संतोषी माता व्रत (शुक्रवार)
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Overview · परिचय
संतोषी माता का व्रत शुक्रवार को किया जाता है — गुड़ और भुने चने का भोग, कथा, आरती; व्रत के दिन खट्टी चीज़ न खाना और न किसी को खिलाना। मनोकामना पूरी होने पर उद्यापन किया जाता है।
Folk vrata kathā (लोक कथा): it has no known Sanskrit original, so none is shown. The story below is our own simple-Hindi retelling of the traditional tale (not copied from any printed edition). Draft, under review.
संतोषी माता की व्रत कथा (लोक कथा)
यह लोक कथा है — इसका कोई संस्कृत मूल ज्ञात नहीं है, इसलिए संस्कृत नहीं दिखाई गई। कथा अलग-अलग क्षेत्रों में थोड़े अंतर से कही जाती है; यहाँ पारंपरिक कथा हमारे अपने सरल शब्दों में है (किसी छपी पुस्तक से नकल नहीं)। अपने परिवार की परंपरा के अनुसार पढ़ें। draft, समीक्षा बाकी।
कथा (10 अंश)
[1] एक बुढ़िया के सात बेटे थे। छह बेटे कमाते थे, सबसे छोटा बेटा कुछ नहीं कमाता था। माँ छहों को अच्छा भोजन खिलाती और छोटे को उनकी जूठन दे देती।
[2] छोटे बेटे की पत्नी ने एक दिन यह बात उसे बताई। दुखी होकर वह परदेस कमाने चला गया। जाते समय उसने अपनी अंगूठी पत्नी को निशानी के रूप में दी।
[3] परदेस में वह एक सेठ की दुकान पर काम करने लगा और मेहनत से धीरे-धीरे उसका साझेदार बन गया। पर काम में डूबकर वह घर और पत्नी को भूल गया।
[4] इधर घर में सास और जेठानियाँ बहू से दिन भर कठोर काम करवातीं, जंगल से लकड़ी मँगवातीं और उसे भूसी की रोटी और नारियल के खोल में पानी देतीं।
[5] एक दिन लकड़ी लाते समय उसने कुछ स्त्रियों को संतोषी माता का व्रत करते देखा। उनसे विधि पूछी — शुक्रवार को गुड़-चने का भोग, कथा सुनना, और उस दिन खटाई से बचना। उसने भी श्रद्धा से व्रत शुरू किया।
[6] माता की कृपा से कुछ ही शुक्रवारों में पति की चिट्ठी और पैसे आने लगे। माता ने सपने में उसके पति को उसकी याद दिलाई। वह धन-दौलत लेकर घर लौटा और पत्नी के साथ अलग घर में सुख से रहने लगा।
[7] मनोकामना पूरी होने पर बहू ने उद्यापन रखा और जेठानियों के बच्चों को भोजन पर बुलाया। जलन के कारण जेठानियों ने बच्चों को सिखाया कि खटाई माँगें। बच्चों की ज़िद पर बहू ने उन्हें पैसे दे दिए और उन्होंने उनसे इमली खरीदकर खा ली।
[8] नियम टूटने से माता रुष्ट हो गईं, और राजा के सिपाही उसके पति को (झूठे संदेह में) पकड़ ले गए। बहू ने रोकर माता से क्षमा माँगी और फिर से पूरे नियम के साथ उद्यापन करने का संकल्प लिया।
[9] दूसरी बार उसने ब्राह्मणों के बच्चों को भोजन कराया और दक्षिणा में पैसे नहीं, फल दिए। माता प्रसन्न हुईं; पति छूटकर घर आ गया और कुछ समय बाद उन्हें सुंदर पुत्र हुआ।
[10] एक दिन माता स्वयं भयंकर रूप में बहू की परीक्षा लेने आईं। सास-जेठानियाँ डर गईं, पर बहू ने माता को पहचानकर प्रणाम किया। तब सबको अपनी भूल समझ आई और पूरा परिवार माता का भक्त बन गया। बोलो संतोषी माता की जय।
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