श्रीकृष्ण जन्माष्टमी
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Overview · परिचय
सम्पूर्ण जन्माष्टमी व्रत कथा — मूल संस्कृत (८० श्लोक)
व्रतराज (१८९७) के स्कैन (पृष्ठ १३६–१३८) से हमारे द्वारा श्लोक-दर-श्लोक लिखी गई; ग्रंथ इसे भविष्योत्तर पुराण की बताता है (हमने पुराण से मिलान नहीं किया)। पंडित जी से प्रूफ़ जाँच बाकी — draft। सरल हिंदी अर्थ हमारा अपना है।
जन्माष्टमी व्रत कथा (80 श्लोक)
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युधिष्ठिर उवाच ॥ जन्माष्टमीव्रतं ब्रूहि विस्तरेण ममाच्युत ॥ कस्मिन्काले समुत्पन्नं किं पुण्यं को विधिः स्मृतः ॥ १ ॥
yudhiṣṭhira uvāca || janmāṣṭamīvrataṃ brūhi vistareṇa mamācyuta || kasminkāle samutpannaṃ kiṃ puṇyaṃ ko vidhiḥ smṛtaḥ || 1 ||
[1] युधिष्ठिर बोले: "हे अच्युत, मुझे जन्माष्टमी व्रत विस्तार से बताइए — यह कब से चला, इसका पुण्य क्या है और इसकी विधि क्या है?"
श्रीकृष्ण उवाच ॥ मल्लयुद्धे परावृत्ते शमिते कुकुरान्धके ॥ स्वजनैर्बन्धुभिः स्त्रीभिः समैः स्निग्धैः समावृते ॥ २ ॥
śrīkṛṣṇa uvāca || mallayuddhe parāvṛtte śamite kukurāndhake || svajanairbandhubhiḥ strībhiḥ samaiḥ snigdhaiḥ samāvṛte || 2 ||
[2] श्रीकृष्ण बोले: "जब मल्लयुद्ध समाप्त हो गया, कुकुर-अंधक वंश में शांति हुई, और मैं अपने स्वजनों, बंधुओं, स्त्रियों और प्रेमी मित्रों से घिरा था,"
हते कंसासुरे दुष्टे मथुरायां युधिष्ठिर ॥ देवकी मां परिष्वज्य कृत्वोत्सङ्गे रुरोद ह ॥ ३ ॥
hate kaṃsāsure duṣṭe mathurāyāṃ yudhiṣṭhira || devakī māṃ pariṣvajya kṛtvotsaṅge ruroda ha || 3 ||
[3] "हे युधिष्ठिर, मथुरा में दुष्ट कंस के मारे जाने पर माता देवकी ने मुझे गले लगाया, गोद में बिठाया और (खुशी से) रो पड़ीं।"
वसुदेवोऽपि तत्रैव वात्सल्यात्प्ररुरोद ह ॥ समालिङ्ग्याश्रुवदनः पुत्र पुत्रेत्युवाच ह ॥ ४ ॥
vasudevo'pi tatraiva vātsalyātpraruroda ha || samāliṅgyāśruvadanaḥ putra putretyuvāca ha || 4 ||
[4] "पिता वसुदेव भी वहीं स्नेह से रो पड़े; आँसू भरे मुख से गले लगाकर 'बेटा, बेटा' कहने लगे।"
सगद्गदस्वरो दीनो बाष्पपर्याकुलेक्षणः ॥ बलभद्रं च मां चैव परिष्वज्य मुदा पुनः ॥ ५ ॥
sagadgadasvaro dīno bāṣpaparyākulekṣaṇaḥ || balabhadraṃ ca māṃ caiva pariṣvajya mudā punaḥ || 5 ||
[5] "भरे गले से, आँसुओं से भरी आँखों के साथ, उन्होंने बलराम को और मुझे फिर खुशी से गले लगाया,"
अद्य मे सफलं जन्म जीवितं च सुजीवितम् ॥ उभाभ्यामद्य पुत्राभ्यां समुद्भूतः समागमः ॥ ६ ॥
adya me saphalaṃ janma jīvitaṃ ca sujīvitam || ubhābhyāmadya putrābhyāṃ samudbhūtaḥ samāgamaḥ || 6 ||
[6] "(और कहा:) 'आज मेरा जन्म सफल हुआ, मेरा जीवन धन्य हुआ, क्योंकि आज दोनों पुत्रों से मिलन हुआ।'"
एवं हर्षेण दाम्पत्यं हृष्टं पुष्टं तदा ह्यभूत् ॥ प्रणिपत्य जनाः सर्वे बभूवुस्ते प्रहर्षिताः ॥ ७ ॥
evaṃ harṣeṇa dāmpatyaṃ hṛṣṭaṃ puṣṭaṃ tadā hyabhūt || praṇipatya janāḥ sarve babhūvuste praharṣitāḥ || 7 ||
[7] "इस तरह वह दंपति (देवकी-वसुदेव) आनंद से भर गया। सब लोगों ने प्रणाम किया और बहुत प्रसन्न हुए।"
एवं महोत्सवं दृष्ट्वा मामूचुर्मधुसूदनम् ॥ जना ऊचुः ॥ प्रसादः क्रियतामस्य लोकस्यार्तस्य दुःखहन् ॥ ८ ॥
evaṃ mahotsavaṃ dṛṣṭvā māmūcurmadhusūdanam || janā ūcuḥ || prasādaḥ kriyatāmasya lokasyārtasya duḥkhahan || 8 ||
[8] "ऐसा महोत्सव देखकर लोगों ने मुझसे कहा: 'हे दुख हरने वाले, इन दुखी लोगों पर कृपा कीजिए।'"
यस्मिन्दिने च प्रासूत देवकी त्वां जनार्दन ॥ तद्दिनं देहि वैकुण्ठ कुर्मस्तत्र महोत्सवम् ॥ ९ ॥
yasmindine ca prāsūta devakī tvāṃ janārdana || taddinaṃ dehi vaikuṇṭha kurmastatra mahotsavam || 9 ||
[9] "'हे जनार्दन, जिस दिन देवकी ने आपको जन्म दिया, वह दिन हमें बताइए, हे वैकुंठ, हम उस दिन महोत्सव मनाएँगे।'"
