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श्री सत्यनारायण व्रत

Shri Satyanarayan Vrat (Puja & Katha)

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Overview · परिचय

सत्यनारायण व्रत भगवान विष्णु के सत्यनारायण रूप की पूजा और कथा है। कथा के अनुसार इसे किसी भी दिन शाम को, परिवार और ब्राह्मणों के साथ किया जा सकता है; कथा में पूर्णिमा और संक्रांति का भी उल्लेख है।

What we can source so far is the vrata's own short vidhi, found in chapter 1 of the kathā (verses 18–24), plus the kathā itself. A detailed step-by-step pūjā (kalaśa, Ganapati, navagraha, ṣoḍaśopacāra with mantras) still needs a public-domain paddhati (TODO).

Samagri · सामग्री

  • नैवेद्य (सवाया): केला, घी, दूध, गेहूँ का आटा (या चावल का आटा), शक्कर या गुड़
  • ब्राह्मण के लिए दक्षिणा

Only what chapter 1, verses 20–22 names.

Step by step · पूजा क्रम

सरल हिंदी: AI-assisted simple text based only on the original text — draft, under review.

1. कब करें · When

यस्मिन् कस्मिन्दिने मर्त्यो भक्तिश्रद्धासमन्वितः ॥ १८ ॥ सत्यनारायणं देवं यजेच्चैव निशामुखे । ब्राह्मणैर्बान्धवैश्चैव सहितो धर्मतत्परः ॥ १९ ॥

yasmin kasmindine martyo bhaktiśraddhāsamanvitaḥ || 18 || satyanārāyaṇaṃ devaṃ yajeccaiva niśāmukhe | brāhmaṇairbāndhavaiścaiva sahito dharmatatparaḥ || 19 ||

सरल हिंदी · draft, under review

यह व्रत किसी भी दिन, भक्ति और श्रद्धा के साथ, शाम के समय (निशामुख) किया जा सकता है — ब्राह्मणों और बंधु-बांधवों के साथ, धर्म में लगे रहकर।

🔊 हिंदी अर्थ / Hindi meaning

AI voice (Indic Parler-TTS, Apache-2.0) reading the Hindi meaning.

Note: Wikisource reads ‘बान्धबैश्चैव’ (typo for बान्धवैश्चैव); corrected. Chapter 4 (v. 43) also mentions worship on pūrṇimā and saṅkrānti.

2. नैवेद्य (प्रसाद) · Naivedya (prasad)

नैवेद्यं भक्तितो दद्यात्सपादं भक्तिसंयुतम् । रम्भाफलं घृतं क्षीरं गोधूमस्य च चूर्णकम् ॥ २० ॥ अभावे शालिचूर्णं वा शर्करा च गुडस्तथा । सपादं सर्वभक्ष्याणि चैकीकृत्य निवेदयेत् ॥ २१ ॥

naivedyaṃ bhaktito dadyātsapādaṃ bhaktisaṃyutam | rambhāphalaṃ ghṛtaṃ kṣīraṃ godhūmasya ca cūrṇakam || 20 || abhāve śālicūrṇaṃ vā śarkarā ca guḍastathā | sapādaṃ sarvabhakṣyāṇi caikīkṛtya nivedayet || 21 ||

सरल हिंदी · draft, under review

भक्ति से सवाया (सवा गुना) नैवेद्य चढ़ाएँ — केला, घी, दूध और गेहूँ का आटा; गेहूँ न हो तो चावल का आटा; शक्कर या गुड़। सब खाने की चीज़ें सवा मात्रा में मिलाकर अर्पित करें।

🔊 हिंदी अर्थ / Hindi meaning

AI voice (Indic Parler-TTS, Apache-2.0) reading the Hindi meaning.

Note: Wikisource reads ‘चूर्णाकम्’; standard reading ‘चूर्णकम्’ used.

3. कथा और दक्षिणा · Katha and dakshina

विप्राय दक्षिणां दद्यात्कथां श्रुत्वा जनैः सह । ततश्च बन्धुभिः सार्धं विप्रांश्च प्रतिभोजयेत् ॥ २२ ॥

viprāya dakṣiṇāṃ dadyātkathāṃ śrutvā janaiḥ saha | tataśca bandhubhiḥ sārdhaṃ viprāṃśca pratibhojayet || 22 ||

सरल हिंदी · draft, under review

सब लोगों के साथ कथा सुनकर ब्राह्मण को दक्षिणा दें; फिर बंधुओं के साथ ब्राह्मणों को भोजन कराएँ।

🔊 हिंदी अर्थ / Hindi meaning

AI voice (Indic Parler-TTS, Apache-2.0) reading the Hindi meaning.

4. प्रसाद, कीर्तन, घर लौटना · Prasad, kirtan, return home

प्रसादं भक्षयेद्भक्त्या नृत्यगीतादिकं चरेत् । ततश्च स्वगृहं गच्छेत्सत्यनारायणं स्मरन् ॥ २३ ॥ एवं कृते मनुष्याणां वाञ्छासिद्धिर्भवेद्ध्रुवम् । विशेषतः कलियुगे लघूपायोऽस्ति भूतले ॥ २४ ॥

prasādaṃ bhakṣayedbhaktyā nṛtyagītādikaṃ caret | tataśca svagṛhaṃ gacchetsatyanārāyaṇaṃ smaran || 23 || evaṃ kṛte manuṣyāṇāṃ vāñchāsiddhirbhaveddhruvam | viśeṣataḥ kaliyuge laghūpāyo'sti bhūtale || 24 ||

सरल हिंदी · draft, under review

भक्ति से प्रसाद खाएँ, गीत-नृत्य आदि (कीर्तन) करें, और फिर सत्यनारायण का स्मरण करते हुए अपने घर जाएँ। ग्रंथ कहता है कि ऐसा करने से मनोकामना पूरी होती है, विशेषकर कलियुग में यह सरल उपाय है।

🔊 हिंदी अर्थ / Hindi meaning

AI voice (Indic Parler-TTS, Apache-2.0) reading the Hindi meaning.

Sanskrit audio coming soon.

सत्यनारायण व्रत कथा — सरल सार (५ अध्याय)

सरल हिंदी सार · draft, under review

[अध्याय १] नैमिषारण्य में शौनक आदि ऋषियों ने सूत जी से पूछा कि किस व्रत या तप से मनचाहा फल मिलता है। सूत जी ने बताया कि यही प्रश्न नारद जी ने भगवान विष्णु से पूछा था: नारद जी ने पृथ्वी पर लोगों को अपने कर्मों के कारण दुखी देखा और विष्णुलोक जाकर उपाय पूछा। भगवान ने सत्यनारायण व्रत बताया, जो दुख-शोक मिटाता है, धन-धान्य, सौभाग्य और संतान देता है — और उसकी विधि बताई (ऊपर के चरण)।

[अध्याय २] काशी में एक बहुत गरीब ब्राह्मण भिक्षा के लिए भटकता था। भगवान ने बूढ़े ब्राह्मण का रूप लेकर उसे सत्यनारायण व्रत करने को कहा। उसने व्रत किया और उसका दुख दूर हुआ। उसे व्रत करते देख एक लकड़हारे ने भी व्रत किया और वह भी सुखी हुआ।

[अध्याय ३] राजा उल्कामुख अपनी पत्नी के साथ नदी के तट पर व्रत कर रहे थे। साधु नाम के एक व्यापारी ने पूछकर संतान होने पर व्रत करने का वचन दिया। पुत्री कलावती हुई, पर उसने व्रत टाल दिया; पुत्री के विवाह के बाद भी नहीं किया। व्यापार की यात्रा में वह और उसका दामाद झूठे आरोप में राजा चंद्रकेतु के बंदी बने, और घर पर पत्नी लीलावती व पुत्री दुखी हुईं। कलावती ने एक घर में सत्यनारायण पूजा देखकर माँ को बताया; लीलावती ने व्रत किया। भगवान ने राजा को स्वप्न दिया और दोनों छूट गए।

[अध्याय ४] लौटते समय एक दंडी संन्यासी (सत्यनारायण) ने पूछा कि नाव में क्या है; व्यापारी ने घमंड में कहा ‘बेल और पत्ते’। वही सच हो गया। दंडी की शरण में जाकर क्षमा माँगने पर धन वापस मिला। घर पहुँचने की खबर सुनकर कलावती प्रसाद छोड़कर पति से मिलने दौड़ी, तो उसका पति (नाव सहित) दिखाई देना बंद हो गया। आकाशवाणी सुनकर उसने घर जाकर प्रसाद खाया, लौटी तो पति फिर दिख गया। व्यापारी परिवार सहित पूर्णिमा और संक्रांति को व्रत करता रहा।

[अध्याय ५] राजा तुंगध्वज ने वन में ग्वालों को वट के नीचे सत्यदेव की पूजा करते देखा, पर घमंड में न प्रणाम किया, न उनका दिया प्रसाद लिया, और दुख पाया। फिर लौटकर ग्वालों के साथ पूजा की और प्रसाद लिया, तो सुख पाया। अंत में कथा के फल और पात्रों के अगले जन्मों का वर्णन है।

🔊 हिंदी कथा-सार सुनें

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सम्पूर्ण सत्यनारायण व्रत कथा — मूल संस्कृत (५ अध्याय)

draft · needs pandit proofreading

परंपरा से यह कथा स्कन्द पुराण (रेवा खण्ड) की मानी जाती है — हर अध्याय के अंत में ग्रंथ स्वयं यही कहता है, पर यह स्कन्द पुराण के हर छपे संस्करण में नहीं मिलती। संस्कृत पाठ ज्यों का त्यों (वर्तनी सहित) है; सरल हिंदी अर्थ हमारा अपना है — draft, समीक्षा बाकी।

प्रथम अध्याय (24 श्लोक)

🔈 संस्कृत पाठ / Sanskrit chanting: audio coming soon / ऑडियो जल्द आएगा

  1. ॥अथ-कथा॥ व्यास-उवाच ॥ एकदा नैमिषारण्ये ऋषय: शौनकादय:॥ पप्रच्छुर्मुनय:सर्वे सूतं पौराणिकं खलु॥१॥

    ||atha-kathā|| vyāsa-uvāca || ekadā naimiṣāraṇye ṛṣaya: śaunakādaya:|| papracchurmunaya:sarve sūtaṃ paurāṇikaṃ khalu||1||

    [1.1] व्यास जी बोले: एक बार नैमिषारण्य में शौनक आदि सब ऋषियों ने पुराणों के ज्ञाता सूत जी से पूछा।

  2. ऋषय ऊचु:। व्रतेन तपसा किंवा प्राप्यते वाञ्छितं फलम् ॥ तत्सर्वं श्रोतुमिच्छाम: कथयस्व महामुने॥२॥

    ṛṣaya ūcu:| vratena tapasā kiṃvā prāpyate vāñchitaṃ phalam || tatsarvaṃ śrotumicchāma: kathayasva mahāmune||2||

    [1.2] ऋषियों ने कहा: किस व्रत या तप से मनचाहा फल मिलता है? हे महामुनि, हम यह सब सुनना चाहते हैं, कृपया बताइए।

  3. ॥सूत उवाच॥ नारदेनैव सम्पृष्टो भगवान् कमलापित:॥ सुरर्षये यथैवाह तच्छृणुध्वं समाहिता:॥३॥

    ||sūta uvāca|| nāradenaiva sampṛṣṭo bhagavān kamalāpita:|| surarṣaye yathaivāha tacchṛṇudhvaṃ samāhitā:||3||

    [1.3] सूत जी बोले: यही बात नारद जी ने भगवान लक्ष्मीपति से पूछी थी। भगवान ने उन्हें जो बताया, वह ध्यान से सुनिए।

  4. एकदा नारदो योगी परानुग्रहकाङ्क्षया॥ पर्यटन् विविधान्लोकान् मर्त्यलोकमुपागत:॥४॥

    ekadā nārado yogī parānugrahakāṅkṣayā|| paryaṭan vividhānlokān martyalokamupāgata:||4||

    [1.4] एक बार योगी नारद जी दूसरों की भलाई की इच्छा से अनेक लोकों में घूमते हुए पृथ्वी (मृत्युलोक) पर आए।

  5. ततो दृष्टवा जनान्सर्वान्नानाक्लेशसमन्वितान्॥ नानायोनिसमुत्पन्नान्क्लिश्यमानान् स्वकर्मभि:।५॥

    tato dṛṣṭavā janānsarvānnānākleśasamanvitān|| nānāyonisamutpannānkliśyamānān svakarmabhi:|5||

    [1.5] वहाँ उन्होंने देखा कि लोग अलग-अलग योनियों में जन्म लेकर अपने कर्मों के कारण तरह-तरह के कष्ट भोग रहे हैं।

  6. केनोपायेन चैतेषां दुःखनाशो भवेद ध्रुवम्। इति सञ्चिन्त्य मनसा विष्णुलोकं गतस्तदा॥६॥

    kenopāyena caiteṣāṃ duḥkhanāśo bhaveda dhruvam| iti sañcintya manasā viṣṇulokaṃ gatastadā||6||

