सूत उवाच ॥ मन्दारमालाकुलितालकायै कपालमालाङ्कितशेखराय ॥ दिव्याम्बरायै च दिगम्बराय नमः शिवायै च नमः शिवाय ॥ १ ॥
sūta uvāca || mandāramālākulitālakāyai kapālamālāṅkitaśekharāya || divyāmbarāyai ca digambarāya namaḥ śivāyai ca namaḥ śivāya || 1 ||
[1] सूत जी बोले: मंदार के फूलों की माला से सजे केशों वाली (पार्वती) और कपालों की माला से सजे मस्तक वाले (शिव) को; दिव्य वस्त्र पहनने वाली देवी और दिगंबर शिव को — शिवा और शिव दोनों को नमस्कार।
कैलासशिखरे रम्ये गौरी पृच्छति शङ्करम् ॥ गुह्याद्गुह्यतरं गुह्यं कथयस्व महेश्वर ॥ २ ॥
kailāsaśikhare ramye gaurī pṛcchati śaṅkaram || guhyādguhyataraṃ guhyaṃ kathayasva maheśvara || 2 ||
[2] सुंदर कैलास शिखर पर गौरी ने शंकर जी से पूछा: "हे महेश्वर, जो बात सबसे अधिक गुप्त है, वह मुझे बताइए।"
सर्वस्वं सर्वधर्माणामल्पायासं महत्फलम् ॥ प्रसन्नोऽसि यदा नाथ तथ्यं ब्रूहि ममाग्रतः ॥ ३ ॥
sarvasvaṃ sarvadharmāṇāmalpāyāsaṃ mahatphalam || prasanno'si yadā nātha tathyaṃ brūhi mamāgrataḥ || 3 ||
[3] "जो सब धर्मों का सार हो, थोड़े परिश्रम में बड़ा फल दे — हे नाथ, यदि आप प्रसन्न हैं तो मुझे सच-सच बताइए।"
केन त्वं हि मया प्राप्तस्तपोदानव्रतादिना ॥ अनादिमध्यनिधनो भर्ता चैव जगत्प्रभुः ॥ ४ ॥
kena tvaṃ hi mayā prāptastapodānavratādinā || anādimadhyanidhano bhartā caiva jagatprabhuḥ || 4 ||
[4] "किस तप, दान या व्रत से मैंने आपको पाया — आप, जिनका न आदि है, न मध्य, न अंत, जो जगत के स्वामी हैं, मेरे पति बने?"
ईश्वर उवाच ॥ शृणु देवि प्रवक्ष्यामि तवाग्रे व्रतमुत्तमम् ॥ यद्गोप्यं मम सर्वस्वं कथयामि तव प्रिये ॥ ५ ॥
īśvara uvāca || śṛṇu devi pravakṣyāmi tavāgre vratamuttamam || yadgopyaṃ mama sarvasvaṃ kathayāmi tava priye || 5 ||
[5] शिव जी बोले: "देवी, सुनो, मैं तुम्हें एक उत्तम व्रत बताता हूँ। प्रिये, जो मेरा सबसे गुप्त और सबसे प्रिय है, वह तुम्हें बताता हूँ।"
टिप्पणी: स्कैन में ‘व्रत…’ शब्द अस्पष्ट है; श्लोक ७६ के समान पाठ ‘व्रतमुत्तमम्’ लिया गया — जाँच बाकी।
यथा चोडुगणे चन्द्रो ग्रहाणां भानुरेव च ॥ वर्णानां च यथा विप्रो देवानां विष्णुरेव च ॥ ६ ॥
yathā coḍugaṇe candro grahāṇāṃ bhānureva ca || varṇānāṃ ca yathā vipro devānāṃ viṣṇureva ca || 6 ||
[6] "जैसे तारों में चंद्रमा, ग्रहों में सूर्य, वर्णों में ब्राह्मण और देवताओं में विष्णु श्रेष्ठ हैं,"
नदीनां च यथा गङ्गा पुराणानां च भारतम् ॥ वेदानां च यथा साम इन्द्रियाणां मनो यथा ॥ ७ ॥
nadīnāṃ ca yathā gaṅgā purāṇānāṃ ca bhāratam || vedānāṃ ca yathā sāma indriyāṇāṃ mano yathā || 7 ||
[7] "जैसे नदियों में गंगा, पुराणों में महाभारत, वेदों में सामवेद और इंद्रियों में मन श्रेष्ठ है (वैसे ही यह व्रत सब व्रतों में श्रेष्ठ है)।"
पुराणवेदसर्वस्वमागमेन यथोदितम् ॥ एकाग्रेण शृणुष्वैतद्यथा दृष्टं पुरातनम् ॥ ८ ॥
purāṇavedasarvasvamāgamena yathoditam || ekāgreṇa śṛṇuṣvaitadyathā dṛṣṭaṃ purātanam || 8 ||
[8] "यह पुराणों और वेदों का सार है, जैसा शास्त्रों में कहा गया है। जैसा पहले हुआ था, वह एकाग्र होकर सुनो।"
येन व्रतप्रभावेण प्राप्तमर्धासनं मम ॥ तत्सर्वं कथयिष्येऽहं त्वं मम प्रेयसी यतः ॥ ९ ॥
yena vrataprabhāveṇa prāptamardhāsanaṃ mama || tatsarvaṃ kathayiṣye'haṃ tvaṃ mama preyasī yataḥ || 9 ||
[9] "जिस व्रत के प्रभाव से तुमने मेरा आधा आसन (अर्धांगिनी का स्थान) पाया, वह सब बताऊँगा, क्योंकि तुम मेरी प्रिया हो।"
भाद्रमासि सिते पक्षे तृतीया हस्तसंयुता ॥ तदनुष्ठानमात्रेण सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ १० ॥