एवं स्तुतो जनौघेन वसुदेवो मयेक्षितः ॥ विलोक्य बलभद्रं च मां च हृष्टतनूरुहः ॥ १० ॥
evaṃ stuto janaughena vasudevo mayekṣitaḥ || vilokya balabhadraṃ ca māṃ ca hṛṣṭatanūruhaḥ || 10 ||
[10] "लोगों की ऐसी प्रार्थना पर मैंने वसुदेव जी की ओर देखा; बलराम को और मुझे देखकर उनके रोंगटे खड़े हो गए,"
उवाच सममादेशाल्लोकाञ्जन्माष्टमीव्रतम् ॥ मथुरायां ततः पश्चात्पार्थ सम्यक्प्रकाशितम् ॥ ११ ॥
uvāca samamādeśāllokāñjanmāṣṭamīvratam || mathurāyāṃ tataḥ paścātpārtha samyakprakāśitam || 11 ||
[11] "और मेरी आज्ञा से उन्होंने लोगों को जन्माष्टमी व्रत बताया। हे पार्थ, तभी से मथुरा में यह व्रत अच्छी तरह प्रसिद्ध हुआ।"
कुर्वन्तु ब्राह्मणाः सर्वे व्रतं जन्माष्टमीदिने ॥ क्षत्रिया वैश्यजातीयाः शूद्रा येऽन्येऽपि धर्मिणः ॥ १२ ॥
kurvantu brāhmaṇāḥ sarve vrataṃ janmāṣṭamīdine || kṣatriyā vaiśyajātīyāḥ śūdrā ye'nye'pi dharmiṇaḥ || 12 ||
[12] "जन्माष्टमी के दिन सब ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और दूसरे सभी धर्म मानने वाले यह व्रत करें।"
युधिष्ठिर उवाच ॥ कीदृशं तद्व्रतं देव देवसवैरनुष्ठितम् ॥ जन्माष्टमीति संज्ञं च पवित्रं पापनाशनम् ॥ १३ ॥
yudhiṣṭhira uvāca || kīdṛśaṃ tadvrataṃ deva devasavairanuṣṭhitam || janmāṣṭamīti saṃjñaṃ ca pavitraṃ pāpanāśanam || 13 ||
[13] युधिष्ठिर बोले: "हे देव, सबके द्वारा किया जाने वाला, 'जन्माष्टमी' नाम का वह पवित्र और पाप नाश करने वाला व्रत कैसा है?"
येन त्वं तुष्टिमायासि कात्स्न्येन प्रभवाव्यय ॥ एतन्मे तत्त्वतो ब्रूहि सविधानं सविस्तरम् ॥ १४ ॥
yena tvaṃ tuṣṭimāyāsi kātsnyena prabhavāvyaya || etanme tattvato brūhi savidhānaṃ savistaram || 14 ||
[14] "हे अविनाशी प्रभु, जिससे आप पूरी तरह प्रसन्न होते हैं, वह विधि सहित विस्तार से सच-सच बताइए।"
श्रीकृष्ण उवाच ॥ मासि भाद्रपदेऽष्टम्यां निशीथे कृष्णपक्षके ॥ शशाङ्के वृषराशिस्थे ऋक्षे रोहिणिसंज्ञके ॥ १५ ॥
śrīkṛṣṇa uvāca || māsi bhādrapade'ṣṭamyāṃ niśīthe kṛṣṇapakṣake || śaśāṅke vṛṣarāśisthe ṛkṣe rohiṇisaṃjñake || 15 ||
[15] श्रीकृष्ण बोले: "भादों महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को, आधी रात में, जब चंद्रमा वृष राशि में और नक्षत्र रोहिणी था,"
योगेऽस्मिन्वसुदेवाद्धि देवकी मामजीजनत् ॥ भगवत्याश्च तत्रैव क्रियते सुमहोत्सवः ॥ १६ ॥
yoge'sminvasudevāddhi devakī māmajījanat || bhagavatyāśca tatraiva kriyate sumahotsavaḥ || 16 ||
[16] "इसी योग में वसुदेव जी से देवकी ने मुझे जन्म दिया। उसी दिन भगवती (देवी) का भी बड़ा उत्सव किया जाता है।"
योगेऽस्मिन्कथितेऽष्टम्यां सिंहराशिगते रवौ ॥ सप्तम्यां लघु भुक्कुर्याद्दन्तधावनपूर्वकम् ॥ १७ ॥
yoge'sminkathite'ṣṭamyāṃ siṃharāśigate ravau || saptamyāṃ laghu bhukkuryāddantadhāvanapūrvakam || 17 ||
[17] "सूर्य सिंह राशि में हों, ऐसी इस अष्टमी के लिए: सप्तमी को दाँत साफ़ करके हल्का भोजन करें।"
उपवासस्य नियमं रात्रौ स्वप्याज्जितेन्द्रियः ॥ केवलेनोपवासेन तस्मिञ्जन्मदिने मम ॥ १८ ॥
upavāsasya niyamaṃ rātrau svapyājjitendriyaḥ || kevalenopavāsena tasmiñjanmadine mama || 18 ||
[18] "उपवास का नियम लेकर, इंद्रियों को वश में रखकर रात में सोएँ। मेरे उस जन्मदिन पर केवल उपवास करने से ही,"
सप्तजन्मकृतात्पापान्मुच्यते नात्र संशयः ॥ उपावृत्तस्य पापेभ्यो यस्तु वासो गुणैः सह ॥ १९ ॥
saptajanmakṛtātpāpānmucyate nātra saṃśayaḥ || upāvṛttasya pāpebhyo yastu vāso guṇaiḥ saha || 19 ||
[19] "मनुष्य सात जन्मों के पापों से छूट जाता है, इसमें संदेह नहीं। पापों से हटकर गुणों के साथ रहना ही,"
उपवासः स विज्ञेयः सर्वभोगविवर्जितः ॥ ततोऽष्टम्यां तिलैः स्नात्वा नद्यादौ विमले जले ॥ २० ॥