    [1.6] "किस उपाय से इनका दुख पक्का दूर हो?" — मन में यह सोचकर नारद जी विष्णुलोक गए।

  7. तत्र नारायणं देवं शुक्लवर्णं चतुर्भुजम्। शङखचक्रगदापद्मवनमालाविभूषितम्॥७॥

    tatra nārāyaṇaṃ devaṃ śuklavarṇaṃ caturbhujam| śaṅakhacakragadāpadmavanamālāvibhūṣitam||7||

    [1.7] वहाँ उन्होंने उजले रंग वाले, चार भुजाओं वाले भगवान नारायण को देखा, जो शंख, चक्र, गदा, कमल और वनमाला से सजे थे।

  8. द्दष्टवा तं देवदेवेशं स्तोतुं समुपचक्रमे ॥ -नारद उवाच॥ नमो वाङमनसातीतरूपायानन्तशक्तये॥८॥

    ddaṣṭavā taṃ devadeveśaṃ stotuṃ samupacakrame || -nārada uvāca|| namo vāṅamanasātītarūpāyānantaśaktaye||8||

    [1.8] देवों के देव को देखकर नारद जी स्तुति करने लगे: "जिनका रूप मन और वाणी से परे है, जिनकी शक्ति अनंत है, उन्हें नमस्कार।"

  9. आदिमध्यान्तहीनाय निर्गुणाय गुणत्मने ॥ सर्वेषामादिभूताय भक्तानामार्तिनाशिने॥९॥

    ādimadhyāntahīnāya nirguṇāya guṇatmane || sarveṣāmādibhūtāya bhaktānāmārtināśine||9||

    [1.9] "जिनका न आदि है, न मध्य, न अंत; जो गुणों से परे होकर भी गुणों के स्वामी हैं; जो सबके मूल हैं और भक्तों का दुख मिटाते हैं, उन्हें नमस्कार।"

  10. श्रुत्वा स्तोत्रं ततो विष्णुर्नारदं प्रत्यभाषत॥ -श्रीभगवानुवाच॥ किमर्थमागतोऽसि त्वं कि ते मनसि वर्तते॥१०॥

    śrutvā stotraṃ tato viṣṇurnāradaṃ pratyabhāṣata|| -śrībhagavānuvāca|| kimarthamāgato'si tvaṃ ki te manasi vartate||10||

    [1.10] स्तुति सुनकर भगवान विष्णु नारद जी से बोले: "तुम किसलिए आए हो? तुम्हारे मन में क्या है?"

  11. कथयस्व महाभाग तत्सर्वं कथयामि ते॥ नारद उवाच॥ मर्त्यलोके जना: सर्वे नानाक्लेशसमन्विता:॥ नानायोनिसमुत्पन्ना:पच्यन्ते पापकर्मभि:॥११॥

    kathayasva mahābhāga tatsarvaṃ kathayāmi te|| nārada uvāca|| martyaloke janā: sarve nānākleśasamanvitā:|| nānāyonisamutpannā:pacyante pāpakarmabhi:||11||

    [1.11] "हे महाभाग, बताओ, मैं तुम्हें सब समझाऊँगा।" नारद जी बोले: "पृथ्वी पर सब लोग तरह-तरह के दुखों से घिरे हैं; अलग-अलग योनियों में जन्म लेकर अपने पापों का फल भोग रहे हैं।"

  12. तत्कथं शमयेन्नाथ लघूपायेन तद्वद॥ श्रोतुमिच्छामि तत्सर्वं कृपास्ति यदि ते मयि॥१२॥

    tatkathaṃ śamayennātha laghūpāyena tadvada|| śrotumicchāmi tatsarvaṃ kṛpāsti yadi te mayi||12||

    [1.12] "हे नाथ, यदि मुझ पर आपकी कृपा है, तो बताइए कि किसी छोटे-से उपाय से उनका दुख कैसे शांत हो। मैं यह सब सुनना चाहता हूँ।"

  13. श्रीभगवानुवाच॥ साधु पृष्टं त्वया वत्स लोकानुग्रहकाङ्क्षया॥ यत्कृत्वा मुच्यते मोहात्तच्छृणुष्व वदामि ते॥१३॥

    śrībhagavānuvāca|| sādhu pṛṣṭaṃ tvayā vatsa lokānugrahakāṅkṣayā|| yatkṛtvā mucyate mohāttacchṛṇuṣva vadāmi te||13||

    [1.13] भगवान बोले: "वत्स, लोगों की भलाई के लिए तुमने बहुत अच्छा प्रश्न पूछा है। जिसे करके मनुष्य मोह से छूट जाता है, वह मैं बताता हूँ, सुनो।"

  14. व्रतमस्ति महत्पुण्यं स्वर्गे मर्त्ये च दुर्लभम् ॥ तव स्नेहान्मया वत्स प्रकाश:क्रियतेऽधुना॥१४॥

    vratamasti mahatpuṇyaṃ svarge martye ca durlabham || tava snehānmayā vatsa prakāśa:kriyate'dhunā||14||

    [1.14] "एक बहुत पुण्य देने वाला व्रत है, जो स्वर्ग और पृथ्वी दोनों पर दुर्लभ है। तुम्हारे स्नेह के कारण आज मैं उसे प्रकट करता हूँ।"

  15. सत्यनारायणस्यैव व्रतं सम्यग्विधानत:॥ कृत्वा सद्य:सुखं भुक्त्त्वापरत्र मोक्षमाप्नुयात्॥१५॥

    satyanārāyaṇasyaiva vrataṃ samyagvidhānata:|| kṛtvā sadya:sukhaṃ bhukttvāparatra mokṣamāpnuyāt||15||

    [1.15] "सत्यनारायण का व्रत ठीक विधि से करने पर मनुष्य यहाँ तुरंत सुख पाता है और आगे चलकर मोक्ष पाता है।"

  16. तच्छुत्वा भगवद्वाक्यं नारदो मुनिरब्रवीत्॥ नारद उवाच ॥ किम्फलं किंविधानञ्च कृतं केनैव तद् व्रतम्॥१६॥

    tacchutvā bhagavadvākyaṃ nārado munirabravīt|| nārada uvāca || kimphalaṃ kiṃvidhānañca kṛtaṃ kenaiva tad vratam||16||

    [1.16] भगवान की बात सुनकर नारद मुनि बोले: "उस व्रत का फल क्या है, उसकी विधि क्या है, और उसे किसने किया है?"

  17. तत्सर्वं विस्तराद् ब्रूहि कदा कार्यं हि तद व्रतम्॥ दुःखशोकादिशमनं धनधान्यप्रवर्धनम्॥१७॥

    tatsarvaṃ vistarād brūhi kadā kāryaṃ hi tada vratam|| duḥkhaśokādiśamanaṃ dhanadhānyapravardhanam||17||

    [1.17] "यह सब विस्तार से बताइए, और यह व्रत कब करना चाहिए?" (भगवान बोले:) "यह दुख-शोक मिटाता है, धन-धान्य बढ़ाता है,"

  18. सौभाग्यसन्ततिकरं सर्वत्र विजयप्रदम्। यस्मिन् कस्मिन्दिने मर्त्यो भक्तिश्रद्धासमन्वित:।१८॥

    saubhāgyasantatikaraṃ sarvatra vijayapradam| yasmin kasmindine martyo bhaktiśraddhāsamanvita:|18||

    [1.18] "सौभाग्य और संतान देता है, और हर जगह विजय दिलाता है। मनुष्य किसी भी दिन भक्ति और श्रद्धा के साथ,"

  19. सत्यनारायणं देवं यजेच्चैव निशामुखे॥ ब्राह्मणैर्बान्धबैश्चैव सहितो धर्मतत्पर:॥१९॥

    satyanārāyaṇaṃ devaṃ yajeccaiva niśāmukhe|| brāhmaṇairbāndhabaiścaiva sahito dharmatatpara:||19||

    [1.19] "शाम के समय, धर्म में मन लगाकर, ब्राह्मणों और अपने परिवार-संबंधियों के साथ सत्यनारायण देव की पूजा करे।"

  20. नैवेद्यं भक्तितो दद्यात्सपादं भक्तिसंयुतम्॥ रम्भाफलं घृतं क्षीरं गोधूमस्य च चूर्णाकम्॥२०॥

    naivedyaṃ bhaktito dadyātsapādaṃ bhaktisaṃyutam|| rambhāphalaṃ ghṛtaṃ kṣīraṃ godhūmasya ca cūrṇākam||20||

    [1.20] "भक्ति से सवा (सवाया) मात्रा में नैवेद्य चढ़ाए: केला, घी, दूध और गेहूँ का आटा।"

  21. अभावे शालिचूर्णं वा शर्करा च गुडस्तथा। सपादं सर्वभक्ष्याणि चैकीकृत्य निवेदयेत्॥२१॥

    abhāve śālicūrṇaṃ vā śarkarā ca guḍastathā| sapādaṃ sarvabhakṣyāṇi caikīkṛtya nivedayet||21||

    [1.21] "गेहूँ का आटा न हो तो चावल का आटा, और शक्कर या गुड़ लें। सब खाने योग्य चीज़ें सवाया मात्रा में मिलाकर भोग लगाएँ।"

  22. विप्राय दक्षिणां दद्यात्कथां श्रुत्वा जनै: सह॥ ततश्च बन्धुभि: सार्धं विप्रांश्च प्रतिभोजयेत्॥२२॥

    viprāya dakṣiṇāṃ dadyātkathāṃ śrutvā janai: saha|| tataśca bandhubhi: sārdhaṃ viprāṃśca pratibhojayet||22||

    [1.22] "सबके साथ कथा सुनकर ब्राह्मण को दक्षिणा दें, फिर परिवार के साथ ब्राह्मणों को भोजन कराएँ।"

  23. प्रसादं भक्षयेद्भक्त्या नृत्यगीतादिकं चरेत् ॥ ततश्च स्वगृहं गच्छेत्सत्यनारायणं स्मरन्॥२३॥

    prasādaṃ bhakṣayedbhaktyā nṛtyagītādikaṃ caret || tataśca svagṛhaṃ gacchetsatyanārāyaṇaṃ smaran||23||

    [1.23] "भक्ति से प्रसाद खाएँ, भजन-कीर्तन और नाच-गान करें, फिर सत्यनारायण को याद करते हुए अपने घर जाएँ।"

  24. एवं कृते मनुष्याणां वाञ्छासिद्धिर्भवेद् ध्रुवम् ॥ विशेषत: कलियुगे लघूपायोऽस्ति भूतले॥२४॥

    evaṃ kṛte manuṣyāṇāṃ vāñchāsiddhirbhaved dhruvam || viśeṣata: kaliyuge laghūpāyo'sti bhūtale||24||

    [1.24] "ऐसा करने से मनुष्य की मनोकामना निश्चित पूरी होती है। खासकर कलियुग में धरती पर यही छोटा और सरल उपाय है।"

द्वितीय अध्याय (27 श्लोक)

🔈 संस्कृत पाठ / Sanskrit chanting: audio coming soon / ऑडियो जल्द आएगा

  1. सूत उवाच॥ अथान्यत्सम्प्रवक्ष्यामि कृतं येन पुरा द्विज॥ कश्चित्काशीपुरे रम्ये ह्यासीद्विप्रोऽतिनिर्धन:॥१॥

    sūta uvāca|| athānyatsampravakṣyāmi kṛtaṃ yena purā dvija|| kaścitkāśīpure ramye hyāsīdvipro'tinirdhana:||1||

    [2.1] सूत जी बोले: हे ब्राह्मणो, अब बताता हूँ कि पहले यह व्रत किसने किया। सुंदर काशी नगरी में एक बहुत गरीब ब्राह्मण रहता था।

  2. क्षुतृडभ्यां व्याकुलो भूत्वा नित्यं बभ्राम भूतले॥ दू:खितं ब्राह्मणं दृष्टवा भगवान् ब्राह्मणप्रिय:॥२॥

    kṣutṛḍabhyāṃ vyākulo bhūtvā nityaṃ babhrāma bhūtale|| dū:khitaṃ brāhmaṇaṃ dṛṣṭavā bhagavān brāhmaṇapriya:||2||

    [2.2] भूख-प्यास से बेचैन होकर वह रोज़ धरती पर भटकता था। उस दुखी ब्राह्मण को देखकर ब्राह्मणों से प्रेम करने वाले भगवान,

  3. वृद्धब्राह्मणरूपस्तं पप्रच्छ द्विजमादरात् ॥ किमर्थं अमसे विप्र महीं नित्यं सुदु:खित:॥३॥

    vṛddhabrāhmaṇarūpastaṃ papraccha dvijamādarāt || kimarthaṃ amase vipra mahīṃ nityaṃ sudu:khita:||3||

    [2.3] एक बूढ़े ब्राह्मण का रूप लेकर उससे आदर से पूछने लगे: "हे विप्र, तुम इतने दुखी होकर रोज़ धरती पर क्यों घूमते हो?"