bhādramāsi site pakṣe tṛtīyā hastasaṃyutā || tadanuṣṭhānamātreṇa sarvapāpaiḥ pramucyate || 10 ||
[10] "भादों महीने के शुक्ल पक्ष की तृतीया, जब हस्त नक्षत्र हो — उस दिन यह व्रत करने मात्र से मनुष्य सब पापों से छूट जाता है।"
शृणु देवि त्वया पूर्वं यद्व्रतं चरितं महत् ॥ तत्सर्वं कथयिष्यामि यथा वृत्तं हिमालये ॥ ११ ॥
śṛṇu devi tvayā pūrvaṃ yadvrataṃ caritaṃ mahat || tatsarvaṃ kathayiṣyāmi yathā vṛttaṃ himālaye || 11 ||
[11] "देवी, सुनो — तुमने पहले हिमालय पर जो महान व्रत किया था, जैसा वहाँ हुआ, वह सब बताता हूँ।"
पार्वत्युवाच ॥ कथं कृतं मया नाथ व्रतानामुत्तमं व्रतम् ॥ तत्सर्वं श्रोतुमिच्छामि त्वत्सकाशान्महेश्वर ॥ १२ ॥
pārvatyuvāca || kathaṃ kṛtaṃ mayā nātha vratānāmuttamaṃ vratam || tatsarvaṃ śrotumicchāmi tvatsakāśānmaheśvara || 12 ||
[12] पार्वती जी बोलीं: "हे नाथ, मैंने सब व्रतों में उत्तम वह व्रत कैसे किया? हे महेश्वर, मैं यह सब आपसे सुनना चाहती हूँ।"
शिव उवाच ॥ अस्ति तत्र महान्दिव्यो हिमवान्नगउत्तमः ॥ नानाभूमिसमाकीर्णो नानाद्रुमसमाकुलः ॥ १३ ॥
śiva uvāca || asti tatra mahāndivyo himavānnagauttamaḥ || nānābhūmisamākīrṇo nānādrumasamākulaḥ || 13 ||
[13] शिव जी बोले: "पर्वतों में श्रेष्ठ, महान और दिव्य हिमालय है, जो तरह-तरह की भूमि और अनेक प्रकार के पेड़ों से भरा है,"
नानापक्षिसमायुक्तो नानामृगविचित्रकः ॥ यत्र देवाः सगन्धर्वाः सिद्धचारणगुह्यकाः ॥ १४ ॥
nānāpakṣisamāyukto nānāmṛgavicitrakaḥ || yatra devāḥ sagandharvāḥ siddhacāraṇaguhyakāḥ || 14 ||
[14] "अनेक पक्षियों और तरह-तरह के पशुओं से सुंदर है; जहाँ गंधर्वों सहित देवता, सिद्ध, चारण और गुह्यक,"
विचरन्ति सदा हृष्टा गन्धर्वा गीततत्पराः ॥ स्फाटिकैः काञ्चनैः शृङ्गैर्मणिवैदूर्यभूषितैः ॥ १५ ॥
vicaranti sadā hṛṣṭā gandharvā gītatatparāḥ || sphāṭikaiḥ kāñcanaiḥ śṛṅgairmaṇivaidūryabhūṣitaiḥ || 15 ||
[15] "सदा प्रसन्न होकर घूमते हैं और गंधर्व गाने में मग्न रहते हैं। उसकी चोटियाँ स्फटिक और सोने की हैं, मणि और वैदूर्य से सजी हैं,"
भुजैर्लिखन्निवाकाशं सुहृदो मन्दिरं यथा ॥ हिमेन पूरितो नित्यं गङ्गाध्वनिविनादितः ॥ १६ ॥
bhujairlikhannivākāśaṃ suhṛdo mandiraṃ yathā || himena pūrito nityaṃ gaṅgādhvanivināditaḥ || 16 ||
[16] "मानो अपनी भुजाओं (चोटियों) से आकाश को छू रहा हो, किसी मित्र के घर जैसा सुहाना; सदा बर्फ से ढका और गंगा की ध्वनि से गूँजता हुआ।"
पार्वति त्वं यथा बाल्ये परमाचरती तपः ॥ अब्दद्वादशकं देवि धूम्रपानमधोमुखी ॥ १७ ॥
pārvati tvaṃ yathā bālye paramācaratī tapaḥ || abdadvādaśakaṃ devi dhūmrapānamadhomukhī || 17 ||
[17] "पार्वती, वहाँ तुमने बचपन में ही कठोर तप किया — बारह वर्ष तक नीचे मुख करके केवल धुआँ पीकर रहीं।"
संवत्सरचतुःषष्टिं पक्वपर्णाशनं कृतम् ॥ माघमासे जले मग्ना वैशाखे चाग्निसेविनी ॥ १८ ॥
saṃvatsaracatuḥṣaṣṭiṃ pakvaparṇāśanaṃ kṛtam || māghamāse jale magnā vaiśākhe cāgnisevinī || 18 ||
[18] "चौंसठ वर्ष तक केवल पके (सूखे) पत्ते खाए। माघ में पानी में खड़ी रहीं, वैशाख में आग के पास तप किया।"
श्रावणे च बहिर्वासा अन्नपानविवर्जिता ॥ दृष्ट्वा तातेन तत्कष्टं चिन्तया दुःखितोऽभवत् ॥ १९ ॥
śrāvaṇe ca bahirvāsā annapānavivarjitā || dṛṣṭvā tātena tatkaṣṭaṃ cintayā duḥkhito'bhavat || 19 ||
[19] "सावन में खुले आकाश के नीचे रहीं, बिना अन्न-जल के। तुम्हारा यह कष्ट देखकर तुम्हारे पिता चिंता से दुखी हो गए।"
कस्मै देया मया कन्या एवं चिन्तातुरोऽभवत् ॥ तदैवावसरः प्राप्तो ब्रह्मपुत्रस्तु धर्मवित् ॥ २० ॥