upavāsaḥ sa vijñeyaḥ sarvabhogavivarjitaḥ || tato'ṣṭamyāṃ tilaiḥ snātvā nadyādau vimale jale || 20 ||
[20] "सब भोग छोड़कर किया गया सच्चा उपवास समझना चाहिए। फिर अष्टमी को नदी आदि के साफ़ जल में तिल के साथ स्नान करें।"
सुदेशे शोभनं कुर्याद्देवक्याः सूतिकागृहम् ॥ सितपीतैस्तथा रक्तैः कर्बुरैर्हरितैरपि ॥ २१ ॥
sudeśe śobhanaṃ kuryāddevakyāḥ sūtikāgṛham || sitapītaistathā raktaiḥ karburairharitairapi || 21 ||
[21] "किसी अच्छी जगह देवकी जी का सुंदर सूतिका-गृह (प्रसव-कक्ष) बनाएँ — सफ़ेद, पीले, लाल, चितकबरे और हरे,"
वासोभिः शोभितं कृत्वा समन्तात्कलशैर्नवैः ॥ पुष्पैः फलैरनेकैश्च दीपालिभिरितस्ततः ॥ २२ ॥
vāsobhiḥ śobhitaṃ kṛtvā samantātkalaśairnavaiḥ || puṣpaiḥ phalairanekaiśca dīpālibhiritastataḥ || 22 ||
[22] "कपड़ों से सजाकर, चारों ओर नए कलश रखकर, अनेक फूलों, फलों और जगह-जगह दीपों की पंक्तियों से,"
पुष्पमालाविचित्रं च चन्दनागुरुधूपितम् ॥ अतिरम्यमनौपम्यं रक्षामणिविभूषितम् ॥ २३ ॥
puṣpamālāvicitraṃ ca candanāgurudhūpitam || atiramyamanaupamyaṃ rakṣāmaṇivibhūṣitam || 23 ||
[23] "फूलों की मालाओं से सुंदर, चंदन-अगरु की धूप से सुगंधित, बहुत मनोहर, अनुपम और रक्षा-मणियों से सजा हुआ (बनाएँ)।"
हरिवंशस्य चरितं गोकुलं चाविलेखयेत् ॥ ततो वादित्रनिर्नादैर्वीणावेणुरवाकुलम् ॥ २४ ॥
harivaṃśasya caritaṃ gokulaṃ cāvilekhayet || tato vāditranirnādairvīṇāveṇuravākulam || 24 ||
[24] "(दीवारों पर) हरिवंश की कथा और गोकुल का चित्र बनवाएँ। फिर बाजों, वीणा और बाँसुरी की ध्वनि से उसे गुंजा दें,"
नृत्यगीतक्रमोपेतं मङ्गलैश्च समन्ततः ॥ वेष्टकारिं लोहखड्गं कृष्णच्छागं च यत्नतः ॥ २५ ॥
nṛtyagītakramopetaṃ maṅgalaiśca samantataḥ || veṣṭakāriṃ lohakhaḍgaṃ kṛṣṇacchāgaṃ ca yatnataḥ || 25 ||
[25] "नाच-गान और मंगल-कार्य चारों ओर हों। (रक्षा के प्रतीक के रूप में) लोहे की तलवार, काला बकरा आदि भी ध्यान से रखें,"
द्वारे विन्यस्य मुसलं रक्षितं रक्षपालकैः ॥ षष्ठ्या चादेव्याधिष्ठितं च तद्गृहं चोत्सवैस्तथा ॥ २६ ॥
dvāre vinyasya musalaṃ rakṣitaṃ rakṣapālakaiḥ || ṣaṣṭhyā cādevyādhiṣṭhitaṃ ca tadgṛhaṃ cotsavaistathā || 26 ||
[26] "द्वार पर मूसल रखें, रक्षक पहरा दें; वह घर षष्ठी देवी से अधिष्ठित और उत्सवों से भरा हो।"
एवं विभवसारेण कृत्वा तत्सूतिकागृहम् ॥ तन्मध्ये प्रतिमा स्थाप्या सा चाप्यष्टविधा स्मृता ॥ २७ ॥
evaṃ vibhavasāreṇa kṛtvā tatsūtikāgṛham || tanmadhye pratimā sthāpyā sā cāpyaṣṭavidhā smṛtā || 27 ||
[27] "अपनी सामर्थ्य के अनुसार ऐसा सूतिका-गृह बनाकर उसके बीच (देवकी की) प्रतिमा रखें; प्रतिमा आठ प्रकार की बताई गई है:"
काञ्चनी राजती ताम्री पैत्तली मृन्मयी तथा ॥ वार्क्षी मणिमयी चैव वर्णकैर्लिखिता तथा ॥ २८ ॥
kāñcanī rājatī tāmrī paittalī mṛnmayī tathā || vārkṣī maṇimayī caiva varṇakairlikhitā tathā || 28 ||
[28] "सोने की, चाँदी की, ताँबे की, पीतल की, मिट्टी की, लकड़ी की, मणि की, या रंगों से चित्रित।"
सर्वलक्षणसंपूर्णा पर्यङ्के चाष्टशल्यके ॥ प्रतप्तकाञ्चनाभासां महार्हां सुतपस्विनीम् ॥ २९ ॥
sarvalakṣaṇasaṃpūrṇā paryaṅke cāṣṭaśalyake || prataptakāñcanābhāsāṃ mahārhāṃ sutapasvinīm || 29 ||
[29] "सब शुभ लक्षणों वाली, तपे सोने जैसी चमकती, आदरणीय, तपस्विनी देवकी को आठ पायों वाले पलंग पर,"
प्रसूतां च प्रसुप्तां च स्थापयेन्मञ्चकोपरि ॥ मां तत्र बालकं सुप्तं पर्यङ्के स्तनपायिनम् ॥ ३० ॥
prasūtāṃ ca prasuptāṃ ca sthāpayenmañcakopari || māṃ tatra bālakaṃ suptaṃ paryaṅke stanapāyinam || 30 ||
[30] "प्रसव के बाद लेटी हुई अवस्था में रखें; और वहीं पलंग पर मुझे सोते हुए, दूध पीते शिशु के रूप में,"
श्रीवत्सवक्षसं शान्तं नीलोत्पलदलच्छविम् ॥ यशोदां तत्र चैकस्मिन्प्रदेशे सूतिकागृहे ॥ ३१ ॥
