारी को कोढ़ी होने का शाप दे दिया।

  3. [3] पुजारी बहुत दुखी रहने लगा। एक दिन स्वर्ग की कुछ अप्सराएँ वहाँ आईं और उसकी दशा देखकर उसे सोलह सोमवार का व्रत करने को कहा, और उसकी विधि भी बताई।

  4. [4] पुजारी ने श्रद्धा से सोलह सोमवार व्रत किया और शिव जी की कृपा से पूरी तरह स्वस्थ हो गया। कुछ समय बाद शिव-पार्वती फिर आए; पार्वती जी ने उसे स्वस्थ देखकर कारण पूछा, और पुजारी ने व्रत की महिमा बताई।

  5. [5] पार्वती जी ने भी यह व्रत किया, ताकि उनसे रूठे हुए पुत्र कार्तिकेय लौट आएँ। व्रत के प्रभाव से कार्तिकेय माँ के पास लौट आए।

  6. [6] कार्तिकेय ने यह व्रत अपने बिछड़े मित्र ब्राह्मण से मिलने के लिए किया, और वह मित्र उनसे आ मिला। उस मित्र ने भी विवाह की इच्छा से यह व्रत किया।

  7. [7] वह ब्राह्मण घूमते हुए एक राज्य में पहुँचा, जहाँ राजकुमारी का स्वयंवर था। राजा ने तय किया था कि हथिनी जिसके गले में माला डालेगी, उसी से राजकुमारी का विवाह होगा। शिव जी की कृपा से हथिनी ने उसी ब्राह्मण के गले में माला डाल दी।

  8. [8] विवाह के बाद राजकुमारी ने पूछा कि ऐसा भाग्य कैसे मिला। ब्राह्मण ने सोलह सोमवार की बात बताई। राजकुमारी ने पुत्र की कामना से व्रत किया और उन्हें गुणवान पुत्र हुआ; बड़ा होकर वह पुत्र भी व्रत के प्रभाव से राजा बना।

  9. [9] उस राजा की रानी ने व्रत का अनादर किया, तो उसे महल से निकलना पड़ा और बहुत कष्ट झेलने पड़े। अपनी भूल समझकर उसने श्रद्धा से व्रत किया, और शिव जी की कृपा से फिर सम्मान के साथ राजमहल लौटी।

  10. [10] कथा का भाव है: जो कोई भी सच्चे मन से सोलह सोमवार का व्रत करता है और कथा सुनता है, भगवान भोलेनाथ उसकी मनोकामना पूरी करते हैं। बोलो उमापति महादेव की जय।

Not yet included (TODO)

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  • Āratī text
  • Audio (Hindi/Sanskrit): coming soon
  • Priest / family-tradition review