  4. तत्सर्वं श्रोतुमिच्छामि कथ्यतां द्विजसत्तम॥ "ब्राह्मण उवाच॥ ब्राह्मणोऽतिदरिद्रोऽहं भिक्षार्थं वै भ्रमे महीम्॥४॥

    tatsarvaṃ śrotumicchāmi kathyatāṃ dvijasattama|| "brāhmaṇa uvāca|| brāhmaṇo'tidaridro'haṃ bhikṣārthaṃ vai bhrame mahīm||4||

    [2.4] "हे श्रेष्ठ ब्राह्मण, मैं सब सुनना चाहता हूँ, बताओ।" ब्राह्मण बोला: "मैं बहुत गरीब ब्राह्मण हूँ, भिक्षा के लिए धरती पर घूमता हूँ।"

  5. उपायं यदि जानासि कृपया कथय प्रभो। वृद्धब्राह्मण उवाच। सत्यनारायणो विष्णुर्वाञ्छितार्थफलप्रद:॥५॥

    upāyaṃ yadi jānāsi kṛpayā kathaya prabho| vṛddhabrāhmaṇa uvāca| satyanārāyaṇo viṣṇurvāñchitārthaphalaprada:||5||

    [2.5] "हे प्रभु, कोई उपाय जानते हों तो कृपा करके बताइए।" बूढ़े ब्राह्मण ने कहा: "सत्यनारायण, यानी भगवान विष्णु, मनचाहा फल देते हैं।"

  6. तस्य त्वं पूजनं विप्र कुरुष्व व्रतमुत्तमम् ॥ यत्कृत्वा सर्वदुःखेभ्यो मुक्तो भवति मानव:॥६॥

    tasya tvaṃ pūjanaṃ vipra kuruṣva vratamuttamam || yatkṛtvā sarvaduḥkhebhyo mukto bhavati mānava:||6||

    [2.6] "हे विप्र, तुम उनकी पूजा का यह उत्तम व्रत करो, जिसे करके मनुष्य सब दुखों से छूट जाता है।"

  7. विधानं च व्रतस्यापि विप्रायाभाष्य यत्नत:॥ सत्यनारायणो वद्धस्तत्रैवान्तरधीयत ॥७॥

    vidhānaṃ ca vratasyāpi viprāyābhāṣya yatnata:|| satyanārāyaṇo vaddhastatraivāntaradhīyata ||7||

    [2.7] ब्राह्मण को व्रत की विधि ध्यान से बताकर, बूढ़े ब्राह्मण के रूप में आए सत्यनारायण वहीं अदृश्य हो गए।

  8. तदव्रतं सङ्करिष्यामि यदुक्तं ब्राह्मणेन वै॥ इति सञ्चिन्त्यविप्रोऽसौ रात्रौनिद्रांलब्धवान्।८।

    tadavrataṃ saṅkariṣyāmi yaduktaṃ brāhmaṇena vai|| iti sañcintyavipro'sau rātraunidrāṃlabdhavān|8|

    [2.8] "उस बूढ़े ब्राह्मण ने जो व्रत बताया, वह मैं ज़रूर करूँगा" — यह सोचते हुए उस ब्राह्मण को रात भर नींद नहीं आई।

  9. तत प्रात: समुत्थाय सत्यनारायणव्रतम् ॥ करिष्य इति सङ्कल्प्य भिक्षार्थमगमद् द्विज:॥९॥

    tata prāta: samutthāya satyanārāyaṇavratam || kariṣya iti saṅkalpya bhikṣārthamagamad dvija:||9||

    [2.9] सुबह उठकर "मैं सत्यनारायण का व्रत करूँगा" ऐसा संकल्प लेकर वह भिक्षा माँगने गया।

  10. तस्मिन्नेव दिने विप्र: प्रचुरं द्रव्यमाप्तवान्। तेनैव बन्धुभि: सार्द्धं सत्यस्य व्रतमाचरत्॥१०॥

    tasminneva dine vipra: pracuraṃ dravyamāptavān| tenaiva bandhubhi: sārddhaṃ satyasya vratamācarat||10||

    [2.10] उसी दिन उसे बहुत धन मिला। उसी धन से उसने परिवार के साथ सत्यनारायण का व्रत किया।

  11. सर्वदूःखविनिर्मुक्त: सर्वसम्पत्समन्वित:॥ बभूव स द्विजश्रेष्ठो व्रतस्यास्य प्रभावत:॥११॥

    sarvadūḥkhavinirmukta: sarvasampatsamanvita:|| babhūva sa dvijaśreṣṭho vratasyāsya prabhāvata:||11||

    [2.11] इस व्रत के प्रभाव से वह श्रेष्ठ ब्राह्मण सब दुखों से छूट गया और हर तरह की संपत्ति से भर गया।

  12. तत:प्रभृति कालं च मासि मासि व्रतं कृतम्॥ एवं नारायणस्येदं व्रतं कृत्वा द्विजोत्तम:॥१२॥

    tata:prabhṛti kālaṃ ca māsi māsi vrataṃ kṛtam|| evaṃ nārāyaṇasyedaṃ vrataṃ kṛtvā dvijottama:||12||

    [2.12] तब से वह हर महीने यह व्रत करने लगा। इस तरह नारायण का यह व्रत करके वह श्रेष्ठ ब्राह्मण,

  13. सर्वपापविनिर्मुक्तो दुर्लभं मोक्षमाप्तवान् । व्रतमस्य यदा विप्रा: पृथिव्यां सङ्करिष्यति॥१३॥

    sarvapāpavinirmukto durlabhaṃ mokṣamāptavān | vratamasya yadā viprā: pṛthivyāṃ saṅkariṣyati||13||

    [2.13] सब पापों से छूटकर दुर्लभ मोक्ष को पा गया। (सूत जी बोले:) हे ब्राह्मणो, धरती पर जब भी कोई यह व्रत करेगा,

  14. तदैव सर्वदुःखं च मनुजस्य विनश्यति। एवं नारायणेनोक्तं नारदाय महात्मने॥१४॥

    tadaiva sarvaduḥkhaṃ ca manujasya vinaśyati| evaṃ nārāyaṇenoktaṃ nāradāya mahātmane||14||

    [2.14] उसी समय उस मनुष्य का सारा दुख मिट जाएगा। ऐसा नारायण ने महात्मा नारद जी से कहा था।

  15. मया तत्कथितं विप्रा: किमन्यत्कथयामि व:॥ ऋषय ऊचु:। तस्माद्विप्राच्छ्रुतं केन पृथिव्यां चरितं मुने॥ तत्सर्वं श्रोतुमिच्छाम: श्रद्धास्माकं प्रजायते॥१५॥

    mayā tatkathitaṃ viprā: kimanyatkathayāmi va:|| ṛṣaya ūcu:| tasmādviprācchrutaṃ kena pṛthivyāṃ caritaṃ mune|| tatsarvaṃ śrotumicchāma: śraddhāsmākaṃ prajāyate||15||

    [2.15] "वही मैंने आपको सुनाया; और क्या बताऊँ?" ऋषि बोले: "हे मुनि, उस ब्राह्मण से सुनकर धरती पर और किसने यह व्रत किया? हम यह सुनना चाहते हैं, हमारे मन में श्रद्धा जाग रही है।"

  16. सूत उवाच॥ श्रृणुध्वं मुनय: सर्वे व्रतं येन कृतं भुवि ॥ एकदा स द्विजवरो यथाविभवविस्तरै:॥१६॥

    sūta uvāca|| śrṛṇudhvaṃ munaya: sarve vrataṃ yena kṛtaṃ bhuvi || ekadā sa dvijavaro yathāvibhavavistarai:||16||

    [2.16] सूत जी बोले: हे मुनियो, सुनिए धरती पर किसने यह व्रत किया। एक बार वही श्रेष्ठ ब्राह्मण अपनी सामर्थ्य के अनुसार,

  17. बन्धुभि:स्वजनै: सार्धं व्रतं कर्तुं समुद्यत:॥ एतस्मिन्नन्तरे काले काष्ठक्रेता समागमत्॥१७॥

    bandhubhi:svajanai: sārdhaṃ vrataṃ kartuṃ samudyata:|| etasminnantare kāle kāṣṭhakretā samāgamat||17||

    [2.17] परिवार और अपनों के साथ व्रत करने बैठा। उसी समय एक लकड़ी बेचने वाला (लकड़हारा) वहाँ आया।

  18. बहि:काष्ठं च संस्थ्याप्य विप्रस्य गृहमाययौ॥ तृष्णया पीडितात्मा च दृष्ट्वा विप्रंकृत व्रतम्॥१८॥

    bahi:kāṣṭhaṃ ca saṃsthyāpya viprasya gṛhamāyayau|| tṛṣṇayā pīḍitātmā ca dṛṣṭvā vipraṃkṛta vratam||18||

    [2.18] लकड़ियाँ बाहर रखकर वह ब्राह्मण के घर आया। प्यास से परेशान उस लकड़हारे ने ब्राह्मण को व्रत करते देखा,

  19. प्रणिपत्य द्विजं प्राह किमिदं क्रियते त्वया ॥ कृते किं फलमाप्नोति विस्तराद्वाद मे प्रभो ॥१९॥

    praṇipatya dvijaṃ prāha kimidaṃ kriyate tvayā || kṛte kiṃ phalamāpnoti vistarādvāda me prabho ||19||

    [2.19] और प्रणाम करके पूछा: "आप यह क्या कर रहे हैं? इसे करने से क्या फल मिलता है? हे प्रभु, मुझे विस्तार से बताइए।"

  20. विप्र उवाच॥ सत्यनारायणस्येदं व्रतं सर्वेप्सितप्रदम्॥ तस्य प्रसादान्मे सर्वं धनधान्यादिकं महत्॥२०॥

    vipra uvāca|| satyanārāyaṇasyedaṃ vrataṃ sarvepsitapradam|| tasya prasādānme sarvaṃ dhanadhānyādikaṃ mahat||20||

    [2.20] ब्राह्मण बोला: "यह सत्यनारायण का व्रत है, जो हर मनोकामना पूरी करता है। उन्हीं की कृपा से मेरे पास यह सब धन-धान्य है।"

  21. तस्मादेतद् व्रतं ज्ञात्वा काष्ठविक्रेतातिहर्षित:॥ पपौ जलं प्रसादं च भुक्त्वा स नगरं ययौ॥२१॥

    tasmādetad vrataṃ jñātvā kāṣṭhavikretātiharṣita:|| papau jalaṃ prasādaṃ ca bhuktvā sa nagaraṃ yayau||21||

    [2.21] यह व्रत जानकर लकड़हारा बहुत खुश हुआ। उसने (चरणामृत का) जल पिया, प्रसाद खाया और नगर की ओर चला।

  22. सत्यनारायणं देवं मनसा इत्यचिन्तयत् ॥ काष्ठं विक्रयतो ग्रामे प्राप्यते चाद्य यद्‌धनम्॥२२॥

    satyanārāyaṇaṃ devaṃ manasā ityacintayat || kāṣṭhaṃ vikrayato grāme prāpyate cādya yad‌dhanam||22||

    [2.22] वह मन में सत्यनारायण देव को याद करके सोचने लगा: "आज नगर में लकड़ी बेचकर जो धन मिलेगा,"

  23. तेनैव सत्यदेवस्य करिष्ये व्रतमुत्तमम्॥ इतिसञ्चिन्त्य मनसा काष्ठं धृत्वा तु मस्तके॥२३॥

    tenaiva satyadevasya kariṣye vratamuttamam|| itisañcintya manasā kāṣṭhaṃ dhṛtvā tu mastake||23||

    [2.23] "उसी से मैं सत्यदेव का उत्तम व्रत करूँगा।" यह सोचकर वह लकड़ियाँ सिर पर रखकर,

  24. जगाम नगरे रम्ये धनिनां यत्र संस्थिति:॥ तद्दिने काष्ठमूल्यं च द्विगुणं प्राप्तवानसौ॥२४॥

    jagāma nagare ramye dhanināṃ yatra saṃsthiti:|| taddine kāṣṭhamūlyaṃ ca dviguṇaṃ prāptavānasau||24||

    [2.24] उस सुंदर नगर में गया जहाँ धनी लोग रहते थे। उस दिन उसे लकड़ी का दाम दुगना मिला।

  25. तत: प्रसन्नहृदय: सुपक्वं कदलीफलम्॥ शर्कराघृतदुग्धं च गोधूमस्य च चूर्णकम्॥२५॥

    tata: prasannahṛdaya: supakvaṃ kadalīphalam|| śarkarāghṛtadugdhaṃ ca godhūmasya ca cūrṇakam||25||

    [2.25] तब प्रसन्न मन से उसने अच्छे पके केले, शक्कर, घी, दूध और गेहूँ का आटा,

  26. कृत्वैकत्र सपादं च गृहीत्वा स्वगृहं ययौ॥ ततो बन्धून्समाहूय चकार विधिना व्रतम्॥२६॥

    kṛtvaikatra sapādaṃ ca gṛhītvā svagṛhaṃ yayau|| tato bandhūnsamāhūya cakāra vidhinā vratam||26||

    [2.26] सवाया मात्रा में इकट्ठा किया और घर ले गया। फिर परिवार वालों को बुलाकर विधि से व्रत किया।