śrīvatsavakṣasaṃ śāntaṃ nīlotpaladalacchavim || yaśodāṃ tatra caikasminpradeśe sūtikāgṛhe || 31 ||
[31] "छाती पर श्रीवत्स चिह्न वाला, शांत, नीले कमल की पंखुड़ी जैसा। उसी सूतिका-गृह के एक भाग में यशोदा जी को,"
तद्वच्च कल्पयेत्पार्थ प्रसूतां वरकन्यकाम् ॥ तथैव मम पार्श्वस्थाः कृताञ्जलिपुटा नृप ॥ ३२ ॥
tadvacca kalpayetpārtha prasūtāṃ varakanyakām || tathaiva mama pārśvasthāḥ kṛtāñjalipuṭā nṛpa || 32 ||
[32] "हे पार्थ, वैसे ही सुंदर कन्या को जन्म दिए हुए दिखाएँ। और हे राजन, मेरे आसपास हाथ जोड़े हुए,"
देवा ग्रहास्तथा नागा यक्षविद्याधरामराः ॥ प्रणताः पुष्पमालाग्रचारुहस्ताः सुरासुराः ॥ ३३ ॥
devā grahāstathā nāgā yakṣavidyādharāmarāḥ || praṇatāḥ puṣpamālāgracāruhastāḥ surāsurāḥ || 33 ||
[33] "देवता, ग्रह, नाग, यक्ष, विद्याधर, अमर — देव और असुर — हाथों में सुंदर फूलमालाएँ लिए झुके हुए दिखाएँ,"
संचरन्त इवाकाशे प्रहारैरुदितोदितैः ॥ वसुदेवोऽपि तत्रैव खड्गचर्मधरः स्थितः ॥ ३४ ॥
saṃcaranta ivākāśe prahārairuditoditaiḥ || vasudevo'pi tatraiva khaḍgacarmadharaḥ sthitaḥ || 34 ||
[34] "मानो आकाश में घूम रहे हों। वसुदेव जी भी वहीं तलवार और ढाल लिए खड़े दिखाएँ।"
कश्यपो वसुदेवोऽयमदितिश्चैव देवकी ॥ शेषो वै बलदेवोऽयं यशोदादितिरन्वभूत् ॥ ३५ ॥
kaśyapo vasudevo'yamaditiścaiva devakī || śeṣo vai baladevo'yaṃ yaśodāditiranvabhūt || 35 ||
[35] "ये वसुदेव (पूर्व के) कश्यप हैं और देवकी अदिति; बलदेव शेषनाग हैं; यशोदा भी (अदिति का ही अंश) हुईं।"
नन्दः प्रजापतिर्दक्षो गर्गश्चापि चतुर्मुखः ॥ गोप्यश्चाप्सरसश्चैव गोपाश्चापि दिवौकसः ॥ ३६ ॥
nandaḥ prajāpatirdakṣo gargaścāpi caturmukhaḥ || gopyaścāpsarasaścaiva gopāścāpi divaukasaḥ || 36 ||
[36] "नंद जी प्रजापति दक्ष हैं, गर्ग मुनि चतुर्मुख ब्रह्मा; गोपियाँ अप्सराएँ हैं और गोप देवता हैं।"
एषोऽवतारो राजेन्द्र कंसोऽयं कालनेमिजः ॥ तत्र कंसनियुक्ताश्च मोहिता योगनिद्रया ॥ ३७ ॥
eṣo'vatāro rājendra kaṃso'yaṃ kālanemijaḥ || tatra kaṃsaniyuktāśca mohitā yoganidrayā || 37 ||
[37] "हे राजेंद्र, यह मेरा अवतार है; कंस कालनेमि (असुर) से उत्पन्न है। वहाँ कंस के लगाए पहरेदार योगनिद्रा से मोहित (सोए) दिखाएँ।"
गोधेनुकुञ्जराश्चैव दानवाः शस्त्रपाणयः ॥ नृत्यन्तश्चाप्सरोभिस्ते गन्धर्वा गीततत्पराः ॥ ३८ ॥
godhenukuñjarāścaiva dānavāḥ śastrapāṇayaḥ || nṛtyantaścāpsarobhiste gandharvā gītatatparāḥ || 38 ||
[38] "गाय-बछड़े, हाथी, हथियार लिए दानव, अप्सराओं के साथ नाचते और गाते गंधर्व भी (चित्रित करें)।"
लेखनीयश्च तत्रैव कालियो यमुनाह्रदे ॥ इत्येवमादि यत्किंचिद्विद्यते चरितं मम ॥ ३९ ॥
lekhanīyaśca tatraiva kāliyo yamunāhrade || ityevamādi yatkiṃcidvidyate caritaṃ mama || 39 ||
[39] "वहीं यमुना के कुंड में कालिय नाग भी बनाएँ — इसी तरह मेरी जो भी लीलाएँ हैं,"
लेखयित्वा प्रयत्नेन पूजयेद्भक्तितत्परः ॥ रम्यमेवं बीजपूरैः पुष्पमालादिशोभितम् ॥ ४० ॥
lekhayitvā prayatnena pūjayedbhaktitatparaḥ || ramyamevaṃ bījapūraiḥ puṣpamālādiśobhitam || 40 ||
[40] "उन्हें यत्न से चित्रित करवाकर भक्ति से पूजा करें। इसे बिजौरा फलों और फूलमालाओं से सुंदर सजाएँ।"
कालदेशोद्भवैः पुष्पैः फलैश्चापि युधिष्ठिर ॥ पाद्यार्घ्यैः पूजयेद्भक्त्या गन्धपुष्पाक्षतैः सह ॥ मन्त्रेणानेन कौन्तेय देवकीं पूजयेन्नरः ॥ ४१ ॥
kāladeśodbhavaiḥ puṣpaiḥ phalaiścāpi yudhiṣṭhira || pādyārghyaiḥ pūjayedbhaktyā gandhapuṣpākṣataiḥ saha || mantreṇānena kaunteya devakīṃ pūjayennaraḥ || 41 ||
[41] "हे युधिष्ठिर, उस मौसम और स्थान के फूलों-फलों से, पाद्य, अर्घ्य, चंदन, फूल और अक्षत से भक्ति से पूजा करें। हे कुंतीपुत्र, इस मंत्र से देवकी जी की पूजा करें:"