kasmai deyā mayā kanyā evaṃ cintāturo'bhavat || tadaivāvasaraḥ prāpto brahmaputrastu dharmavit || 20 ||
[20] "'अपनी बेटी किसे दूँ?' — इसी चिंता में वे व्याकुल थे। ठीक उसी समय धर्म जानने वाले ब्रह्मा जी के पुत्र,"
नारदो मुनिशार्दूलः शैलपुत्रीदिदृक्षया ॥ दत्त्वार्घ्यं विष्टरं पाद्यं नारदं प्रोक्तवान्गिरिः ॥ २१ ॥
nārado muniśārdūlaḥ śailaputrīdidṛkṣayā || dattvārghyaṃ viṣṭaraṃ pādyaṃ nāradaṃ proktavāngiriḥ || 21 ||
[21] "मुनियों में श्रेष्ठ नारद जी शैलपुत्री (पार्वती) को देखने आए। हिमवान ने उन्हें अर्घ्य, आसन और पाद्य देकर कहा:"
हिमवानुवाच ॥ किमर्थमागतः स्वामिन्वद स्वं मुनिसत्तम ॥ महाभाग्येन संप्राप्तं त्वदागमनमुत्तमम् ॥ २२ ॥
himavānuvāca || kimarthamāgataḥ svāminvada svaṃ munisattama || mahābhāgyena saṃprāptaṃ tvadāgamanamuttamam || 22 ||
[22] हिमवान बोले: "हे स्वामी, हे श्रेष्ठ मुनि, आप किसलिए आए हैं, बताइए। बड़े भाग्य से ही आपका शुभ आगमन हुआ है।"
नारद उवाच ॥ शृणु शैलेन्द्र मद्वाक्यं विष्णुना प्रेषितोऽस्म्यहम् ॥ योग्यं योग्याय दातव्यं कन्यारत्नमिदं त्वया ॥ २३ ॥
nārada uvāca || śṛṇu śailendra madvākyaṃ viṣṇunā preṣito'smyaham || yogyaṃ yogyāya dātavyaṃ kanyāratnamidaṃ tvayā || 23 ||
[23] नारद जी बोले: "हे पर्वतराज, मेरी बात सुनिए, मुझे भगवान विष्णु ने भेजा है। यह रत्न जैसी कन्या आपको योग्य वर को ही देनी चाहिए।"
वासुदेवसमो नास्ति ब्रह्मविष्णुशिवादिषु ॥ तस्मै देया त्वया कन्या अत्रार्थे संमतं मम ॥ २४ ॥
vāsudevasamo nāsti brahmaviṣṇuśivādiṣu || tasmai deyā tvayā kanyā atrārthe saṃmataṃ mama || 24 ||
[24] "ब्रह्मा, विष्णु, शिव आदि में वासुदेव (विष्णु) के समान कोई नहीं है। उन्हीं को कन्या देनी चाहिए — इस बात में मेरी सहमति है।"
हिमवानुवाच ॥ वासुदेवः स्वयं देवः कन्यां प्रार्थयते यदि ॥ तदा मया प्रदातव्या त्वदागमनगौरवात् ॥ २५ ॥
himavānuvāca || vāsudevaḥ svayaṃ devaḥ kanyāṃ prārthayate yadi || tadā mayā pradātavyā tvadāgamanagauravāt || 25 ||
[25] हिमवान बोले: "यदि स्वयं भगवान वासुदेव कन्या माँगते हैं, तो आपके आने के सम्मान में मैं कन्या उन्हें दूँगा।"
इत्येवं गदितं श्रुत्वा नभस्यन्तर्दधे मुनिः ॥ ययौ पीताम्बरधरं शङ्खचक्रगदाधरम् ॥ २६ ॥
ityevaṃ gaditaṃ śrutvā nabhasyantardadhe muniḥ || yayau pītāmbaradharaṃ śaṅkhacakragadādharam || 26 ||
[26] "यह सुनकर नारद मुनि आकाश में अदृश्य हो गए और पीतांबर पहनने वाले, शंख-चक्र-गदा धारण करने वाले भगवान विष्णु के पास पहुँचे।"
कृताञ्जलिपुटो भूत्वा मुनीन्द्रस्तमभाषत ॥ नारद उवाच ॥ शृणु देव भवत्कार्यं विवाहो निश्चितस्तव ॥ २७ ॥
kṛtāñjalipuṭo bhūtvā munīndrastamabhāṣata || nārada uvāca || śṛṇu deva bhavatkāryaṃ vivāho niścitastava || 27 ||
[27] "हाथ जोड़कर मुनिश्रेष्ठ ने उनसे कहा: 'हे देव, सुनिए, आपका काम हो गया — आपका विवाह तय हो गया है।'"
हिमवांस्तु तदा गौरीमुवाच वचनं मुदा ॥ दत्तासि त्वं मया पुत्रि देवाय गरुडध्वजे ॥ २८ ॥
himavāṃstu tadā gaurīmuvāca vacanaṃ mudā || dattāsi tvaṃ mayā putri devāya garuḍadhvaje || 28 ||
[28] "तब हिमवान ने खुशी से गौरी से कहा: 'बेटी, मैंने तुम्हें गरुड़ध्वज भगवान विष्णु को दे दिया है।'"
श्रुत्वा वाक्यं पितुर्देवी गता सा सखिमन्दिरम् ॥ भूमौ पतित्वा सा तत्र विललापातिदुःखिता ॥ २९ ॥
śrutvā vākyaṃ piturdevī gatā sā sakhimandiram || bhūmau patitvā sā tatra vilalāpātiduḥkhitā || 29 ||
[29] "पिता की बात सुनकर देवी अपनी सखी के घर गईं और वहाँ ज़मीन पर गिरकर बहुत दुख से रोने लगीं।"
