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गणेश चतुर्थी

Ganesh Chaturthi

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Overview · परिचय

सम्पूर्ण गणेश चतुर्थी कथा — सिद्धिविनायक व्रत कथा और स्यमन्तक उपाख्यान (मूल संस्कृत, ४७ + १३५ श्लोक)

draft · needs pandit proofreading

व्रतराज (१८९७) के स्कैन (पृष्ठ ७६–८४) से हमारे द्वारा पृष्ठ-चित्र देखकर श्लोक-दर-श्लोक लिखी गई। ग्रंथ सिद्धिविनायक व्रत को ‘भविष्य’ (भविष्य पुराण) का और स्यमन्तक उपाख्यान को स्कन्द पुराण (नन्दिकेश्वर-सनत्कुमार संवाद) का बताता है; हमने पुराणों से मिलान नहीं किया। मूल की पाद-टिप्पणियाँ छोड़ दी गई हैं; शब्दों के बीच अंतराल हमारे हैं। पंडित जी से प्रूफ़ जाँच बाकी — draft। सरल हिंदी अर्थ हमारा अपना है।

सिद्धिविनायक व्रत कथा (युधिष्ठिर-कृष्ण संवाद) (48 श्लोक)

🔈 संस्कृत पाठ / Sanskrit chanting: audio coming soon / ऑडियो जल्द आएगा

  1. शौनकाद्या ऋषिगणा नैमिषारण्यवासिनः ॥ सूतं पौराणिकश्रेष्ठमिदमूचुर्वचस्तदा ॥ १ ॥

    śaunakādyā ṛṣigaṇā naimiṣāraṇyavāsinaḥ || sūtaṃ paurāṇikaśreṣṭhamidamūcurvacastadā || 1 ||

    [1] नैमिषारण्य में रहने वाले शौनक आदि ऋषियों ने तब पुराणों के श्रेष्ठ ज्ञाता सूत जी से यह पूछा —

  2. ऋषय ऊचुः ॥ निर्विघ्नेन तु कार्याणि कथं सिद्ध्यन्ति सूतज ॥ अर्थसिद्धिः कथं नृणां पुत्रसौभाग्यसंपदः ॥ २ ॥

    ṛṣaya ūcuḥ || nirvighnena tu kāryāṇi kathaṃ siddhyanti sūtaja || arthasiddhiḥ kathaṃ nṛṇāṃ putrasaubhāgyasaṃpadaḥ || 2 ||

    [2] ऋषि बोले: "हे सूत जी, काम बिना बाधा के कैसे पूरे हों? लोगों को धन, संतान, सौभाग्य और संपत्ति कैसे मिले?

  3. दंपत्योः कलहे चैव बन्धुभेदे तथा नृणाम् ॥ उदासीनेषु लोकेषु कथं सुमुखता भवेत् ॥ ३ ॥

    daṃpatyoḥ kalahe caiva bandhubhede tathā nṛṇām || udāsīneṣu lokeṣu kathaṃ sumukhatā bhavet || 3 ||

    [3] पति-पत्नी में झगड़ा हो, भाइयों-रिश्तेदारों में फूट हो, या लोग मुँह फेर लें — तब सब अनुकूल कैसे हों?

  4. विद्यारम्भे तथा नृणां वाणिज्ये च कृषौ तथा ॥ नृपतेः परचक्रे च जयसिद्धिः कथं भवेत् ॥ ४ ॥

    vidyārambhe tathā nṛṇāṃ vāṇijye ca kṛṣau tathā || nṛpateḥ paracakre ca jayasiddhiḥ kathaṃ bhavet || 4 ||

    [4] पढ़ाई शुरू करते समय, व्यापार और खेती में, और राजा पर शत्रु चढ़ आए तब — जीत और सफलता कैसे मिले?