गायद्भिः किन्नराद्यैः सततपरिवृता वेणुवीणानिनादैर्भृङ्गारादर्शकुम्भप्रवरवृतकरैः किंकरैः सेव्यमाना ॥ पर्यङ्के स्वास्तृते या मुदिततरमुखी पुत्रिणी सम्यगास्ते सा देवी देवमाता जयतु च सुसुता देवकी कान्तरूपा ॥ ४२ ॥
gāyadbhiḥ kinnarādyaiḥ satataparivṛtā veṇuvīṇāninādairbhṛṅgārādarśakumbhapravaravṛtakaraiḥ kiṃkaraiḥ sevyamānā || paryaṅke svāstṛte yā muditataramukhī putriṇī samyagāste sā devī devamātā jayatu ca susutā devakī kāntarūpā || 42 ||
[42] (मंत्र:) "जो गाते हुए किन्नरों से सदा घिरी हैं, बाँसुरी-वीणा की ध्वनि के बीच, झारी, दर्पण और कलश लिए सेवकों से सेवित हैं; जो अच्छे बिछे पलंग पर प्रसन्न मुख से, पुत्र के साथ बैठी हैं — वे सुंदर रूप वाली, श्रेष्ठ पुत्र की माता, देवमाता देवकी की जय हो।"
पादावभ्यञ्जयन्ती श्रीर्देवक्याश्चरणान्तिके ॥ निषण्णा पङ्कजे पूज्या दिव्यगन्धानुलेपनैः ॥ ४३ ॥
pādāvabhyañjayantī śrīrdevakyāścaraṇāntike || niṣaṇṇā paṅkaje pūjyā divyagandhānulepanaiḥ || 43 ||
[43] "देवकी के चरणों के पास कमल पर बैठी, उनके पैरों में तेल लगाती हुई लक्ष्मी जी की दिव्य चंदन आदि से पूजा करें।"
पङ्कजैः पूजयेद्देवीं नमो देव्यै श्रिया इति ॥ देववत्से नमस्तेऽस्तु कृष्णोत्पादनतत्परा ॥ ४४ ॥
paṅkajaiḥ pūjayeddevīṃ namo devyai śriyā iti || devavatse namaste'stu kṛṣṇotpādanatatparā || 44 ||
[44] "'नमो देव्यै श्रिया' कहकर कमलों से देवी की पूजा करें। (और कहें:) 'कृष्ण को जन्म देने वाली माँ, आपको नमस्कार,'"
पापक्षयकरा देवी तुष्टिं यातु मयार्चिता ॥ प्रणवादिनमोऽन्तं च पृथङ्नामानुकीर्तनम् ॥ ४५ ॥
pāpakṣayakarā devī tuṣṭiṃ yātu mayārcitā || praṇavādinamo'ntaṃ ca pṛthaṅnāmānukīrtanam || 45 ||
[45] "'पापों का नाश करने वाली देवी मेरी पूजा से प्रसन्न हों।' फिर हर एक का नाम 'ॐ' से शुरू करके 'नमः' पर समाप्त करते हुए अलग-अलग लें,"
कुर्यात्पूजाविधिज्ञश्च सर्वपापापनुत्तये ॥ देवक्यै वसुदेवाय वासुदेवाय चैव हि ॥ ४६ ॥
kuryātpūjāvidhijñaśca sarvapāpāpanuttaye || devakyai vasudevāya vāsudevāya caiva hi || 46 ||
[46] "पूजा-विधि जानने वाला सब पापों के नाश के लिए ऐसा करे — देवकी, वसुदेव, वासुदेव (कृष्ण),"
बलदेवाय नन्दाय यशोदायै पृथक्पृथक् ॥ क्षीरादिस्नपनं कृत्वा चन्दनेनानुलेपयेत् ॥ ४७ ॥
baladevāya nandāya yaśodāyai pṛthakpṛthak || kṣīrādisnapanaṃ kṛtvā candanenānulepayet || 47 ||
[47] "बलदेव, नंद और यशोदा — सबकी अलग-अलग। दूध आदि से स्नान कराकर चंदन लगाएँ।"
विध्यन्तरमपीच्छन्ति केचिदत्रैव सूरयः ॥ चन्द्रोदये शशाङ्काय अर्घ्यं दत्त्वा हरिं स्मरन् ॥ ४८ ॥
vidhyantaramapīcchanti kecidatraiva sūrayaḥ || candrodaye śaśāṅkāya arghyaṃ dattvā hariṃ smaran || 48 ||
[48] "कुछ विद्वान यहाँ एक और विधि भी मानते हैं: चंद्रमा उगने पर हरि को याद करते हुए चंद्रमा को अर्घ्य दें, (और ये नाम लें:)"
अनघं वामनं शौरिं वैकुण्ठं पुरुषोत्तमम् ॥ वासुदेवं हृषीकेशं माधवं मधुसूदनम् ॥ ४९ ॥
anaghaṃ vāmanaṃ śauriṃ vaikuṇṭhaṃ puruṣottamam || vāsudevaṃ hṛṣīkeśaṃ mādhavaṃ madhusūdanam || 49 ||
[49] "निष्पाप, वामन, शौरि, वैकुंठ, पुरुषोत्तम, वासुदेव, हृषीकेश, माधव, मधुसूदन,"
वराहं पुण्डरीकाक्षं नृसिंहं ब्राह्मणप्रियम् ॥ समस्तस्यापि जगतः सृष्टिस्थित्यन्तकारकम् ॥ ५० ॥
varāhaṃ puṇḍarīkākṣaṃ nṛsiṃhaṃ brāhmaṇapriyam || samastasyāpi jagataḥ sṛṣṭisthityantakārakam || 50 ||
[50] "वराह, कमलनयन, नृसिंह, ब्राह्मणों के प्रिय, सारे जगत की सृष्टि, पालन और संहार करने वाले,"
अनादिनिधनं विष्णुं त्रैलोक्येशं त्रिविक्रमम् ॥ नारायणं चतुर्बाहुं शङ्खचक्रगदाधरम् ॥ ५१ ॥
anādinidhanaṃ viṣṇuṃ trailokyeśaṃ trivikramam || nārāyaṇaṃ caturbāhuṃ śaṅkhacakragadādharam || 51 ||
[51] "आदि-अंत रहित विष्णु, तीनों लोकों के स्वामी, त्रिविक्रम, चार भुजाओं वाले, शंख-चक्र-गदा धारी नारायण,"