  27. तदव्रतस्य प्रभावेण धनपुत्रान्वितोऽभवत्। इहलोके सुखं भुंक्त्वा चान्ते सत्यपुरं ययौ॥२७॥

    tadavratasya prabhāveṇa dhanaputrānvito'bhavat| ihaloke sukhaṃ bhuṃktvā cānte satyapuraṃ yayau||27||

    [2.27] उस व्रत के प्रभाव से वह धन और पुत्रों से संपन्न हो गया, इस लोक में सुख भोगकर अंत में सत्यपुर (भगवान के धाम) को गया।

तृतीय अध्याय (51 श्लोक)

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  1. सूत उवाच ॥ पुनरग्रे प्रवक्ष्यामि श्रृणुध्वं मुनिसत्तमा: ॥ पुरा चोल्कामुखो नाम नृपश्चासी:महामति:॥१॥

    sūta uvāca || punaragre pravakṣyāmi śrṛṇudhvaṃ munisattamā: || purā colkāmukho nāma nṛpaścāsī:mahāmati:||1||

    [3.1] सूत जी बोले: हे श्रेष्ठ मुनियो, आगे की कथा सुनिए। पुराने समय में उल्कामुख नाम का एक बहुत बुद्धिमान राजा था।

  2. जितेन्द्रिय: सत्यवादी ययौ देवालयं प्रति ॥ दिने दिने धनं दत्वा द्विजान्सन्तोषयत्सुधी:॥२॥

    jitendriya: satyavādī yayau devālayaṃ prati || dine dine dhanaṃ datvā dvijānsantoṣayatsudhī:||2||

    [3.2] वह इंद्रियों को वश में रखने वाला और सच बोलने वाला था। वह रोज़ मंदिर जाता और धन देकर ब्राह्मणों को संतुष्ट करता था।

  3. भार्या तस्य प्रमुग्धा च सरोजवदना सती ॥ भद्रशीला नदीतीरे सत्यस्य व्रतमाचरत् ॥३॥

    bhāryā tasya pramugdhā ca sarojavadanā satī || bhadraśīlā nadītīre satyasya vratamācarat ||3||

    [3.3] उसकी पत्नी कमल जैसे मुख वाली, सुंदर और पतिव्रता थी। उसने भद्रशीला नदी के किनारे सत्यनारायण का व्रत किया।

  4. एतस्मिन्नन्तरे तत्र साधुरेक: समागत: ॥ वाणिज्यार्थं बहुधनैरनेकै: परिवारित: ॥४॥

    etasminnantare tatra sādhureka: samāgata: || vāṇijyārthaṃ bahudhanairanekai: parivārita: ||4||

    [3.4] उसी समय वहाँ एक साधु नाम का व्यापारी आया, जो व्यापार के लिए बहुत-सा धन लेकर निकला था।

  5. नावं संस्थाप्य तत्तीरे जगाम नृपतिं प्रति ॥ दृष्ट्वा स व्रतिनं भूपं पप्रच्छ विनयान्वित:॥५॥

    nāvaṃ saṃsthāpya tattīre jagāma nṛpatiṃ prati || dṛṣṭvā sa vratinaṃ bhūpaṃ papraccha vinayānvita:||5||

    [3.5] नाव को किनारे पर रोककर वह राजा के पास गया, और राजा को व्रत करते देखकर विनम्रता से पूछा।

  6. ॥साधुरुवाच॥ किमिदं कुरुषे राजन्भक्तियुक्तन चेतसा ॥ प्रकाशं कुरु तत्सर्वं श्रोतुमिच्छामि साम्प्रतम्॥६॥

    ||sādhuruvāca|| kimidaṃ kuruṣe rājanbhaktiyuktana cetasā || prakāśaṃ kuru tatsarvaṃ śrotumicchāmi sāmpratam||6||

    [3.6] साधु बोला: "हे राजन, आप भक्ति भरे मन से यह क्या कर रहे हैं? मुझे सब बताइए, मैं अभी सुनना चाहता हूँ।"

  7. 'राजोवाच॥ पूजनं क्रियते साधो विष्णोरतुलतेजस:॥ व्रतं च स्वजनै: सार्वं पुत्राद्यावाप्तिकाम्यया॥७॥

    'rājovāca|| pūjanaṃ kriyate sādho viṣṇoratulatejasa:|| vrataṃ ca svajanai: sārvaṃ putrādyāvāptikāmyayā||7||

    [3.7] राजा बोले: "हे साधु, पुत्र आदि की प्राप्ति की इच्छा से मैं अपनों के साथ अतुल तेज वाले भगवान विष्णु की पूजा और व्रत कर रहा हूँ।"

  8. भूपस्य वचनं श्रुत्वा साधु: प्रोवाच सादरम् ॥ सर्वं कथय मे राज्यन्करिष्येऽहं तवोदितम्॥८॥

    bhūpasya vacanaṃ śrutvā sādhu: provāca sādaram || sarvaṃ kathaya me rājyankariṣye'haṃ tavoditam||8||

    [3.8] राजा की बात सुनकर साधु ने आदर से कहा: "हे राजन, मुझे सब बताइए; आप जैसा कहेंगे, मैं वैसा करूँगा।"

  9. ममापि सन्ततिर्नास्ति ह्येतस्माज्जायते ध्रुवम्॥ ततो निवृत्य वाणिज्यात्सानन्दो गृहमागत:॥९॥

    mamāpi santatirnāsti hyetasmājjāyate dhruvam|| tato nivṛtya vāṇijyātsānando gṛhamāgata:||9||

    [3.9] "मेरी भी कोई संतान नहीं है; इससे ज़रूर होगी।" फिर व्यापार से लौटकर वह खुशी-खुशी घर आया।

  10. भार्यायै कथितं सर्वं व्रतं सन्ततिदायकम्॥ तदा व्रतं करिष्यामि यदा मे सन्ततिर्भवेत्॥१०॥

    bhāryāyai kathitaṃ sarvaṃ vrataṃ santatidāyakam|| tadā vrataṃ kariṣyāmi yadā me santatirbhavet||10||

    [3.10] उसने पत्नी को संतान देने वाले इस व्रत के बारे में सब बताया और कहा: "जब मेरी संतान होगी, तब मैं यह व्रत करूँगा।"

  11. इति लीलावतीं प्राह पत्नीं साधु: स सत्तम:॥ एकस्मिन्दिवसे तस्य भार्या लीलावती सती॥११॥

    iti līlāvatīṃ prāha patnīṃ sādhu: sa sattama:|| ekasmindivase tasya bhāryā līlāvatī satī||11||

    [3.11] यह बात साधु ने अपनी पत्नी लीलावती से कही। एक दिन उसकी पतिव्रता पत्नी लीलावती,

  12. भर्तृयुक्ताऽऽनन्दचित्ताऽभवद्धर्मपरायणा ॥ गर्भिणी साऽभवत्तस्य भार्या सत्यप्रसादत:॥१२॥

    bhartṛyuktā''nandacittā'bhavaddharmaparāyaṇā || garbhiṇī sā'bhavattasya bhāryā satyaprasādata:||12||

    [3.12] पति के साथ प्रसन्न मन से गृहस्थ धर्म में लगी रही, और सत्यनारायण की कृपा से गर्भवती हुई।

  13. दशमे मासि वै तस्या: कन्यारत्नमजायत॥ दिने दिने सा ववृधे शुक्लपक्षे यथा शशी॥१३॥

    daśame māsi vai tasyā: kanyāratnamajāyata|| dine dine sā vavṛdhe śuklapakṣe yathā śaśī||13||

    [3.13] दसवें महीने में उसके घर एक रत्न जैसी कन्या का जन्म हुआ। वह शुक्ल पक्ष के चंद्रमा की तरह दिन-दिन बढ़ने लगी।

  14. सम्ना कलावति चेति तन्नामकरण कृतम्॥ ततो लीलावती प्राह स्वामिनं मधुरं वच:॥१४॥

    samnā kalāvati ceti tannāmakaraṇa kṛtam|| tato līlāvatī prāha svāminaṃ madhuraṃ vaca:||14||

    [3.14] उसका नाम 'कलावती' रखा गया। तब लीलावती ने अपने पति से मीठे शब्दों में कहा:

  15. न करोषि किमर्यं वै पुरा सङ्कल्पितं व्रतं॥ साधुरुवाच॥ विवाहसमये त्वस्या: करिष्यामि व्रतं प्रिये॥१५॥

    na karoṣi kimaryaṃ vai purā saṅkalpitaṃ vrataṃ|| sādhuruvāca|| vivāhasamaye tvasyā: kariṣyāmi vrataṃ priye||15||

    [3.15] "आपने पहले जिस व्रत का संकल्प लिया था, वह क्यों नहीं करते?" साधु बोला: "प्रिये, इसके विवाह के समय यह व्रत करूँगा।"

  16. इति भार्यां समाश्वास्य जगाम नगरं प्रति॥ तत: कलावती कन्या ववृधे पितृवेश्मनि॥१६॥

    iti bhāryāṃ samāśvāsya jagāma nagaraṃ prati|| tata: kalāvatī kanyā vavṛdhe pitṛveśmani||16||

    [3.16] इस तरह पत्नी को भरोसा दिलाकर वह नगर चला गया। उधर कलावती पिता के घर में बड़ी होती गई।

  17. दृष्ट्वा कन्यां तत:साधुर्नगरे सखिभि:सह॥ मन्त्रयित्वा द्रुतं दूतं प्रेषयामास धर्मवित्॥१७॥

    dṛṣṭvā kanyāṃ tata:sādhurnagare sakhibhi:saha|| mantrayitvā drutaṃ dūtaṃ preṣayāmāsa dharmavit||17||

    [3.17] फिर एक दिन धर्म जानने वाले साधु ने नगर में अपनी बेटी को सहेलियों के साथ (विवाह योग्य) देखा, और सलाह करके तुरंत एक दूत भेजा।

  18. विवाहार्थे च कन्याया:वरं श्रेष्ठं विचारय ॥ तेनाज्ञप्तश्च दूतोऽसौ काञ्चनं नगरं ययौ॥१८॥

    vivāhārthe ca kanyāyā:varaṃ śreṣṭhaṃ vicāraya || tenājñaptaśca dūto'sau kāñcanaṃ nagaraṃ yayau||18||

    [3.18] "बेटी के विवाह के लिए अच्छा वर ढूँढो।" उसकी आज्ञा से वह दूत कांचन नगर गया।

  19. तस्मादेकं वणिक्पुत्रं समादायागतो हि स:॥ दृष्ट्वा तु सुन्दरं बालंवणिक्पुत्रं गुणान्वितम्॥१९॥

    tasmādekaṃ vaṇikputraṃ samādāyāgato hi sa:|| dṛṣṭvā tu sundaraṃ bālaṃvaṇikputraṃ guṇānvitam||19||

    [3.19] वहाँ से वह एक व्यापारी के बेटे को साथ लाया। उस सुंदर और गुणवान लड़के को देखकर,

  20. ज्ञातिभिर्बन्धुभि: सार्धं परितुष्टेन चेतसा॥ दत्तवान् साधु: पुत्राय कन्यां विधिविधानत:॥२०॥

    jñātibhirbandhubhi: sārdhaṃ parituṣṭena cetasā|| dattavān sādhu: putrāya kanyāṃ vidhividhānata:||20||

    [3.20] साधु ने प्रसन्न मन से अपने कुटुंब और संबंधियों के साथ विधि-विधान से उस लड़के से अपनी बेटी का विवाह कर दिया।

  21. ततो भाग्यवशात्तेन विस्मृतं व्रतमुत्तमम्॥ विवाहसमये तस्यास्तेन रुष्टेऽभवत्प्रभु:॥२१॥

    tato bhāgyavaśāttena vismṛtaṃ vratamuttamam|| vivāhasamaye tasyāstena ruṣṭe'bhavatprabhu:||21||

    [3.21] पर दुर्भाग्य से विवाह के समय भी वह उत्तम व्रत भूल गया। इससे भगवान रूठ गए।

  22. तत: कालेन नियतो निजकर्मविशारद:॥ वाणिज्यार्थं तत:शीघ्रं जामातृसहितो वणिक्।२२॥

    tata: kālena niyato nijakarmaviśārada:|| vāṇijyārthaṃ tata:śīghraṃ jāmātṛsahito vaṇik|22||

    [3.22] कुछ समय बाद, अपने काम में कुशल वह व्यापारी जल्दी ही दामाद के साथ व्यापार करने निकला।

  23. रत्नसारपुरे रम्ये गत्वा सिन्धुसमीपत:॥ वाणिज्यमकरोत्साधुर्जामात्रा श्रीमता सह॥२३॥

    ratnasārapure ramye gatvā sindhusamīpata:|| vāṇijyamakarotsādhurjāmātrā śrīmatā saha||23||

    [3.23] समुद्र के पास सुंदर रत्नसारपुर में जाकर साधु अपने दामाद के साथ व्यापार करने लगा।

  24. तौ गतौ नगरे रम्ये चन्द्रकेतोर्नृपस्य च॥ एतस्मिन्नेव काले तु सत्यनारायण:प्रभु:॥२४॥

    tau gatau nagare ramye candraketornṛpasya ca|| etasminneva kāle tu satyanārāyaṇa:prabhu:||24||