विलपन्तीं तदा दृष्ट्वा सखी वचनमब्रवीत् ॥ सख्युवाच ॥ किमर्थं दुःखिता देवि कथयस्व ममाग्रतः ॥ ३० ॥
vilapantīṃ tadā dṛṣṭvā sakhī vacanamabravīt || sakhyuvāca || kimarthaṃ duḥkhitā devi kathayasva mamāgrataḥ || 30 ||
[30] "उन्हें रोते देखकर सखी बोली: 'देवी, तुम क्यों दुखी हो? मुझे बताओ।'"
यद्भवत्याभिलषितं करिष्येऽहं न संशयः ॥ पार्वत्युवाच ॥ सखि शृणु मम प्रीत्या मनोऽभिलषितं मम ॥ ३१ ॥
yadbhavatyābhilaṣitaṃ kariṣye'haṃ na saṃśayaḥ || pārvatyuvāca || sakhi śṛṇu mama prītyā mano'bhilaṣitaṃ mama || 31 ||
[31] "'तुम जो चाहती हो, मैं वह ज़रूर करूँगी।' पार्वती बोलीं: 'सखी, प्रेम से मेरी मन की इच्छा सुनो।'"
महादेवं च भर्तारं करिष्येऽहं न संशयः ॥ एतन्मे चिन्तितं कार्यं तातेन कृतमन्यथा ॥ ३२ ॥
mahādevaṃ ca bhartāraṃ kariṣye'haṃ na saṃśayaḥ || etanme cintitaṃ kāryaṃ tātena kṛtamanyathā || 32 ||
[32] "'मैं महादेव को ही अपना पति बनाऊँगी, इसमें कोई शक नहीं। मैंने यही सोचा था, पर पिता ने कुछ और कर दिया।'"
तस्माद्देहपरित्यागं करिष्येऽहं सखिप्रिये ॥ पार्वत्या वचनं श्रुत्वा सखी वचनमब्रवीत् ॥ ३३ ॥
tasmāddehaparityāgaṃ kariṣye'haṃ sakhipriye || pārvatyā vacanaṃ śrutvā sakhī vacanamabravīt || 33 ||
[33] "'इसलिए, प्यारी सखी, मैं अपना शरीर त्याग दूँगी।' पार्वती की बात सुनकर सखी बोली:"
सख्युवाच ॥ पिता यत्र न जानाति गमिष्यावो हि तद्वनम् ॥ इत्येवं संमतं कृत्वा नीतासि त्वं महद्वनम् ॥ ३४ ॥
sakhyuvāca || pitā yatra na jānāti gamiṣyāvo hi tadvanam || ityevaṃ saṃmataṃ kṛtvā nītāsi tvaṃ mahadvanam || 34 ||
[34] "सखी ने कहा: 'हम ऐसे वन में चलेंगी जहाँ पिता को पता न चले।' यह तय करके वह तुम्हें एक बड़े वन में ले गई।"
पिता निरीक्षयामास हिमवांस्तु गृहे गृहे ॥ केन नीतास्ति मे पुत्री देवदानवकिन्नरैः ॥ ३५ ॥
pitā nirīkṣayāmāsa himavāṃstu gṛhe gṛhe || kena nītāsti me putrī devadānavakinnaraiḥ || 35 ||
[35] "पिता हिमवान ने घर-घर ढूँढा: 'मेरी बेटी को कौन ले गया — कोई देवता, दानव या किन्नर?'"
नारदाग्रे कृतं सत्यं किं दास्ये गरुडध्वजे ॥ इत्येवं चिन्तयाविष्टो मूर्च्छितो निपपात ह ॥ ३६ ॥
nāradāgre kṛtaṃ satyaṃ kiṃ dāsye garuḍadhvaje || ityevaṃ cintayāviṣṭo mūrcchito nipapāta ha || 36 ||
[36] "'मैंने नारद जी के सामने वचन दिया था; अब गरुड़ध्वज को क्या दूँगा?' इसी चिंता में डूबकर वे बेहोश होकर गिर पड़े।"
हाहाकृत्वा प्रधावन्ति लोकास्ते गिरिपुङ्गवम् ॥ ऊचुर्गिरिवरं सर्वे मूर्च्छाहेतुं गिरे वद ॥ ३७ ॥
hāhākṛtvā pradhāvanti lokāste giripuṅgavam || ūcurgirivaraṃ sarve mūrcchāhetuṃ gire vada || 37 ||
[37] "लोग 'हाय-हाय' करते हुए पर्वतराज की ओर दौड़े और सबने पूछा: 'हे गिरिराज, बेहोशी का कारण बताइए।'"
गिरिरुवाच ॥ दुःखस्य हेतुं शृणुत कन्यारत्नं हृतं मम ॥ दष्टा वा कालसर्पेण सिंहव्याघ्रेण वा हता ॥ ३८ ॥
giriruvāca || duḥkhasya hetuṃ śṛṇuta kanyāratnaṃ hṛtaṃ mama || daṣṭā vā kālasarpeṇa siṃhavyāghreṇa vā hatā || 38 ||
[38] "हिमवान बोले: 'मेरे दुख का कारण सुनो — मेरी रत्न जैसी बेटी को कोई ले गया है। या तो उसे काले साँप ने डस लिया, या शेर-बाघ ने मार डाला।'"
न जाने क्व गता पुत्री केन दुष्टेन वा हृता ॥ चकम्पे शोकसन्तप्तो वातेनेव महातरुः ॥ ३९ ॥
na jāne kva gatā putrī kena duṣṭena vā hṛtā || cakampe śokasantapto vāteneva mahātaruḥ || 39 ||
[39] "'पता नहीं बेटी कहाँ गई या किस दुष्ट ने उसे उठा लिया।' शोक से तपकर वे ऐसे काँपने लगे जैसे आँधी में बड़ा पेड़ काँपता है।"
गिरिर्वनाद्वनं यातस्त्वदालोकनकारणात् ॥ सिंहव्याघ्रैश्च भल्लैश्च रोहिभिश्च महाघनम् ॥ ४० ॥