पीताम्बरधरं नित्यं वनमालाविभूषितम् ॥ श्रीवत्साङ्कं जगत्सेतुं श्रीपतिं श्रीधरं हरिम् ॥ ५२ ॥
pītāmbaradharaṃ nityaṃ vanamālāvibhūṣitam || śrīvatsāṅkaṃ jagatsetuṃ śrīpatiṃ śrīdharaṃ harim || 52 ||
[52] "सदा पीतांबर पहने, वनमाला से सजे, श्रीवत्स चिह्न वाले, जगत के सेतु, लक्ष्मीपति, श्रीधर, हरि (का ध्यान करें)।"
योगेश्वराय देवाय योगिनां पतये नमः ॥ योगोद्भवाय नित्याय गोविन्दाय नमो नमः ॥ ५३ ॥
yogeśvarāya devāya yogināṃ pataye namaḥ || yogodbhavāya nityāya govindāya namo namaḥ || 53 ||
[53] "योगेश्वर देव, योगियों के स्वामी को नमस्कार; योग से प्रकट, नित्य गोविंद को बार-बार नमस्कार।"
यज्ञेश्वराय देवाय तथा यज्ञोद्भवाय च ॥ यज्ञानां पतये नाथ गोविन्दाय नमो नमः ॥ ५४ ॥
yajñeśvarāya devāya tathā yajñodbhavāya ca || yajñānāṃ pataye nātha govindāya namo namaḥ || 54 ||
[54] "यज्ञों के ईश्वर, यज्ञ से प्रकट, यज्ञों के स्वामी, हे नाथ गोविंद, आपको बार-बार नमस्कार।"
विश्वेश्वराय विश्वाय तथा विश्वोद्भवाय च ॥ विश्वस्य पतये तुभ्यं गोविन्दाय नमो नमः ॥ ५५ ॥
viśveśvarāya viśvāya tathā viśvodbhavāya ca || viśvasya pataye tubhyaṃ govindāya namo namaḥ || 55 ||
[55] "विश्व के ईश्वर, विश्व-रूप, विश्व के उत्पत्ति-स्थान, विश्व के स्वामी गोविंद, आपको बार-बार नमस्कार।"
जगन्नाथ नमस्तुभ्यं संसारभयनाशन ॥ जगदीशाय देवाय भूतानां पतये नमः ॥ ५६ ॥
jagannātha namastubhyaṃ saṃsārabhayanāśana || jagadīśāya devāya bhūtānāṃ pataye namaḥ || 56 ||
[56] "हे जगन्नाथ, संसार का भय मिटाने वाले, आपको नमस्कार; जगदीश, सब प्राणियों के स्वामी देव को नमस्कार।"
धर्मेश्वराय धर्माय संभवाय जगत्पते ॥ धर्मज्ञाय च देवाय गोविन्दाय नमो नमः ॥ ५७ ॥
dharmeśvarāya dharmāya saṃbhavāya jagatpate || dharmajñāya ca devāya govindāya namo namaḥ || 57 ||
[57] "धर्म के ईश्वर, धर्म-रूप, सबके उद्गम, हे जगत्पति, धर्म जानने वाले देव गोविंद को बार-बार नमस्कार।"
एताभ्यां चैव मन्त्राभ्यां नैवेद्यं शयनं तथा ॥ चन्द्रायार्घ्यं च मन्त्रेण अनेनैवाथ दापयेत् ॥ ५८ ॥
etābhyāṃ caiva mantrābhyāṃ naivedyaṃ śayanaṃ tathā || candrāyārghyaṃ ca mantreṇa anenaivātha dāpayet || 58 ||
[58] "इन्हीं मंत्रों से नैवेद्य और शयन (भगवान को सुलाना) अर्पित करें, और इस (अगले) मंत्र से चंद्रमा को अर्घ्य दें:"
क्षीरोदार्णवसम्भूत अत्रिगोत्रसमुद्भव ॥ गृहाणार्घ्यं शशाङ्केश रोहिण्या सहितो मम ॥ ५९ ॥
kṣīrodārṇavasambhūta atrigotrasamudbhava || gṛhāṇārghyaṃ śaśāṅkeśa rohiṇyā sahito mama || 59 ||
[59] (मंत्र:) "हे क्षीरसागर से उत्पन्न, अत्रि गोत्र में जन्मे चंद्रदेव, रोहिणी सहित मेरा अर्घ्य स्वीकार कीजिए।"
ज्योत्स्नापते नमस्तुभ्यं ज्योतिषां पतये नमः ॥ नमस्ते रोहिणीकान्त अर्घ्यं नः प्रतिगृह्यताम् ॥ ६० ॥
jyotsnāpate namastubhyaṃ jyotiṣāṃ pataye namaḥ || namaste rohiṇīkānta arghyaṃ naḥ pratigṛhyatām || 60 ||
[60] "हे चाँदनी के स्वामी, ज्योतियों के स्वामी, आपको नमस्कार; हे रोहिणी के प्रिय, हमारा अर्घ्य स्वीकार कीजिए।"
स्थण्डिले स्थापयेद्देवं शशाङ्कं रोहिणीयुतम् ॥ देवक्या वसुदेवं च नन्दं चैव यशोदया ॥ ६१ ॥
sthaṇḍile sthāpayeddevaṃ śaśāṅkaṃ rohiṇīyutam || devakyā vasudevaṃ ca nandaṃ caiva yaśodayā || 61 ||
[61] "वेदी पर रोहिणी सहित चंद्रदेव को स्थापित करें; देवकी सहित वसुदेव और यशोदा सहित नंद को भी।"
बलदेवं मया सार्धं भक्त्या परमया नृप ॥ संपूज्य विधिवद्देही किं नाप्नोत्यतिदुर्लभम् ॥ ६२ ॥
baladevaṃ mayā sārdhaṃ bhaktyā paramayā nṛpa || saṃpūjya vidhivaddehī kiṃ nāpnotyatidurlabham || 62 ||
[62] "हे राजन, मेरे साथ बलदेव की भी परम भक्ति से विधिपूर्वक पूजा करके मनुष्य कौन-सा दुर्लभ फल नहीं पाता?"