    [3.24] वे दोनों राजा चंद्रकेतु के उस सुंदर नगर में थे। उसी समय भगवान सत्यनारायण ने,

  25. भ्रष्टप्रतिज्ञमालोक्य शापं तस्मै प्रदत्तवान् ॥ दारुणं कठिनं चास्य महद दुःखं भविष्यति॥२५॥

    bhraṣṭapratijñamālokya śāpaṃ tasmai pradattavān || dāruṇaṃ kaṭhinaṃ cāsya mahada duḥkhaṃ bhaviṣyati||25||

    [3.25] उसे अपना वचन तोड़ते देखकर शाप दिया: "इसे भयंकर, कठिन और बड़ा दुख मिलेगा।"

  26. एकस्मिन्दिवसे राज्ञो धनमादाय तस्कर:॥ तत्रैव चागतश्चौरो वणिजौ यत्र संस्थितौ॥२६॥

    ekasmindivase rājño dhanamādāya taskara:|| tatraiva cāgataścauro vaṇijau yatra saṃsthitau||26||

    [3.26] एक दिन एक चोर राजा का धन चुराकर वहीं आ पहुँचा जहाँ वे दोनों व्यापारी ठहरे थे।

  27. तत्पश्चाद्धावकान् दूतान्‌ दृष्ट्वा भीतेन चेतसा॥ धनं संस्थाप्य तत्रैव स तु शीघ्रमलक्षित:॥२७॥

    tatpaścāddhāvakān dūtān‌ dṛṣṭvā bhītena cetasā|| dhanaṃ saṃsthāpya tatraiva sa tu śīghramalakṣita:||27||

    [3.27] पीछे दौड़ते सिपाहियों को देखकर वह डर गया, धन वहीं रखकर चुपके से भाग गया।

  28. ततो दूता:समायाता यत्रास्ते सज्जनो वणिक्॥ दृष्ट्वा नृपधनं तत्र बदध्वाऽऽनीतौ वणिक्सुतौ॥२८॥

    tato dūtā:samāyātā yatrāste sajjano vaṇik|| dṛṣṭvā nṛpadhanaṃ tatra badadhvā''nītau vaṇiksutau||28||

    [3.28] फिर सिपाही वहाँ आए जहाँ वह सज्जन व्यापारी था। राजा का धन वहाँ देखकर वे दोनों व्यापारियों को बाँधकर ले गए।

  29. हर्षेण धावमानाश्च ऊचुर्नृपसमीपत:॥ तस्करौ द्वौ समानीतौ विलोक्याज्ञापय प्रभो॥२९॥

    harṣeṇa dhāvamānāśca ūcurnṛpasamīpata:|| taskarau dvau samānītau vilokyājñāpaya prabho||29||

    [3.29] खुशी से दौड़ते हुए उन्होंने राजा के पास जाकर कहा: "हे प्रभु, हम दो चोर पकड़ लाए हैं, देखकर आज्ञा दीजिए।"

  30. राज्ञाऽऽज्ञप्तास्तत:शीघ्रं दृढं बदध्वा तु तावुभौ ॥ स्थापितौ द्वौमहादुर्गे कारागारेऽविचारत:॥३०॥

    rājñā''jñaptāstata:śīghraṃ dṛḍhaṃ badadhvā tu tāvubhau || sthāpitau dvaumahādurge kārāgāre'vicārata:||30||

    [3.30] राजा की आज्ञा से उन दोनों को कसकर बाँधा गया और बिना जाँच-पड़ताल के बड़े किले की जेल में डाल दिया गया।

  31. मायया सत्यदेवस्य न श्रुतं कैस्तयोर्वच:॥ अतस्तयोर्धनं राज्ञा गृहीतं चन्द्रकेतुना॥३१॥

    māyayā satyadevasya na śrutaṃ kaistayorvaca:|| atastayordhanaṃ rājñā gṛhītaṃ candraketunā||31||

    [3.31] सत्यदेव की माया से किसी ने उनकी बात नहीं सुनी। राजा चंद्रकेतु ने उनका धन भी ले लिया।

  32. तच्छापाच्च तयोर्गेहे भार्या चैवातिदुःखिता॥ चौरेणापहृतं सर्वं गृहे यच्च स्थितं धनम्॥३२॥

    tacchāpācca tayorgehe bhāryā caivātiduḥkhitā|| caureṇāpahṛtaṃ sarvaṃ gṛhe yacca sthitaṃ dhanam||32||

    [3.32] उसी शाप से घर पर उसकी पत्नी भी बहुत दुखी हो गई। घर में जो धन था, वह सब चोर ले गए।

  33. आधिव्याधिसमायुक्ता क्षुत्पिपासातिदुःखिता॥ अन्नचिन्तापरा भूत्वा बभ्राम च गृहे गृहे॥ कलावती तु कन्यापि बभ्राम प्रतिवासरम्॥३३॥

    ādhivyādhisamāyuktā kṣutpipāsātiduḥkhitā|| annacintāparā bhūtvā babhrāma ca gṛhe gṛhe|| kalāvatī tu kanyāpi babhrāma prativāsaram||33||

    [3.33] मन और शरीर के कष्ट, भूख-प्यास से बहुत दुखी होकर वह खाने की चिंता में घर-घर भटकने लगी। बेटी कलावती भी रोज़ भटकती रही।

  34. एकस्मिन्दिवसे जाता क्षुधार्ता द्विजमन्दिरम् ॥ गत्वाऽपश्यद व्रतं तत्र सत्यनारायणस्य च॥३४॥

    ekasmindivase jātā kṣudhārtā dvijamandiram || gatvā'paśyada vrataṃ tatra satyanārāyaṇasya ca||34||

    [3.34] एक दिन भूख से व्याकुल कलावती एक ब्राह्मण के घर गई और वहाँ उसने सत्यनारायण का व्रत होते देखा।

  35. उपविश्य कथां श्रुत्वा वरं प्रार्थितवत्यपि । प्रसादभक्षणं कृत्वा ययौ रात्रौ गृहं प्रति ॥३५॥

    upaviśya kathāṃ śrutvā varaṃ prārthitavatyapi | prasādabhakṣaṇaṃ kṛtvā yayau rātrau gṛhaṃ prati ||35||

    [3.35] वह बैठकर कथा सुनी, भगवान से वर माँगा, प्रसाद खाया और रात को घर लौटी।

  36. माता कलावतीं कन्यां कथयामास प्रेमत:॥ पुत्रि रात्रौ स्थिता कुत्र किं ते मनसि वर्तते॥३६॥

    mātā kalāvatīṃ kanyāṃ kathayāmāsa premata:|| putri rātrau sthitā kutra kiṃ te manasi vartate||36||

    [3.36] माँ ने प्यार से कलावती से पूछा: "बेटी, रात तक कहाँ थी? तेरे मन में क्या है?"

  37. कन्या कलावती प्राह मातरं प्रति सत्वरम्॥ द्विजालये व्रतं मातर् दृष्टं वाञ्छितसिद्धिदम् ॥३७॥

    kanyā kalāvatī prāha mātaraṃ prati satvaram|| dvijālaye vrataṃ mātar dṛṣṭaṃ vāñchitasiddhidam ||37||

    [3.37] कलावती ने तुरंत माँ से कहा: "माँ, मैंने एक ब्राह्मण के घर मनोकामना पूरी करने वाला व्रत देखा।"

  38. तच्छत्वा कन्यकावाक्यं व्रतं कर्तुं समुद्यता ॥ सा तदा तु वणिग्भार्या सत्यनारायणस्य च ॥३८॥

    tacchatvā kanyakāvākyaṃ vrataṃ kartuṃ samudyatā || sā tadā tu vaṇigbhāryā satyanārāyaṇasya ca ||38||

    [3.38] बेटी की बात सुनकर वह व्यापारी की पत्नी सत्यनारायण का व्रत करने को तैयार हुई।

  39. व्रतं चक्रे सैव साध्वी बन्धुभि:स्वजनै:सह ॥ भर्तृजामातरौ क्षिप्रमागच्छेतांस्वामाश्रमम् ॥३९॥

    vrataṃ cakre saiva sādhvī bandhubhi:svajanai:saha || bhartṛjāmātarau kṣipramāgacchetāṃsvāmāśramam ||39||

    [3.39] उस पतिव्रता ने अपनों और संबंधियों के साथ व्रत किया (और प्रार्थना की): "मेरे पति और दामाद जल्दी घर लौट आएँ।"

  40. अपराधं च मे भर्तुर्जामातु: क्षन्तुमर्हसि। व्रतेनानेन तुष्टोऽसौ सत्यनारायण: पुन:॥४०॥

    aparādhaṃ ca me bharturjāmātu: kṣantumarhasi| vratenānena tuṣṭo'sau satyanārāyaṇa: puna:||40||

    [3.40] "मेरे पति और दामाद का अपराध क्षमा कीजिए।" इस व्रत से सत्यनारायण फिर प्रसन्न हुए।

  41. दर्शयामास स्वप्नं हि चन्द्रकेतुं नृपोत्तमम्॥ बन्दिनौ मोचय प्रातर्वणिजौ नृपसत्तम॥४१॥

    darśayāmāsa svapnaṃ hi candraketuṃ nṛpottamam|| bandinau mocaya prātarvaṇijau nṛpasattama||41||

    [3.41] उन्होंने श्रेष्ठ राजा चंद्रकेतु को सपने में दर्शन देकर कहा: "हे राजन, सुबह उन दोनों बंदी व्यापारियों को छोड़ दो।"

  42. देयं धनं च तत्सर्वं गृहीतं यत्त्वयाधुना ॥ नो चेत्त्वां नाशयिष्यामि सराज्यं धनपुत्रकम्॥४२॥

    deyaṃ dhanaṃ ca tatsarvaṃ gṛhītaṃ yattvayādhunā || no cettvāṃ nāśayiṣyāmi sarājyaṃ dhanaputrakam||42||

    [3.42] "तुमने उनका जो धन लिया है, वह सब लौटा दो। नहीं तो मैं तुम्हें राज्य, धन और पुत्रों समेत नष्ट कर दूँगा।"

  43. एवमाभाष्य राजानं ध्यानगम्योऽभवत्प्रभु:॥ तत: प्रभातसमये राजा च स्वजनै:सह॥४३॥

    evamābhāṣya rājānaṃ dhyānagamyo'bhavatprabhu:|| tata: prabhātasamaye rājā ca svajanai:saha||43||

    [3.43] राजा से ऐसा कहकर भगवान अंतर्धान हो गए। सुबह राजा अपने लोगों के साथ,

  44. उपविश्य सभामध्ये प्राह स्वप्नं जनं प्रति॥ वृद्धौ महाजनौ शीघ्रं मोचयद्वौ वणिक्सुतौ॥४४॥

    upaviśya sabhāmadhye prāha svapnaṃ janaṃ prati|| vṛddhau mahājanau śīghraṃ mocayadvau vaṇiksutau||44||

    [3.44] सभा में बैठकर सबको सपना सुनाया और कहा: "उन दोनों व्यापारियों को जल्दी छोड़ दो।"

  45. इति राज्ञो वच:श्रुत्वा मोचयित्वा महाजनौ॥ समानीय नृपस्याग्रे प्राहुस्ते विनयान्विता:॥४५॥

    iti rājño vaca:śrutvā mocayitvā mahājanau|| samānīya nṛpasyāgre prāhuste vinayānvitā:||45||

    [3.45] राजा की बात सुनकर अधिकारियों ने दोनों को छुड़ाया, राजा के सामने लाकर विनम्रता से कहा:

  46. आनीतौ द्वौ वणिक्पुत्रौ मुक्तो निगडबन्धनात्॥ ततो महाजनौ नत्वा चन्द्रकेतुं नृपोत्तमम् ॥४६॥

    ānītau dvau vaṇikputrau mukto nigaḍabandhanāt|| tato mahājanau natvā candraketuṃ nṛpottamam ||46||

    [3.46] "दोनों व्यापारी बेड़ियों से छुड़ाकर ले आए गए हैं।" तब दोनों व्यापारियों ने श्रेष्ठ राजा चंद्रकेतु को प्रणाम किया।

  47. स्मरन्तौ पूर्ववृत्तान्तं नोचतुर्भयविह्वलौ॥ राजा वणिक्सुतौ वीक्ष्य वच:प्रोवाच सादरम्॥४७॥

    smarantau pūrvavṛttāntaṃ nocaturbhayavihvalau|| rājā vaṇiksutau vīkṣya vaca:provāca sādaram||47||

    [3.47] पिछली घटना याद करके वे डर से कुछ बोल न सके। राजा ने उन्हें देखकर आदर से कहा:

  48. दैवात्प्राप्तं महद्दुःखमिदानीं नास्ति वै भयम्॥ तदा निगडसंत्यागं क्षौरकर्माद्यकारयत्॥४८॥

    daivātprāptaṃ mahadduḥkhamidānīṃ nāsti vai bhayam|| tadā nigaḍasaṃtyāgaṃ kṣaurakarmādyakārayat||48||

