करवा चौथ व्रत
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Overview · परिचय
करवा चौथ कार्तिक कृष्ण चतुर्थी को सुहागिन स्त्रियाँ पति की लंबी आयु के लिए रखती हैं: दिन भर निर्जल उपवास, शाम को करवा (मिट्टी का पात्र) सहित गौरी-गणेश की पूजा, कथा सुनना, और चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत खोलना।
Folk vrata kathā (लोक कथा): it has no known Sanskrit original, so none is shown. The story below is our own simple-Hindi retelling of the traditional tale (not copied from any printed edition). Draft, under review.
करवा चौथ की कथा — वीरवती की कथा (लोक कथा)
यह लोक कथा है — इसका कोई संस्कृत मूल ज्ञात नहीं है, इसलिए संस्कृत नहीं दिखाई गई। कथा अलग-अलग क्षेत्रों में थोड़े अंतर से कही जाती है; यहाँ पारंपरिक कथा हमारे अपने सरल शब्दों में है (किसी छपी पुस्तक से नकल नहीं)। अपने परिवार की परंपरा के अनुसार पढ़ें। draft, समीक्षा बाकी।
कथा (9 अंश)
[1] बहुत पहले की बात है। एक साहूकार के सात बेटे और एक बेटी थी, जिसका नाम वीरवती था। सातों भाई अपनी इकलौती बहन को बहुत प्यार करते थे।
[2] विवाह के बाद पहली करवा चौथ पर वीरवती मायके आई हुई थी। उसने भाभियों के साथ सुबह से निर्जल व्रत रखा। शाम होते-होते भूख-प्यास से वह बहुत व्याकुल हो गई।
[3] भाइयों से बहन की यह हालत देखी नहीं गई। उन्होंने सोचा कि किसी तरह बहन व्रत खोल ले। एक भाई पेड़ पर चढ़ गया और छलनी के पीछे दीपक जलाकर ऐसा दिखाया मानो चाँद निकल आया हो।
[4] भाइयों ने कहा, "बहन, चाँद निकल आया है, अर्घ्य देकर भोजन कर लो।" भोली वीरवती ने उसी को चाँद समझकर अर्घ्य दिया और भोजन करने बैठ गई।
[5] पहला कौर तोड़ते ही उसमें बाल निकला, दूसरे कौर पर छींक आई, और तीसरे कौर के समय ससुराल से संदेश आया कि उसके पति बहुत बीमार हैं (कई कथनों में: पति के प्राण संकट में हैं)।
[6] वीरवती घबराकर ससुराल पहुँची। उसे समझ आ गया कि अधूरे व्रत के कारण यह संकट आया है। उसने निश्चय किया कि वह अपने पति को फिर से स्वस्थ करवाकर ही रहेगी।
[7] पूरे वर्ष वह पति की सेवा करती रही और हर चतुर्थी का व्रत श्रद्धा से करती रही। माता गौरी (कुछ कथनों में इंद्राणी) उसकी भक्ति और धैर्य से प्रसन्न हुईं।
[8] अगली करवा चौथ आई तो वीरवती ने पूरे नियम से, निर्जल रहकर, असली चाँद को देखकर ही अर्घ्य दिया और व्रत खोला। माता की कृपा से उसका पति पूरी तरह स्वस्थ हो गया।
[9] तभी से मान्यता है कि जो स्त्री करवा चौथ का व्रत श्रद्धा और सच्चाई से, बिना छल के पूरा करती है, उसका सुहाग अखंड रहता है। हे करवा माता, जैसे वीरवती का सुहाग लौटाया, वैसे सबका सुहाग बनाए रखना।
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