एकादशीनां विंशत्यः कोट्यो याः प्रकीर्तिताः ॥ ताभिः कृष्णाष्टमी तुल्या ततोऽनन्तचतुर्दशी ॥ ६३ ॥
ekādaśīnāṃ viṃśatyaḥ koṭyo yāḥ prakīrtitāḥ || tābhiḥ kṛṣṇāṣṭamī tulyā tato'nantacaturdaśī || 63 ||
[63] "बीस करोड़ एकादशियों का जो फल बताया गया है, उसके बराबर एक कृष्णाष्टमी है; और उसके बाद (पुण्य में) अनंत चतुर्दशी है।"
अर्धरात्रे वसोर्धारां पातयेद्द्रव्यसर्पिषा ॥ ततो वर्धापयेन्नालं षष्ठीनामादिकं मम ॥ ६४ ॥
ardharātre vasordhārāṃ pātayeddravyasarpiṣā || tato vardhāpayennālaṃ ṣaṣṭhīnāmādikaṃ mama || 64 ||
[64] "आधी रात को घी की वसुधारा (धारा) चढ़ाएँ। फिर (जन्म के संस्कार के रूप में) नाल-छेदन, षष्ठी, नामकरण आदि मेरे लिए मनाएँ।"
कर्तव्यं तत्क्षणाद्रात्रौ प्रभाते नवमीदिने ॥ यथा मम तथा कार्यो भगवत्या महोत्सवः ॥ ६५ ॥
kartavyaṃ tatkṣaṇādrātrau prabhāte navamīdine || yathā mama tathā kāryo bhagavatyā mahotsavaḥ || 65 ||
[65] "यह उसी रात तुरंत और सुबह नवमी के दिन करें; जैसे मेरा, वैसे ही भगवती (योगमाया) का भी महोत्सव करें।"
ब्राह्मणान्भोजयेद्भक्त्या तेभ्यो दद्याच्च दक्षिणाम् ॥ हिरण्यं मेदिनीं गावो वासांसि कुसुमानि च ॥ ६६ ॥
brāhmaṇānbhojayedbhaktyā tebhyo dadyācca dakṣiṇām || hiraṇyaṃ medinīṃ gāvo vāsāṃsi kusumāni ca || 66 ||
[66] "भक्ति से ब्राह्मणों को भोजन कराएँ और उन्हें दक्षिणा दें — सोना, भूमि, गायें, वस्त्र और फूल,"
यद्यदिष्टतमं तत्तत्कृष्णो मे प्रीयतामिति ॥ यं देवं देवकी देवी वसुदेवादजीजनत् ॥ ६७ ॥
yadyadiṣṭatamaṃ tattatkṛṣṇo me prīyatāmiti || yaṃ devaṃ devakī devī vasudevādajījanat || 67 ||
[67] "जो-जो सबसे प्रिय हो, यह कहते हुए कि 'कृष्ण मुझ पर प्रसन्न हों।' (मंत्र:) 'जिस देव को देवकी देवी ने वसुदेव से जन्म दिया,'"
भौमस्य ब्रह्मणो गुप्त्यै तस्मै ब्रह्मात्मने नमः ॥ नमस्ते वासुदेवाय गोब्राह्मणहिताय च ॥ ६८ ॥
bhaumasya brahmaṇo guptyai tasmai brahmātmane namaḥ || namaste vāsudevāya gobrāhmaṇahitāya ca || 68 ||
[68] "'पृथ्वी और वेद की रक्षा के लिए, उन ब्रह्म-स्वरूप को नमस्कार; गायों और ब्राह्मणों के हितकारी वासुदेव, आपको नमस्कार।'"
शान्तिरस्तु शिवं चास्तु इत्युक्त्वा मां विसर्जयेत् ॥ ततो बन्धुजनौघं च दीनानाथांश्च भोजयेत् ॥ ६९ ॥
śāntirastu śivaṃ cāstu ityuktvā māṃ visarjayet || tato bandhujanaughaṃ ca dīnānāthāṃśca bhojayet || 69 ||
[69] "'शांति हो, मंगल हो' — ऐसा कहकर मेरा विसर्जन करें। फिर सब बंधु-बांधवों, गरीबों और अनाथों को भोजन कराएँ।"
भोजयित्वा सुशान्तांस्तान्स्वयं भुञ्जीत वाग्यतः ॥ एवं यः कुरुते देव्या देवक्याः सुमहोत्सवम् ॥ ७० ॥
bhojayitvā suśāntāṃstānsvayaṃ bhuñjīta vāgyataḥ || evaṃ yaḥ kurute devyā devakyāḥ sumahotsavam || 70 ||
[70] "उन्हें भोजन कराकर, संतुष्ट करके, फिर स्वयं मौन रहकर भोजन करें। जो इस तरह देवकी देवी का महोत्सव करता है,"
प्रतिवर्षं विधानेन मद्भक्तो धर्मनन्दन ॥ नरो वा यदि वा नारी यथोक्तं लभते फलम् ॥ ७१ ॥
prativarṣaṃ vidhānena madbhakto dharmanandana || naro vā yadi vā nārī yathoktaṃ labhate phalam || 71 ||
[71] "हे धर्मपुत्र, हर वर्ष विधि से — मेरा भक्त पुरुष हो या स्त्री — वह बताया हुआ फल पाता है:"
पुत्रसन्तानमारोग्यं सौभाग्यमतुलं लभेत् ॥ इह धर्मरतिर्भूत्वा मृतो वैकुण्ठमाप्नुयात् ॥ ७२ ॥