    [3.48] "भाग्य से तुम्हें बड़ा दुख मिला, अब कोई डर नहीं है।" फिर उनकी बेड़ियाँ खुलवाईं और बाल-दाढ़ी बनवाकर उन्हें साफ़-सुथरा करवाया।

  49. वस्त्रालङ्कारकं दत्वा परितोष्य नृपश्च तौ॥ पुरस्कृत्य वणिक्पुत्रौ वचसाऽतोषयद् भृशम॥४९॥

    vastrālaṅkārakaṃ datvā paritoṣya nṛpaśca tau|| puraskṛtya vaṇikputrau vacasā'toṣayad bhṛśama||49||

    [3.49] राजा ने उन्हें कपड़े और गहने देकर संतुष्ट किया, आदर दिया और मीठी बातों से उनका मन बहुत खुश किया।

  50. पुराऽऽनीतं तु यद्- द्रव्यं द्विगुणीकृत्य दत्तवान् । प्रोवाच तौ ततो राजा गच्छ साधो निजाश्रमम्।५०॥

    purā''nītaṃ tu yad- dravyaṃ dviguṇīkṛtya dattavān | provāca tau tato rājā gaccha sādho nijāśramam|50||

    [3.50] जो धन पहले लिया था, उसका दुगना लौटाया। फिर राजा बोले: "हे साधु, अब अपने घर जाओ।"

  51. राजानं प्रणिपत्याह गन्तव्यं त्वत्प्रासादत:॥ इत्युक्त्वा तौ महावैश्यौ जग्मतु:स्वगृहं प्रति॥५१॥

    rājānaṃ praṇipatyāha gantavyaṃ tvatprāsādata:|| ityuktvā tau mahāvaiśyau jagmatu:svagṛhaṃ prati||51||

    [3.51] उन्होंने राजा को प्रणाम करके कहा: "आपकी कृपा से हम जाएँगे।" ऐसा कहकर वे दोनों बड़े व्यापारी अपने घर की ओर चल पड़े।

चतुर्थ अध्याय (44 श्लोक)

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  1. ॥सूत-उवाच॥ यात्रां तु कृतवान् साधुर्मङ्गलायनपूर्विकाम् । ब्राह्मणेभ्यो धनं दत्त्वा तदा तु नगरं ययौ॥१॥

    ||sūta-uvāca|| yātrāṃ tu kṛtavān sādhurmaṅgalāyanapūrvikām | brāhmaṇebhyo dhanaṃ dattvā tadā tu nagaraṃ yayau||1||

    [4.1] सूत जी बोले: साधु ने मंगल-कार्य करके यात्रा शुरू की, ब्राह्मणों को धन दिया और अपने नगर की ओर चला।

  2. कियद दूरे गते साधौ सत्यनारायण:प्रभु:॥ जिज्ञासां कृतवान् साधो किमस्ति तव नौ स्थितम्।२॥

    kiyada dūre gate sādhau satyanārāyaṇa:prabhu:|| jijñāsāṃ kṛtavān sādho kimasti tava nau sthitam|2||

    [4.2] साधु कुछ दूर ही गया था कि भगवान सत्यनारायण ने (परखने के लिए) पूछा: "हे साधु, तुम्हारी नाव में क्या है?"

  3. ततो महाजनौ मत्तौ हेलया च प्रहस्य वै॥ कथं पृच्छसि भो दण्डिन् मुद्रां नेतुं किमिच्छसि।३॥

    tato mahājanau mattau helayā ca prahasya vai|| kathaṃ pṛcchasi bho daṇḍin mudrāṃ netuṃ kimicchasi|3||

    [4.3] धन के घमंड में डूबे दोनों व्यापारी हँसकर बोले: "हे दंडी (संन्यासी), क्यों पूछते हो? क्या पैसे ले जाना चाहते हो?"

  4. लतापत्रादिकं चैव वर्तने तरणौ मम॥ निष्ठुरं च वच: श्रुत्वा सत्यं भवतु ते वच:॥४॥

    latāpatrādikaṃ caiva vartane taraṇau mama|| niṣṭhuraṃ ca vaca: śrutvā satyaṃ bhavatu te vaca:||4||

    [4.4] "मेरी नाव में तो बस बेल और पत्ते हैं।" यह कठोर बात सुनकर भगवान बोले: "तुम्हारी बात सच हो जाए।"

  5. एवमुक्त्वा गत: शीघ्रं दण्डी तस्य समीपत:॥ कियद् दूरे ततो गत्वा स्थित: सिन्धुसमीपत:॥५॥

    evamuktvā gata: śīghraṃ daṇḍī tasya samīpata:|| kiyad dūre tato gatvā sthita: sindhusamīpata:||5||

    [4.5] ऐसा कहकर दंडी जल्दी वहाँ से चले गए और कुछ दूर जाकर समुद्र के किनारे बैठ गए।

  6. गते दण्डिनि साधुश्च कृतनित्यक्रियस्तदा॥ उत्थितां तरणिं द्दष्ट्वा विस्मयं परमं ययौ॥६॥

    gate daṇḍini sādhuśca kṛtanityakriyastadā|| utthitāṃ taraṇiṃ ddaṣṭvā vismayaṃ paramaṃ yayau||6||

    [4.6] दंडी के जाने के बाद साधु ने नित्य-कर्म किया, फिर नाव को ऊपर उठा (हल्का) देखकर बहुत हैरान हुआ।

  7. दृष्ट्वा लतादिकं चैव मूर्छितो न्यपतद भुवि॥ लब्धसंज्ञो वणिक्पुत्रस्ततश्चिन्तान्वितोऽभवत्॥७॥

    dṛṣṭvā latādikaṃ caiva mūrchito nyapatada bhuvi|| labdhasaṃjño vaṇikputrastataścintānvito'bhavat||7||

    [4.7] नाव में बेल-पत्ते देखकर वह बेहोश होकर ज़मीन पर गिर पड़ा। होश आने पर वह बहुत चिंतित हुआ।

  8. तदा तु दुहितु: कान्तो वचनं चेदमब्रवीत्॥ किमथ क्रियते शोक: शापो दत्तश्च दण्डिना॥८॥

    tadā tu duhitu: kānto vacanaṃ cedamabravīt|| kimatha kriyate śoka: śāpo dattaśca daṇḍinā||8||

    [4.8] तब उसकी बेटी के पति (दामाद) ने कहा: "शोक क्यों करते हो? यह उस दंडी का दिया शाप है।"

  9. शक्यते तेन सर्वं हि कर्तुं चात्र न संशय:। अतस्तच्छरणं यामो वाञ्छितार्थो भविष्यति॥९॥

    śakyate tena sarvaṃ hi kartuṃ cātra na saṃśaya:| atastaccharaṇaṃ yāmo vāñchitārtho bhaviṣyati||9||

    [4.9] "वे सब कुछ कर सकते हैं, इसमें शक नहीं। इसलिए उनकी शरण में चलें, मनचाहा फल मिलेगा।"

  10. जामातुर्वचनं श्रत्वा तत्सकाशं गतस्तदा॥ दृष्ट्वा च दण्डिनं भक्तया नत्वा प्रोवाच सादरम्।१०॥

    jāmāturvacanaṃ śratvā tatsakāśaṃ gatastadā|| dṛṣṭvā ca daṇḍinaṃ bhaktayā natvā provāca sādaram|10||

    [4.10] दामाद की बात सुनकर वह दंडी के पास गया, भक्ति से प्रणाम किया और आदर से बोला:

  11. क्षमस्व चापराधं मे यदुक्तं तव सन्निधौ॥ एवं पुन: पुनर्नत्वा महाशोकाकुलोऽभेवत्॥११॥

    kṣamasva cāparādhaṃ me yaduktaṃ tava sannidhau|| evaṃ puna: punarnatvā mahāśokākulo'bhevat||11||

    [4.11] "आपके सामने मैंने जो कहा, वह अपराध क्षमा कीजिए।" ऐसा कहकर बार-बार प्रणाम करते हुए वह बहुत दुखी हुआ।

  12. प्रोवाच वचनं दण्डी विलपन्तं विलोक्य च॥ मा रोदी:श्रृणु मद्वाक्यं मम पूजाबहिर्मुख:॥१२॥

    provāca vacanaṃ daṇḍī vilapantaṃ vilokya ca|| mā rodī:śrṛṇu madvākyaṃ mama pūjābahirmukha:||12||

    [4.12] उसे रोते देखकर दंडी बोले: "मत रो, मेरी बात सुन। तू मेरी पूजा से मुँह फेरता रहा है।"

  13. ममाज्ञया च दुर्बुद्धे लब्धं दुःखं मुहुर्मुहु:॥ तच्छ्रुत्वा भगवद्वाक्यं स्तुतिं कर्तुं समुद्यत:॥१३॥

    mamājñayā ca durbuddhe labdhaṃ duḥkhaṃ muhurmuhu:|| tacchrutvā bhagavadvākyaṃ stutiṃ kartuṃ samudyata:||13||

    [4.13] "हे कुबुद्धि, मेरी इच्छा से ही तुझे बार-बार दुख मिला है।" भगवान की यह बात सुनकर वह स्तुति करने लगा।

  14. ॥साधुरुवाच॥ त्वन्मायामोहिता: सर्वे ब्रह्माद्यास्त्रिदिवौकस:॥ न जानन्ति गुणान् रूपं तवाश्चर्यमिदं प्रभो॥१४॥

    ||sādhuruvāca|| tvanmāyāmohitā: sarve brahmādyāstridivaukasa:|| na jānanti guṇān rūpaṃ tavāścaryamidaṃ prabho||14||

    [4.14] साधु बोला: "हे प्रभु, आपकी माया से ब्रह्मा आदि सब देवता भी मोहित हैं; वे भी आपके गुण और रूप नहीं जानते, यह आश्चर्य है।"

  15. मूढोऽहं त्वां कथं जाने मोहितस्तव मायया॥ प्रसीद पूजयिष्यामि यथाविभवविस्तरै:॥१५॥

    mūḍho'haṃ tvāṃ kathaṃ jāne mohitastava māyayā|| prasīda pūjayiṣyāmi yathāvibhavavistarai:||15||

    [4.15] "मैं मूर्ख, आपकी माया से भ्रमित, आपको कैसे जानूँ? प्रसन्न होइए, मैं अपनी सामर्थ्य के अनुसार आपकी पूजा करूँगा।"

  16. पुरा वित्तं च तत्सर्वं त्राहि मां शरणागतम्॥ श्रत्वा भक्तियुतं वाक्यं परितुष्टो जनार्दन:॥१६॥

    purā vittaṃ ca tatsarvaṃ trāhi māṃ śaraṇāgatam|| śratvā bhaktiyutaṃ vākyaṃ parituṣṭo janārdana:||16||

    [4.16] "मेरा पहले जैसा धन लौटा दीजिए, मैं आपकी शरण में हूँ, मेरी रक्षा कीजिए।" भक्ति भरी बात सुनकर भगवान जनार्दन प्रसन्न हुए।

  17. वरं च वाञ्छितं दत्त्वा तत्रैवान्तर्दधे हरि:॥ ततो नौकां समारुह्य द्दष्ट्वा वित्तप्रपूरिताम्॥१७॥

    varaṃ ca vāñchitaṃ dattvā tatraivāntardadhe hari:|| tato naukāṃ samāruhya ddaṣṭvā vittaprapūritām||17||

    [4.17] उसे मनचाहा वर देकर भगवान हरि वहीं अदृश्य हो गए। फिर नाव पर चढ़कर उसने उसे धन से भरा देखा।

  18. कृपया सत्यदेवस्य सफलं वाञ्छितं मम॥ इत्युक्त्वा स्वजनै:सार्द्धं पूजांकृत्वा यथाविधिम्।१८॥

    kṛpayā satyadevasya saphalaṃ vāñchitaṃ mama|| ityuktvā svajanai:sārddhaṃ pūjāṃkṛtvā yathāvidhim|18||

    [4.18] "सत्यदेव की कृपा से मेरी इच्छा पूरी हुई" — ऐसा कहकर उसने अपनों के साथ विधि से पूजा की।

  19. हर्षेण चाभवत्पूर्ण:सत्यदेवप्रसादत:। नावं संयोज्य यत्नेन स्वदेशगमनं कृतम्॥१९॥

    harṣeṇa cābhavatpūrṇa:satyadevaprasādata:| nāvaṃ saṃyojya yatnena svadeśagamanaṃ kṛtam||19||

    [4.19] सत्यदेव की कृपा से वह खुशी से भर गया। फिर ध्यान से नाव तैयार करके अपने देश की ओर चल पड़ा।

  20. साधुर्जामातरं प्राह पश्य रत्नपुरी मम॥ दुतं च प्रेषयामास निजवित्तस्य रक्षकम्॥२०॥

    sādhurjāmātaraṃ prāha paśya ratnapurī mama|| dutaṃ ca preṣayāmāsa nijavittasya rakṣakam||20||

    [4.20] साधु ने दामाद से कहा: "देखो, वह मेरी रत्नपुरी है।" और अपने धन की रखवाली करने वाले एक दूत को आगे भेजा।