girirvanādvanaṃ yātastvadālokanakāraṇāt || siṃhavyāghraiśca bhallaiśca rohibhiśca mahāghanam || 40 ||
[40] "तुम्हें खोजने के लिए हिमवान एक वन से दूसरे वन में गए — ऐसे घने वनों में, जो शेर, बाघ, भालू और हिरणों से भरे थे।"
टिप्पणी: छपा पाठ ‘महाघनम्’ जैसा दिखता है; पाद-टिप्पणी में पाठभेद: ‘भल्लूकैरहिभिः सहितं वनम्’।
त्वं चापि विपिने घोरे व्रजन्ती सखिभिः सह ॥ तत्र दृष्ट्वा नदीं रम्यां तत्तीरे च महागुहाम् ॥ ४१ ॥
tvaṃ cāpi vipine ghore vrajantī sakhibhiḥ saha || tatra dṛṣṭvā nadīṃ ramyāṃ tattīre ca mahāguhām || 41 ||
[41] "उधर तुम भी सखियों के साथ घने, डरावने वन में चलती रहीं। वहाँ तुमने एक सुंदर नदी और उसके किनारे एक बड़ी गुफा देखी।"
तां प्रविश्य सखीसार्द्धमन्नभोगविवर्जिता ॥ संस्थाप्य वालुकालिङ्गं पार्वत्यासहितं मम ॥ ४२ ॥
tāṃ praviśya sakhīsārddhamannabhogavivarjitā || saṃsthāpya vālukāliṅgaṃ pārvatyāsahitaṃ mama || 42 ||
[42] "सखी के साथ उस गुफा में जाकर, अन्न और सुख छोड़कर, तुमने बालू का शिवलिंग पार्वती सहित (मेरा) स्थापित किया,"
भाद्रशुक्लतृतीयायामर्चयन्ती तु हस्तभे ॥ तत्र वाद्येन गीतेन रात्रौ जागरणं कृतम् ॥ ४३ ॥
bhādraśuklatṛtīyāyāmarcayantī tu hastabhe || tatra vādyena gītena rātrau jāgaraṇaṃ kṛtam || 43 ||
[43] "और भादों शुक्ल तृतीया को, हस्त नक्षत्र में उसकी पूजा की। वहाँ बाजे और गीत के साथ रात भर जागरण किया।"
व्रतराजप्रभावेण आसनं चलितं मम ॥ संप्राप्तोऽहं तदा तत्र यत्र त्वं सखिभिः सह ॥ ४४ ॥
vratarājaprabhāveṇa āsanaṃ calitaṃ mama || saṃprāpto'haṃ tadā tatra yatra tvaṃ sakhibhiḥ saha || 44 ||
[44] "इस व्रतराज के प्रभाव से मेरा आसन हिल गया। तब मैं वहाँ पहुँचा जहाँ तुम सखियों के साथ थीं।"
प्रसन्नोऽस्मि मया प्रोक्तं वरं ब्रूहि वरानने ॥ पार्वत्युवाच ॥ यदि देव प्रसन्नोऽसि भर्ता भव महेश्वर ॥ ४५ ॥
prasanno'smi mayā proktaṃ varaṃ brūhi varānane || pārvatyuvāca || yadi deva prasanno'si bhartā bhava maheśvara || 45 ||
[45] "मैंने कहा: 'मैं प्रसन्न हूँ, हे सुंदरी, वर माँगो।' पार्वती बोलीं: 'हे देव, यदि आप प्रसन्न हैं तो, हे महेश्वर, मेरे पति बनिए।'"
तथेत्युक्त्वा तु संप्राप्तः कैलासं पुनरेव च ॥ ततः प्रभाते संप्राप्ते नद्यां कृत्वा विसर्जनम् ॥ ४६ ॥
tathetyuktvā tu saṃprāptaḥ kailāsaṃ punareva ca || tataḥ prabhāte saṃprāpte nadyāṃ kṛtvā visarjanam || 46 ||
[46] "'ऐसा ही हो' कहकर मैं फिर कैलास लौट आया। फिर सुबह होने पर तुमने (बालू के लिंग का) नदी में विसर्जन किया,"
पारणं तु कृतं तत्र सख्या सार्द्धं त्वया शुभे ॥ हिमवानपि तं देशमाजगाम घनं वनम् ॥ ४७ ॥
pāraṇaṃ tu kṛtaṃ tatra sakhyā sārddhaṃ tvayā śubhe || himavānapi taṃ deśamājagāma ghanaṃ vanam || 47 ||
[47] "और हे शुभे, सखी के साथ वहीं पारण (व्रत खोलना) किया। हिमवान भी उसी घने वन में आ पहुँचे।"
चतुराशा निरीक्षंस्तु विह्वलः पतितो भुवि ॥ दृष्ट्वा तत्र नदीतीरे प्रसुप्तं कन्यकाद्वयम् ॥ ४८ ॥
caturāśā nirīkṣaṃstu vihvalaḥ patito bhuvi || dṛṣṭvā tatra nadītīre prasuptaṃ kanyakādvayam || 48 ||
[48] "चारों दिशाओं में देखते-देखते वे व्याकुल होकर ज़मीन पर गिर पड़े। तब उन्होंने नदी किनारे दो कन्याओं को सोते देखा।"
उत्थाप्योत्सङ्गमारोप्य रोदनं कृतवान्गिरिः ॥ सिंहव्याघ्राहिभल्लूकैर्वने दुष्टे कुतः स्थिता ॥ ४९ ॥
utthāpyotsaṅgamāropya rodanaṃ kṛtavāngiriḥ || siṃhavyāghrāhibhallūkairvane duṣṭe kutaḥ sthitā || 49 ||
[49] "उन्होंने तुम्हें उठाकर गोद में लिया और रोते हुए बोले: 'शेर, बाघ, साँप और भालुओं वाले इस खतरनाक वन में तुम क्यों रहीं?'"