putrasantānamārogyaṃ saubhāgyamatulaṃ labhet || iha dharmaratirbhūtvā mṛto vaikuṇṭhamāpnuyāt || 72 ||
[72] "पुत्र-संतान, अच्छा स्वास्थ्य और अतुल सौभाग्य। यहाँ धर्म में लगा रहकर, मृत्यु के बाद वह वैकुंठ पाता है।"
तत्र देवविमानेन वर्षलक्षं युधिष्ठिर ॥ भोगान्नानाविधान्भुक्त्वा पुण्यशेषादिहागतः ॥ ७३ ॥
tatra devavimānena varṣalakṣaṃ yudhiṣṭhira || bhogānnānāvidhānbhuktvā puṇyaśeṣādihāgataḥ || 73 ||
[73] "हे युधिष्ठिर, वहाँ देव-विमान में लाख वर्ष तक तरह-तरह के सुख भोगकर, बचे पुण्य से फिर यहाँ आकर,"
सर्वकामसमृद्धे च सर्वाशुभविवर्जिते ॥ कुले नृपतिशीलानां जायते हृच्छयोपमः ॥ ७४ ॥
sarvakāmasamṛddhe ca sarvāśubhavivarjite || kule nṛpatiśīlānāṃ jāyate hṛcchayopamaḥ || 74 ||
[74] "सब इच्छाओं से भरे, सब अशुभ से रहित, राजाओं जैसे स्वभाव वाले कुल में कामदेव जैसा सुंदर होकर जन्म लेता है।"
यस्मिन्सदैव देशे तु लिखितं तु पटार्पितम् ॥ मम जन्मदिनं भक्त्या सर्वालङ्कारभूषितम् ॥ ७५ ॥
yasminsadaiva deśe tu likhitaṃ tu paṭārpitam || mama janmadinaṃ bhaktyā sarvālaṅkārabhūṣitam || 75 ||
[75] "जिस देश में मेरा जन्मदिन (मेरी जन्म-लीला) कपड़े पर चित्रित करके, सब अलंकारों से सजाकर, भक्ति से,"
पूज्यते पाण्डवश्रेष्ठ जनैरुत्सवसंयुतैः ॥ परचक्रभयं तत्र न कदापि भवेत्पुनः ॥ ७६ ॥
pūjyate pāṇḍavaśreṣṭha janairutsavasaṃyutaiḥ || paracakrabhayaṃ tatra na kadāpi bhavetpunaḥ || 76 ||
[76] "हे पांडवश्रेष्ठ, लोग उत्सव के साथ सदा पूजते हैं, वहाँ शत्रु के आक्रमण का डर फिर कभी नहीं होता।"
पर्जन्यः कामवर्षी स्यादीतिभ्यो न भयं भवेत् ॥ गृहे वा पूज्यते यत्र देवक्याश्चरितं मम ॥ ७७ ॥
parjanyaḥ kāmavarṣī syādītibhyo na bhayaṃ bhavet || gṛhe vā pūjyate yatra devakyāścaritaṃ mama || 77 ||
[77] "वहाँ बादल ज़रूरत भर बरसते हैं, आपदाओं का डर नहीं होता। जिस घर में देवकी जी की और मेरी लीला पूजी जाती है,"
तत्र सर्वसमृद्धं स्यान्नोपसर्गादिकं भवेत् ॥ पशुभ्यो नकुलाद्व्यालात्पापरोगाच्च पातकात् ॥ ७८ ॥
tatra sarvasamṛddhaṃ syānnopasargādikaṃ bhavet || paśubhyo nakulādvyālātpāparogācca pātakāt || 78 ||
[78] "वहाँ सब कुछ भरपूर होता है, कोई उपद्रव नहीं होता; जानवरों से, नेवले से, साँप से, बुरे रोग और पाप से,"
राजतश्चोरतो वापि न कदाचिद्भयं भवेत् ॥ संसर्गेणापि यो भक्त्या व्रतं पश्येदनाकुलम् ॥ सोऽपि पापविनिर्मुक्तः प्रयाति हरिमन्दिरम् ॥ ७९ ॥
rājataścorato vāpi na kadācidbhayaṃ bhavet || saṃsargeṇāpi yo bhaktyā vrataṃ paśyedanākulam || so'pi pāpavinirmuktaḥ prayāti harimandiram || 79 ||
[79] "राजा से या चोर से भी कभी डर नहीं होता। जो दूसरों के साथ रहकर भी शांत मन से भक्तिपूर्वक यह व्रत देखता है, वह भी पापों से छूटकर हरि के धाम जाता है।"
जन्माष्टमीं जनमनोनयनाभिरामां पापापहां सपदि नन्दितनन्दगोपाम् ॥ यो देवकीं सुतयुतां च भजेद्धि भक्त्या पुत्रानवाप्य समुपैति पदं स विष्णोः ॥ ८० ॥
janmāṣṭamīṃ janamanonayanābhirāmāṃ pāpāpahāṃ sapadi nanditanandagopām || yo devakīṃ sutayutāṃ ca bhajeddhi bhaktyā putrānavāpya samupaiti padaṃ sa viṣṇoḥ || 80 ||
[80] "लोगों के मन और आँखों को सुख देने वाली, पाप हरने वाली, नंद-गोप को आनंद देने वाली जन्माष्टमी को, और पुत्र सहित देवकी को जो भक्ति से पूजता है, वह पुत्र पाकर अंत में विष्णु के धाम जाता है।" ॥ इति भविष्योत्तरे जन्माष्टमीव्रतकथा ॥