  21. दूतोऽसौ नगरं गत्वा साधुभार्यां विलोक्य च॥ प्रोवाच वाञ्छितं वाक्यंनत्वा बद्धाञ्जलिस्तदा।२१॥

    dūto'sau nagaraṃ gatvā sādhubhāryāṃ vilokya ca|| provāca vāñchitaṃ vākyaṃnatvā baddhāñjalistadā|21||

    [4.21] दूत ने नगर जाकर साधु की पत्नी को देखा और हाथ जोड़कर प्रणाम करके मनभावन समाचार सुनाया:

  22. निकटे नगरस्यैव जामात्रा सहितो वणिक्॥ आगतो बन्धुवर्गैश्च वित्तैश्च बहुभिर्युत:॥२२॥

    nikaṭe nagarasyaiva jāmātrā sahito vaṇik|| āgato bandhuvargaiśca vittaiśca bahubhiryuta:||22||

    [4.22] "व्यापारी जी दामाद के साथ, संबंधियों और बहुत-से धन के साथ नगर के पास आ गए हैं।"

  23. श्रुत्वा दूतमुखाद्वाक्यं महाहर्षवती सती॥ सत्यपूजां तत: कृत्वा प्रोवाच तनुजां प्रति॥२३॥

    śrutvā dūtamukhādvākyaṃ mahāharṣavatī satī|| satyapūjāṃ tata: kṛtvā provāca tanujāṃ prati||23||

    [4.23] दूत के मुँह से यह सुनकर पतिव्रता लीलावती बहुत खुश हुई, सत्यनारायण की पूजा करके बेटी से बोली:

  24. व्रजामि शीधमागच्छ साधुसंदर्शनाय च॥ इति मातृवच: श्रुत्वा व्रतं कृत्वा समाप्य च॥२४॥

    vrajāmi śīdhamāgaccha sādhusaṃdarśanāya ca|| iti mātṛvaca: śrutvā vrataṃ kṛtvā samāpya ca||24||

    [4.24] "मैं पति से मिलने जा रही हूँ, तू भी जल्दी आ।" माँ की बात सुनकर कलावती ने व्रत करके समाप्त तो किया,

  25. प्रसादं च परित्यज्य गता सापि पतिं प्रति। तेन रुष्ट: सत्यदेवो भर्तारं तरर्णि तथा॥२५॥

    prasādaṃ ca parityajya gatā sāpi patiṃ prati| tena ruṣṭa: satyadevo bhartāraṃ tararṇi tathā||25||

    [4.25] पर प्रसाद छोड़कर वह भी पति से मिलने चली गई। इससे सत्यदेव रूठ गए, और उसके पति तथा नाव को,

  26. संहृत्य च धनै: सार्द्धं जले तस्यावमज्जयत्॥ तत: कलावती कन्या न विलोक्य निजं पतिम् ॥२६॥

    saṃhṛtya ca dhanai: sārddhaṃ jale tasyāvamajjayat|| tata: kalāvatī kanyā na vilokya nijaṃ patim ||26||

    [4.26] धन समेत उठाकर पानी में डुबा दिया। तब कलावती अपने पति को न देखकर,

  27. शोकेन महता तत्र रुदती चापतद भुवि॥ दृष्ट्वा तथाविधां नावं कन्यां च बहुदु:खिताम्।२७॥

    śokena mahatā tatra rudatī cāpatada bhuvi|| dṛṣṭvā tathāvidhāṃ nāvaṃ kanyāṃ ca bahudu:khitām|27||

    [4.27] बहुत शोक से रोती हुई ज़मीन पर गिर पड़ी। नाव की ऐसी दशा और बेटी को बहुत दुखी देखकर,

  28. भीतेन मनसा साधु: किमाश्चर्यमिदं भवेत् ॥ चिन्त्यमानाश्च ते सर्वे बभूवुस्तरिवाहका:॥२८॥

    bhītena manasā sādhu: kimāścaryamidaṃ bhavet || cintyamānāśca te sarve babhūvustarivāhakā:||28||

    [4.28] साधु डरे मन से सोचने लगा: "यह कैसा आश्चर्य हो गया?" नाव चलाने वाले भी सब चिंता में पड़ गए।

  29. ततो लीलावती कन्यां दृष्ट्वा सा विह्वलाभवत् ॥ विललापातिदुःखेन भर्तारं चेदमब्रवीत् ॥२९॥

    tato līlāvatī kanyāṃ dṛṣṭvā sā vihvalābhavat || vilalāpātiduḥkhena bhartāraṃ cedamabravīt ||29||

    [4.29] तब बेटी को देखकर लीलावती भी व्याकुल हो गई, बहुत दुख से रोती हुई पति से बोली:

  30. इदानीं नौकया सार्द्धं कथं सोऽभूदलक्षित:॥ न जाने कस्य देवस्य हेलया चैव सा हृता॥३०॥

    idānīṃ naukayā sārddhaṃ kathaṃ so'bhūdalakṣita:|| na jāne kasya devasya helayā caiva sā hṛtā||30||

    [4.30] "अभी-अभी नाव के साथ वह (दामाद) कैसे अदृश्य हो गया? न जाने किस देवता की अवहेलना से नाव छिन गई।"

  31. सत्यदेवस्य माहात्म्यं ज्ञातुं वा केन शक्यते॥ इत्युक्त्वा विललापैव ततश्व स्वजनै:सह ॥३१॥

    satyadevasya māhātmyaṃ jñātuṃ vā kena śakyate|| ityuktvā vilalāpaiva tataśva svajanai:saha ||31||

    [4.31] "सत्यदेव की महिमा कौन जान सकता है?" ऐसा कहकर वह अपनों के साथ विलाप करने लगी।

  32. ततो लीलावती कन्यां क्रोडे कृत्वा रुरोद ह॥ तत:कलावती कन्या नष्टे स्वामिनि दुःखिता॥३२॥

    tato līlāvatī kanyāṃ kroḍe kṛtvā ruroda ha|| tata:kalāvatī kanyā naṣṭe svāmini duḥkhitā||32||

    [4.32] फिर लीलावती बेटी को गोद में लेकर रोई। पति के खो जाने से दुखी कलावती,

  33. गृहीत्वा पादुकां तस्यानुगन्तुं च मनो दधे॥ कन्यायाश्चरितं दृष्ट्वा सभार्य: सज्जनो वणिक्।३३।

    gṛhītvā pādukāṃ tasyānugantuṃ ca mano dadhe|| kanyāyāścaritaṃ dṛṣṭvā sabhārya: sajjano vaṇik|33|

    [4.33] पति की खड़ाऊँ लेकर उसके पीछे जाने (प्राण त्यागने) का मन बना बैठी। बेटी का यह हाल देखकर पत्नी समेत वह सज्जन व्यापारी,

  34. अतिशोकेन सन्तप्तश्चिन्तयामास धर्मवित् ॥ हृतं वा सत्यदेवेन भ्रान्तोऽहं सत्यमायया॥३४॥

    atiśokena santaptaścintayāmāsa dharmavit || hṛtaṃ vā satyadevena bhrānto'haṃ satyamāyayā||34||

    [4.34] बहुत शोक से तपकर, धर्म जानने वाला वह सोचने लगा: "यह सत्यदेव ने ही छीना है; मैं सत्य की माया से भ्रमित हूँ।"

  35. सत्यपूजां करिष्यामि यथाविभवविस्तरै:॥ इति सर्वान्समाहूय कथयित्वा मनोरथम्॥३५॥

    satyapūjāṃ kariṣyāmi yathāvibhavavistarai:|| iti sarvānsamāhūya kathayitvā manoratham||35||

    [4.35] "मैं अपनी सामर्थ्य भर सत्यदेव की पूजा करूँगा।" ऐसा कहकर उसने सबको बुलाकर अपना मनोरथ बताया,

  36. नत्वा च दण्डवद् भूमौ सत्यदेवं पुन: पुन:॥ ततस्तुष्ट: सत्यदेवो दिनानां परिपालक:॥३६॥

    natvā ca daṇḍavad bhūmau satyadevaṃ puna: puna:|| tatastuṣṭa: satyadevo dinānāṃ paripālaka:||36||

    [4.36] और ज़मीन पर दंडवत होकर बार-बार सत्यदेव को प्रणाम किया। तब दीनों की रक्षा करने वाले सत्यदेव प्रसन्न हुए।

  37. जगाद वचनं चैनं कृपया भक्तवत्सल:॥ त्यक्त्वा प्रसादं ते कन्या पर्ति द्रष्टुं समागता॥३७॥

    jagāda vacanaṃ cainaṃ kṛpayā bhaktavatsala:|| tyaktvā prasādaṃ te kanyā parti draṣṭuṃ samāgatā||37||

    [4.37] भक्तों से प्रेम करने वाले भगवान ने कृपा करके (आकाशवाणी में) कहा: "तुम्हारी बेटी प्रसाद छोड़कर पति को देखने आई है।"

  38. अतोऽदृष्टोऽभवत्तस्या: कन्यकाया: पतिर्ध्रुवम् ॥ गृहं गत्वाप्रसादं च भुक्त्वा साऽऽयाति चेत्पुन:।३८।

    ato'dṛṣṭo'bhavattasyā: kanyakāyā: patirdhruvam || gṛhaṃ gatvāprasādaṃ ca bhuktvā sā''yāti cetpuna:|38|

    [4.38] "इसीलिए उसका पति अदृश्य हो गया है। यदि वह घर जाकर प्रसाद खाकर फिर आए,"

  39. लब्धभर्त्री सुता साधो भविष्यति न संशय:॥ कन्यका तादृशं वाक्यं श्रुत्वा गगनमण्डलात्।३९॥

    labdhabhartrī sutā sādho bhaviṣyati na saṃśaya:|| kanyakā tādṛśaṃ vākyaṃ śrutvā gaganamaṇḍalāt|39||

    [4.39] "तो हे साधु, तुम्हारी बेटी को उसका पति ज़रूर मिलेगा, इसमें शक नहीं।" आकाश से आई यह बात सुनकर कलावती,

  40. क्षिप्रं तदा गृहं गत्वा प्रसादं च बुभोज सा॥ सा पश्चात्पुनरागत्य ददर्श स्वजनं पतिम् ॥४०॥

    kṣipraṃ tadā gṛhaṃ gatvā prasādaṃ ca bubhoja sā|| sā paścātpunarāgatya dadarśa svajanaṃ patim ||40||

    [4.40] तुरंत घर गई और प्रसाद खाया। फिर लौटकर आई तो उसने अपने पति और सब अपनों को देखा।

  41. तत: कलावती कन्या जगाद पितरं प्रति॥ इदानीं च गृहं याहि विलम्बं कुरुषे कथम्॥४१॥

    tata: kalāvatī kanyā jagāda pitaraṃ prati|| idānīṃ ca gṛhaṃ yāhi vilambaṃ kuruṣe katham||41||

    [4.41] तब कलावती ने पिता से कहा: "अब घर चलिए, देर क्यों कर रहे हैं?"

  42. तच्छुत्वा कन्यकावाक्यं सन्तुष्टोऽभूद्वणिक्सुत:॥ पूजनं सत्यदेवस्य कृत्वा विधिविधानत:॥४२॥

    tacchutvā kanyakāvākyaṃ santuṣṭo'bhūdvaṇiksuta:|| pūjanaṃ satyadevasya kṛtvā vidhividhānata:||42||

    [4.42] बेटी की बात सुनकर व्यापारी बहुत संतुष्ट हुआ, और विधि-विधान से सत्यदेव की पूजा करके,

  43. धनैर्बन्धुगणै: सार्धं जगाम निजमन्दिरम्॥ पौर्णमास्यां च सङ्क्रा:तौकृतवा:सत्यपूजनम्।४३।

    dhanairbandhugaṇai: sārdhaṃ jagāma nijamandiram|| paurṇamāsyāṃ ca saṅkrā:taukṛtavā:satyapūjanam|43|

    [4.43] धन और संबंधियों के साथ अपने घर गया। (उसके बाद वह) पूर्णिमा और संक्रांति को सत्यनारायण की पूजा करता रहा।

  44. इहलोके सुखं भुक्त्वा चान्ते सत्यपुरं ययौ॥४४॥

    ihaloke sukhaṃ bhuktvā cānte satyapuraṃ yayau||44||

    [4.44] इस लोक में सुख भोगकर अंत में वह सत्यपुर (भगवान के धाम) को गया।

पञ्चम अध्याय (24 श्लोक)

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  1. सूत उवाच अथान्यच्च प्रवक्ष्यामि शृणुध्वं मुनिसत्तमाः। आसीत् तुङ्गध्वजो राजा प्रजापालनतत्परः॥१॥

    sūta uvāca athānyacca pravakṣyāmi śṛṇudhvaṃ munisattamāḥ| āsīt tuṅgadhvajo rājā prajāpālanatatparaḥ||1||

    [5.1] सूत जी बोले: हे श्रेष्ठ मुनियो, अब एक और कथा सुनिए। तुंगध्वज नाम का एक राजा था, जो प्रजा के पालन में लगा रहता था।