पार्वत्युवाच ॥ शृणु तात मया ज्ञातं त्वं दास्यसीश्वराय माम् ॥ तदन्यथा कृतं तात तेनाहं वनमागता ॥ ५० ॥
pārvatyuvāca || śṛṇu tāta mayā jñātaṃ tvaṃ dāsyasīśvarāya mām || tadanyathā kṛtaṃ tāta tenāhaṃ vanamāgatā || 50 ||
[50] पार्वती बोलीं: "पिताजी, सुनिए — मुझे लगा था कि आप मुझे ईश्वर (शिव) को देंगे। पर आपने कुछ और कर दिया, इसलिए मैं वन में आ गई।"
ददासि तात यदि मामीश्वराय तदा गृहम् ॥ आगमिष्यामि नैवं चेदिह स्थास्यामि निश्चितम् ॥ ५१ ॥
dadāsi tāta yadi māmīśvarāya tadā gṛham || āgamiṣyāmi naivaṃ cediha sthāsyāmi niścitam || 51 ||
[51] "पिताजी, यदि आप मुझे शिव को देंगे, तभी मैं घर लौटूँगी; नहीं तो मैं निश्चित ही यहीं रहूँगी।"
तथेत्युक्त्वा हिमवता नीतासि त्वं गृहं प्रति ॥ पश्चाद्दत्ता त्वमस्माकं कृत्वा वैवाहिकीं क्रियाम् ॥ ५२ ॥
tathetyuktvā himavatā nītāsi tvaṃ gṛhaṃ prati || paścāddattā tvamasmākaṃ kṛtvā vaivāhikīṃ kriyām || 52 ||
[52] (शिव जी बोले:) "हिमवान 'ऐसा ही होगा' कहकर तुम्हें घर ले गए। बाद में विवाह की विधि करके तुम्हें मुझे सौंप दिया।"
तेन व्रतप्रभावेण सौभाग्यं साधितं त्वया ॥ अद्यापि व्रतराजस्तु न कस्यापि निवेदितः ॥ ५३ ॥
tena vrataprabhāveṇa saubhāgyaṃ sādhitaṃ tvayā || adyāpi vratarājastu na kasyāpi niveditaḥ || 53 ||
[53] "उसी व्रत के प्रभाव से तुमने यह सौभाग्य पाया। यह व्रतराज आज तक मैंने किसी को नहीं बताया था।"
नामास्य व्रतराजस्य शृणु देवि यथाभवत् ॥ आलिभिर्हरिता यस्मात्तस्मात्सा हरितालिका ॥ ५४ ॥
nāmāsya vratarājasya śṛṇu devi yathābhavat || ālibhirharitā yasmāttasmātsā haritālikā || 54 ||
[54] "देवी, इस व्रतराज का नाम कैसे पड़ा, सुनो — सखियाँ (आली) तुम्हें हर ले गई थीं (हरिता), इसलिए इसका नाम 'हरितालिका' पड़ा।"
देव्युवाच ॥ नामेदं कथितं देव विधिं वद मम प्रभो ॥ किं पुण्यं किं फलं चास्य केन च क्रियते व्रतम् ॥ ५५ ॥
devyuvāca || nāmedaṃ kathitaṃ deva vidhiṃ vada mama prabho || kiṃ puṇyaṃ kiṃ phalaṃ cāsya kena ca kriyate vratam || 55 ||
[55] देवी बोलीं: "हे देव, आपने नाम तो बता दिया; हे प्रभु, अब विधि बताइए — इसका पुण्य क्या है, फल क्या है, और यह व्रत किसे करना चाहिए?"
ईश्वर उवाच ॥ शृणु देवि विधिं वक्ष्ये नारीसौभाग्यहेतुकम् ॥ करिष्यति प्रयत्नेन यदि सौभाग्यमिच्छति ॥ ५६ ॥
īśvara uvāca || śṛṇu devi vidhiṃ vakṣye nārīsaubhāgyahetukam || kariṣyati prayatnena yadi saubhāgyamicchati || 56 ||
[56] शिव जी बोले: "देवी, सुनो, स्त्रियों को सौभाग्य देने वाली विधि बताता हूँ। जो स्त्री सौभाग्य चाहती है, वह इसे ध्यान से करे।"
तोरणादि प्रकर्तव्यं कदलीस्तम्भमण्डितम् ॥ आच्छाद्य पट्टवस्त्रैस्तु नानावर्णविचित्रितैः ॥ ५७ ॥
toraṇādi prakartavyaṃ kadalīstambhamaṇḍitam || ācchādya paṭṭavastraistu nānāvarṇavicitritaiḥ || 57 ||
[57] "केले के खंभों से सजा तोरण (मंडप) बनाएँ और उसे रंग-बिरंगे रेशमी कपड़ों से ढकें।"
चन्दनेन सुगन्धेन लेपयेद्गृहमण्डपम् ॥ शङ्खभेरीमृदङ्गैस्तु कारयेद्बहुनिःस्वनान् ॥ ५८ ॥
candanena sugandhena lepayedgṛhamaṇḍapam || śaṅkhabherīmṛdaṅgaistu kārayedbahuniḥsvanān || 58 ||
[58] "घर और मंडप को सुगंधित चंदन से लीपें; शंख, भेरी और मृदंग खूब बजवाएँ।"
नानामङ्गलगीतं च कर्तव्यं मम सद्मनि ॥ स्थापयेद्वालुकालिङ्गं पार्वत्यासहितं मम ॥ ५९ ॥
nānāmaṅgalagītaṃ ca kartavyaṃ mama sadmani || sthāpayedvālukāliṅgaṃ pārvatyāsahitaṃ mama || 59 ||
[59] "मेरे पूजा-स्थान में तरह-तरह के मंगल गीत गाएँ, और पार्वती सहित मेरा बालू का लिंग स्थापित करें।"
पूजयेद्बहुपुष्पैश्च गन्धधूपादिभिर्नवैः ॥ नानाप्रकारैर्नैवेद्यैः पूजयेज्जागरं चरेत् ॥ ६० ॥
pūjayedbahupuṣpaiśca gandhadhūpādibhirnavaiḥ || nānāprakārairnaivedyaiḥ pūjayejjāgaraṃ caret || 60 ||
[60] "बहुत-से फूलों, नए चंदन, धूप आदि और तरह-तरह के नैवेद्य से पूजा करें और रात भर जागरण करें।"
नालिकेरैः पूगफलैर्जम्बीरैर्बकुलैस्तथा ॥ बीजपूरैः सनारिङ्गैः फलैश्चान्यैश्च भूरिशः ॥ ६१ ॥
nālikeraiḥ pūgaphalairjambīrairbakulaistathā || bījapūraiḥ sanāriṅgaiḥ phalaiścānyaiśca bhūriśaḥ || 61 ||
[61] "नारियल, सुपारी, नींबू, बकुल, बिजौरा, संतरे और बहुत-से दूसरे फलों से,"
ऋतुकालोद्भवैर्भूरिप्रकारैः कन्दमूलकैः ॥ ॐ नमः शिवाय शान्ताय पञ्चवक्त्राय शूलिने ॥ ६२ ॥
ṛtukālodbhavairbhūriprakāraiḥ kandamūlakaiḥ || oṃ namaḥ śivāya śāntāya pañcavaktrāya śūline || 62 ||
[62] "और उस मौसम में मिलने वाले अनेक कंद-मूलों से (पूजा करें)। (मंत्र:) 'शांत, पाँच मुख वाले, त्रिशूलधारी शिव को नमस्कार,'"
नन्दिभृङ्गिमहाकालगणयुक्ताय शम्भवे ॥ शिवायै हरकान्तायै प्रकृत्यै सृष्टिहेतवे ॥ ६३ ॥
nandibhṛṅgimahākālagaṇayuktāya śambhave || śivāyai harakāntāyai prakṛtyai sṛṣṭihetave || 63 ||
[63] "'नंदी, भृंगी, महाकाल आदि गणों के साथ रहने वाले शंभु को नमस्कार। शिव की प्रिया, प्रकृति-रूपा, सृष्टि की कारण शिवा (पार्वती) को नमस्कार,'"
शिवायै सर्वमाङ्गल्यै शिवरूपे जगन्मये ॥ शिवे कल्याणदे नित्यं शिवरूपे नमोऽस्तु ते ॥ ६४ ॥
śivāyai sarvamāṅgalyai śivarūpe jaganmaye || śive kalyāṇade nityaṃ śivarūpe namo'stu te || 64 ||
[64] "'सब मंगल करने वाली, शिव-रूपा, जगत में व्याप्त शिवा को; सदा कल्याण देने वाली शिवे, आपको नमस्कार।'"
शिवरूपे नमस्तुभ्यं शिवायै सततं नमः ॥ नमस्ते ब्रह्मचारिण्यै जगद्धात्र्यै नमो नमः ॥ ६५ ॥
śivarūpe namastubhyaṃ śivāyai satataṃ namaḥ || namaste brahmacāriṇyai jagaddhātryai namo namaḥ || 65 ||
[65] "'शिव-रूपा, आपको नमस्कार; शिवा को सदा नमस्कार। ब्रह्मचारिणी, जगत को धारण करने वाली माँ को बार-बार नमस्कार।'"
संसारभयसन्तापात्त्राहि मां सिंहवाहिनि ॥ येन कामेन देवि त्वं पूजितासि महेश्वरि ॥ ६६ ॥
saṃsārabhayasantāpāttrāhi māṃ siṃhavāhini || yena kāmena devi tvaṃ pūjitāsi maheśvari || 66 ||
[66] "'हे सिंहवाहिनी, संसार के भय और ताप से मेरी रक्षा करो। हे महेश्वरी देवी, जिस इच्छा से मैंने तुम्हारी पूजा की है,'"
राज्यसौभाग्यसम्पत्तिं देहि मामम्ब पार्वति ॥ मन्त्रेणानेन देवि त्वां पूजयित्वा मया सह ॥ ६७ ॥