  2. प्रसादं सत्यदेवस्य त्यक्त्वा दुःखमवाप सः। एकदा स वनं गत्वा हत्वा बहुविधान् पशून्॥ २॥

    prasādaṃ satyadevasya tyaktvā duḥkhamavāpa saḥ| ekadā sa vanaṃ gatvā hatvā bahuvidhān paśūn|| 2||

    [5.2] उसने सत्यदेव का प्रसाद छोड़कर दुख पाया। एक बार वह वन में गया और बहुत-से पशुओं का शिकार किया।

  3. आगत्य वटमूलं च दृष्ट्वा सत्यस्य पूजनम्। गोपाः कुर्वन्ति संतुष्टा भक्तियुक्ताः सबान्धवाः॥३॥

    āgatya vaṭamūlaṃ ca dṛṣṭvā satyasya pūjanam| gopāḥ kurvanti saṃtuṣṭā bhaktiyuktāḥ sabāndhavāḥ||3||

    [5.3] लौटते हुए बरगद के पेड़ के नीचे उसने देखा कि ग्वाले (गोप) अपने परिवार के साथ भक्ति और खुशी से सत्यदेव की पूजा कर रहे हैं।

  4. राजा दृष्ट्वा तु दर्पेण न गतो न ननाम सः। ततो गोपगणाः सर्वे प्रसादं नृपसन्निधौ॥४॥

    rājā dṛṣṭvā tu darpeṇa na gato na nanāma saḥ| tato gopagaṇāḥ sarve prasādaṃ nṛpasannidhau||4||

    [5.4] राजा ने यह देखा, पर घमंड के कारण न वहाँ गया, न प्रणाम किया। फिर सब ग्वालों ने प्रसाद राजा के पास,

  5. संस्थाप्य पुनरागत्य भुक्त्वा सर्वे यथेप्सितम्। ततः प्रसादं संत्यज्य राजा दुःखमवाप सः॥५॥

    saṃsthāpya punarāgatya bhuktvā sarve yathepsitam| tataḥ prasādaṃ saṃtyajya rājā duḥkhamavāpa saḥ||5||

    [5.5] रख दिया, लौटकर सबने इच्छा भर प्रसाद खाया। पर प्रसाद छोड़ देने से राजा को दुख मिला।

  6. तस्य पुत्रशतं नष्टं धनधान्यादिकं च यत्। सत्यदेवेन तत्सर्वं नाशितं मम निश्चितम् ॥६ ॥

    tasya putraśataṃ naṣṭaṃ dhanadhānyādikaṃ ca yat| satyadevena tatsarvaṃ nāśitaṃ mama niścitam ||6 ||

    [5.6] उसके सौ पुत्र और सारा धन-धान्य नष्ट हो गया। (राजा ने सोचा:) "यह सब निश्चित ही सत्यदेव ने नष्ट किया है।"

  7. अतस्तत्रैव गच्छामि यत्र देवस्य पूजनम्। मनसा तु विनिश्चित्य ययौ गोपालसन्निधौ॥७॥

    atastatraiva gacchāmi yatra devasya pūjanam| manasā tu viniścitya yayau gopālasannidhau||7||

    [5.7] "इसलिए मैं वहीं जाऊँगा जहाँ भगवान की पूजा हो रही थी।" मन में यह तय करके वह ग्वालों के पास गया।

  8. ततोऽसौ सत्यदेवस्य पूजां गोपगणैः सह। भक्तिश्रद्धान्वितो भूत्वा चकार विधिना नृपः॥८॥

    tato'sau satyadevasya pūjāṃ gopagaṇaiḥ saha| bhaktiśraddhānvito bhūtvā cakāra vidhinā nṛpaḥ||8||

    [5.8] फिर राजा ने ग्वालों के साथ भक्ति और श्रद्धा से विधि के अनुसार सत्यदेव की पूजा की।

  9. सत्यदेवेन प्रसादेन धनपुत्रान्वितोऽभवत् । इहलोके सुखं भुक्त्वा चान्ते सत्यपुरं ययौ॥९॥

    satyadevena prasādena dhanaputrānvito'bhavat | ihaloke sukhaṃ bhuktvā cānte satyapuraṃ yayau||9||

    [5.9] सत्यदेव की कृपा से वह फिर धन और पुत्रों से संपन्न हुआ, इस लोक में सुख भोगकर अंत में सत्यपुर गया।

  10. य इदं कुरुते सत्यव्रतं परमदुर्लभम्। शृणोति च कथां पुण्यां भक्तियुक्तः फलप्रदाम् ॥१०॥

    ya idaṃ kurute satyavrataṃ paramadurlabham| śṛṇoti ca kathāṃ puṇyāṃ bhaktiyuktaḥ phalapradām ||10||

    [5.10] जो यह परम दुर्लभ सत्य-व्रत करता है, और भक्ति से यह पुण्य और फल देने वाली कथा सुनता है,

  11. धनधान्यादिकं तस्य भवेत् सत्यप्रसादतः। दरिद्रो लभते वित्तं बद्धो मुच्येत् बन्धनात् ॥ ११॥

    dhanadhānyādikaṃ tasya bhavet satyaprasādataḥ| daridro labhate vittaṃ baddho mucyet bandhanāt || 11||

    [5.11] सत्यदेव की कृपा से उसे धन-धान्य मिलता है। गरीब को धन मिलता है, बंधन में पड़ा व्यक्ति बंधन से छूटता है।

  12. भीतो भयात् प्रमुच्येत् सत्यमेव न संशयः। ईप्सितं च फलं भुक्त्वा चान्ते सत्यपुरं व्रजेत् ॥ १२ ॥

    bhīto bhayāt pramucyet satyameva na saṃśayaḥ| īpsitaṃ ca phalaṃ bhuktvā cānte satyapuraṃ vrajet || 12 ||

    [5.12] डरा हुआ व्यक्ति डर से छूट जाता है, यह सच है, इसमें शक नहीं। मनचाहा फल भोगकर अंत में वह सत्यपुर जाता है।

  13. इति वः कथितं विप्राः सत्यनारायणव्रतम्। यत् कृत्वा सर्वदुः खेभ्यो मुक्तो भवति मानवः॥१३॥

    iti vaḥ kathitaṃ viprāḥ satyanārāyaṇavratam| yat kṛtvā sarvaduḥ khebhyo mukto bhavati mānavaḥ||13||

    [5.13] हे ब्राह्मणो, इस तरह मैंने आपको सत्यनारायण का व्रत बताया, जिसे करके मनुष्य सब दुखों से छूट जाता है।

  14. विशेषतः कलियुगे सत्यपूजा फलप्रदा। केचित् कालं वदिष्यन्ति सत्यमीशं तमेव च॥ १४॥

    viśeṣataḥ kaliyuge satyapūjā phalapradā| kecit kālaṃ vadiṣyanti satyamīśaṃ tameva ca|| 14||

    [5.14] खासकर कलियुग में सत्य (सत्यनारायण) की पूजा फल देने वाली है। कुछ लोग उन्हें 'काल', कुछ 'सत्य', कुछ 'ईश' कहेंगे।

  15. सत्यनारायणं केचित् सत्यदेवं तथापरे। नानारूपधरो भूत्वा सर्वेषामीप्सितप्रदम्॥१५॥

    satyanārāyaṇaṃ kecit satyadevaṃ tathāpare| nānārūpadharo bhūtvā sarveṣāmīpsitapradam||15||

    [5.15] कुछ 'सत्यनारायण' और दूसरे 'सत्यदेव' कहेंगे। अनेक रूप धरकर वे सबकी मनोकामना पूरी करते हैं।

  16. भविष्यति कलौ सत्यव्रतरूपी सनातनः। श्रीविष्णुना धृतं रूपं सर्वेषामीप्सितप्रदम्॥१६॥

    bhaviṣyati kalau satyavratarūpī sanātanaḥ| śrīviṣṇunā dhṛtaṃ rūpaṃ sarveṣāmīpsitapradam||16||

    [5.16] कलियुग में सनातन भगवान सत्य-व्रत के रूप में होंगे; भगवान विष्णु ने यह रूप सबकी इच्छा पूरी करने के लिए धारण किया है।

  17. य इदं पठेत् नित्यं शृणोति मुनिसत्तमाः। तस्य नश्यन्ति पापानि सत्यदेवप्रसादतः॥१७॥

    ya idaṃ paṭhet nityaṃ śṛṇoti munisattamāḥ| tasya naśyanti pāpāni satyadevaprasādataḥ||17||

    [5.17] हे श्रेष्ठ मुनियो, जो इसे रोज़ पढ़ता या सुनता है, सत्यदेव की कृपा से उसके पाप नष्ट हो जाते हैं।

  18. व्रतं वैस्तु कृतं पूर्व सत्यनारायणस्य च। तेषां त्वपरजन्मानि कथयामि मुनीश्वराः॥१८॥

    vrataṃ vaistu kṛtaṃ pūrva satyanārāyaṇasya ca| teṣāṃ tvaparajanmāni kathayāmi munīśvarāḥ||18||

    [5.18] हे मुनीश्वरो, जिन्होंने पहले सत्यनारायण का व्रत किया था, अब उनके अगले जन्मों की बात बताता हूँ।

  19. शतानन्दो महाप्राज्ञः सुदामा ब्राह्मणो ह्यभूत्। तस्मिञ्जन्मनि श्रीकृष्णं ध्यात्वा मोक्षमवाप ह ॥१९॥

    śatānando mahāprājñaḥ sudāmā brāhmaṇo hyabhūt| tasmiñjanmani śrīkṛṣṇaṃ dhyātvā mokṣamavāpa ha ||19||

    [5.19] बड़े बुद्धिमान ब्राह्मण शतानंद (अगले जन्म में) सुदामा ब्राह्मण हुए, और उस जन्म में श्रीकृष्ण का ध्यान करके मोक्ष पाया।

  20. काष्ठभारवहो भिल्लो गुहराजो बभूव ह। तस्मिञ्जन्मनि श्रीरामं सेव्य मोक्षं जगाम वै॥ २०॥

    kāṣṭhabhāravaho bhillo guharājo babhūva ha| tasmiñjanmani śrīrāmaṃ sevya mokṣaṃ jagāma vai|| 20||

    [5.20] लकड़ी ढोने वाला लकड़हारा भीलों का राजा गुह बना, और उस जन्म में श्रीराम की सेवा करके मोक्ष पाया।

  21. उल्कामुखो महाराजो नृपो दशरथोऽभवत्। श्रीरङ्गनाथं सम्पूज्य श्रीवैकुण्ठं तदागमत् ॥२१॥

    ulkāmukho mahārājo nṛpo daśaratho'bhavat| śrīraṅganāthaṃ sampūjya śrīvaikuṇṭhaṃ tadāgamat ||21||

    [5.21] महाराज उल्कामुख राजा दशरथ बने, और श्रीरंगनाथ (भगवान विष्णु) की पूजा करके वैकुंठ गए।

  22. धार्मिकः सत्यसन्धश्च साधुर्मोरध्वजोऽभवत्। देहार्धं क्रकचैश्छित्त्वा दत्त्वा मोक्षमवाप ह॥२२॥

    dhārmikaḥ satyasandhaśca sādhurmoradhvajo'bhavat| dehārdhaṃ krakacaiśchittvā dattvā mokṣamavāpa ha||22||

    [5.22] धर्मात्मा और सच्चे वचन वाला साधु व्यापारी (राजा) मोरध्वज बना; उसने आरे से (पुत्र की) आधी देह कटवाकर दान दी और मोक्ष पाया।

  23. तुङ्गध्वजो महाराजः स्वायम्भुवोऽभवत् किल। सर्वान् भागवतान् कृत्वा श्रीवैकुण्ठं तदाऽगमत्॥ २३॥

    tuṅgadhvajo mahārājaḥ svāyambhuvo'bhavat kila| sarvān bhāgavatān kṛtvā śrīvaikuṇṭhaṃ tadā'gamat|| 23||

    [5.23] महाराज तुंगध्वज स्वायंभुव (मनु) हुए; सबको भगवान का भक्त बनाकर वे वैकुंठ गए।

  24. भूत्वा गोपाश्च ते सर्वे व्रजमण्डलवासिनः। निहत्य राक्षसान् सर्वान् गोलोकं तु तदा ययुः॥२४ ॥

    bhūtvā gopāśca te sarve vrajamaṇḍalavāsinaḥ| nihatya rākṣasān sarvān golokaṃ tu tadā yayuḥ||24 ||

    [5.24] वे सब ग्वाले (अगले जन्म में) व्रज के निवासी गोप बने, और सब राक्षसों को मारकर गोलोक गए।

Not yet included (TODO)

  • Detailed pūjā steps (saṅkalpa, kalaśa sthāpana, Gaṇeśa/Navagraha pūjā, ṣoḍaśopacāra with mantras): no public-domain paddhati verified yet (candidates: old Hindi/Sanskrit ‘Satyanārāyaṇa pūjā vidhi’ prints on archive.org need dating and author checks)
  • Samagri beyond what the kathā names
  • Āratī text (no PD source verified)
  • Priest verification

Text note: Sanskrit verses from the Wikisource transcription; two obvious typos corrected (noted on the steps).