rājyasaubhāgyasampattiṃ dehi māmamba pārvati || mantreṇānena devi tvāṃ pūjayitvā mayā saha || 67 ||
[67] "'हे माँ पार्वती, मुझे राज्य, सौभाग्य और संपत्ति दो।' — (शिव जी बोले:) "इस मंत्र से मेरे साथ तुम्हारी पूजा करके,"
कथां श्रुत्वा विधानेन दद्यादन्नं च भूरिशः ॥ ब्राह्मणेभ्यो यथाशक्ति देया वस्त्रहिरण्यगाः ॥ ६८ ॥
kathāṃ śrutvā vidhānena dadyādannaṃ ca bhūriśaḥ || brāhmaṇebhyo yathāśakti deyā vastrahiraṇyagāḥ || 68 ||
[68] "विधि से कथा सुनकर खूब अन्न दान करे; ब्राह्मणों को सामर्थ्य के अनुसार वस्त्र, सोना और गाय दे।"
अन्येषां भूयसी देया स्त्रीणां वै भूषणादिकम् ॥ भर्त्रा सह कथां श्रुत्वा भक्तियुक्तेन चेतसा ॥ ६९ ॥
anyeṣāṃ bhūyasī deyā strīṇāṃ vai bhūṣaṇādikam || bhartrā saha kathāṃ śrutvā bhaktiyuktena cetasā || 69 ||
[69] "दूसरों को भी भरपूर दान दे, और स्त्रियों को गहने आदि दे। पति के साथ भक्ति भरे मन से कथा सुनकर,"
कृत्वा व्रतेश्वरं देवि सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ सप्तजन्म भवेद्राज्यं सौभाग्यं चैव वर्द्धते ॥ ७० ॥
kṛtvā vrateśvaraṃ devi sarvapāpaiḥ pramucyate || saptajanma bhavedrājyaṃ saubhāgyaṃ caiva varddhate || 70 ||
[70] "देवी, इस व्रतराज को करके स्त्री सब पापों से छूट जाती है; सात जन्मों तक उसे राज्य मिलता है और सौभाग्य बढ़ता है।"
तृतीयायां तु या नारी आहारं कुरुते यदि ॥ सप्तजन्म भवेद्वन्ध्या वैधव्यं जन्मजन्मनि ॥ ७१ ॥
tṛtīyāyāṃ tu yā nārī āhāraṃ kurute yadi || saptajanma bhavedvandhyā vaidhavyaṃ janmajanmani || 71 ||
[71] "जो स्त्री इस तृतीया को भोजन कर लेती है, वह (ग्रंथ के अनुसार) सात जन्मों तक संतानहीन रहती है और जन्म-जन्म विधवा होती है।"
टिप्पणी: ये फल-कथन (७१–७२) ग्रंथ के अपने शब्द हैं; हम इन्हें केवल अनुवाद कर रहे हैं।
दारिद्र्यं पुत्रशोकं च कर्कशा दुःखभागिनी ॥ पच्यते नरके घोरे नोपवासं करोति या ॥ ७२ ॥
dāridryaṃ putraśokaṃ ca karkaśā duḥkhabhāginī || pacyate narake ghore nopavāsaṃ karoti yā || 72 ||
[72] "जो उपवास नहीं करती, उसे गरीबी और पुत्र-शोक मिलता है, वह कठोर स्वभाव वाली और दुखी होती है, और घोर नरक में कष्ट पाती है। (यह ग्रंथ का कथन है।)"
राजते काञ्चने ताम्रे वैणवे वाथ मृन्मये ॥ भाजने विन्यसेदन्नं सवस्त्रफलदक्षिणम् ॥ दानं च द्विजवर्याय दद्यादन्ते च पारणा ॥ ७३ ॥
rājate kāñcane tāmre vaiṇave vātha mṛnmaye || bhājane vinyasedannaṃ savastraphaladakṣiṇam || dānaṃ ca dvijavaryāya dadyādante ca pāraṇā || 73 ||
[73] "चाँदी, सोने, ताँबे, बाँस या मिट्टी के बर्तन में अन्न रखकर, वस्त्र, फल और दक्षिणा के साथ किसी श्रेष्ठ ब्राह्मण को दान दें; उसके बाद पारण करें।"
एवं विधिं या कुरुते च नारी त्वया समाना रमते च भर्त्रा ॥ भोगाननेकान्भुवि भुज्यमाना सायुज्यमन्ते लभते हरेण ॥ ७४ ॥
evaṃ vidhiṃ yā kurute ca nārī tvayā samānā ramate ca bhartrā || bhogānanekānbhuvi bhujyamānā sāyujyamante labhate hareṇa || 74 ||
[74] "जो स्त्री इस विधि से व्रत करती है, वह तुम्हारी तरह पति के साथ सुख से रहती है, धरती पर अनेक सुख भोगकर अंत में शिव जी का सायुज्य (उनसे मिलन) पाती है।"
अश्वमेधसहस्राणि वाजपेयशतानि च ॥ कथाश्रवणमात्रेण तत्फलं प्राप्यते नरैः ॥ ७५ ॥
aśvamedhasahasrāṇi vājapeyaśatāni ca || kathāśravaṇamātreṇa tatphalaṃ prāpyate naraiḥ || 75 ||
[75] "हज़ारों अश्वमेध और सैकड़ों वाजपेय यज्ञों का जो फल है, वह इस कथा को सुनने मात्र से मिल जाता है।"
एतत्ते कथितं देवि तवाग्रे व्रतमुत्तमम् ॥ कोटियज्ञकृतं पुण्यमस्यानुष्ठानमात्रतः ॥ ७६ ॥
etatte kathitaṃ devi tavāgre vratamuttamam || koṭiyajñakṛtaṃ puṇyamasyānuṣṭhānamātrataḥ || 76 ||
[76] "देवी, यह उत्तम व्रत मैंने तुम्हें बताया। इसे करने मात्र से करोड़ों यज्ञों का पुण्य मिलता है।" ॥ इति श्रीभविष्योत्तरपुराणे हरगौरीसंवादे हरितालिकाव्रतकथा संपूर्णा ॥