  5. कां देवतां नमस्कृत्य कार्यसिद्धिर्भवेन्नृणाम् ॥ एतत्समस्तं विस्तार्य ब्रूहि मे सूत पृच्छतः ॥ ५ ॥

    kāṃ devatāṃ namaskṛtya kāryasiddhirbhavennṛṇām || etatsamastaṃ vistārya brūhi me sūta pṛcchataḥ || 5 ||

    [5] किस देवता को प्रणाम करने से लोगों के काम सिद्ध होते हैं? हे सूत जी, यह सब विस्तार से बताइए।"

  6. सूत उवाच ॥ सन्नद्धयोः पुरा विप्राः कुरुपाण्डवसेनयोः ॥ पृष्टवान्देवकीपुत्रं कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ॥ ६ ॥

    sūta uvāca || sannaddhayoḥ purā viprāḥ kurupāṇḍavasenayoḥ || pṛṣṭavāndevakīputraṃ kuntīputro yudhiṣṭhiraḥ || 6 ||

    [6] सूत जी बोले: हे ब्राह्मणो, बहुत पहले जब कौरव और पांडवों की सेनाएँ युद्ध को तैयार खड़ी थीं, तब कुंती-पुत्र युधिष्ठिर ने देवकी-पुत्र श्रीकृष्ण से पूछा —

  7. युधिष्ठिर उवाच ॥ निर्विघ्नेन जयं मह्यं वद त्वं देवकीसुत ॥ कां देवतां नमस्कृत्य सम्यग्राज्यं लभेमहि ॥ ७ ॥

    yudhiṣṭhira uvāca || nirvighnena jayaṃ mahyaṃ vada tvaṃ devakīsuta || kāṃ devatāṃ namaskṛtya samyagrājyaṃ labhemahi || 7 ||

    [7] युधिष्ठिर बोले: "हे देवकीनंदन, बताइए — किस देवता को प्रणाम करके हमें बिना विघ्न के जीत और अपना राज्य ठीक से मिले?"

  8. कृष्ण उवाच ॥ पूजयस्व गणाध्यक्षमुमामलसमुद्भवम् ॥ तस्मिन्संपूजिते देवे ध्रुवं राज्यमवाप्स्यसि ॥ ८ ॥

    kṛṣṇa uvāca || pūjayasva gaṇādhyakṣamumāmalasamudbhavam || tasminsaṃpūjite deve dhruvaṃ rājyamavāpsyasi || 8 ||

    [8] श्रीकृष्ण बोले: "उमा (पार्वती) के निर्मल अंग से जन्मे गणों के स्वामी गणेश की पूजा करो। उनकी पूजा से तुम्हें निश्चित ही राज्य मिलेगा।"

  9. युधिष्ठिर उवाच ॥ देव केन विधानेन पूजनीयो गणाधिपः ॥ पूजितस्तु तिथौ कस्यां सिद्धिदो गणपो भवेत् ॥ ९ ॥

    yudhiṣṭhira uvāca || deva kena vidhānena pūjanīyo gaṇādhipaḥ || pūjitastu tithau kasyāṃ siddhido gaṇapo bhavet || 9 ||

    [9] युधिष्ठिर बोले: "हे देव, गणेश जी की पूजा किस विधि से करें? और किस तिथि को पूजने से वे सिद्धि देते हैं?"

  10. कृष्ण उवाच ॥ मासि भाद्रपदे शुक्ले चतुर्थ्यां पूजयेन्नृप ॥ मासि माघे श्रावणे वा मार्गशीर्षेऽथवा भवेत् ॥ १० ॥

    kṛṣṇa uvāca || māsi bhādrapade śukle caturthyāṃ pūjayennṛpa || māsi māghe śrāvaṇe vā mārgaśīrṣe'thavā bhavet || 10 ||

    [10] श्रीकृष्ण बोले: "हे राजन, भादों मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को पूजा करो; या माघ, श्रावण अथवा मार्गशीर्ष मास में भी कर सकते हो।

  11. गजवक्त्रं तु शुक्लायां चतुर्थ्यां पूजयेन्नृप ॥ यदा चोत्पद्यते भक्तिस्तदा पूज्यो गणाधिपः ॥ ११ ॥

    gajavaktraṃ tu śuklāyāṃ caturthyāṃ pūjayennṛpa || yadā cotpadyate bhaktistadā pūjyo gaṇādhipaḥ || 11 ||

    [11] शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को गजमुख गणेश की पूजा करे; वैसे जब भी मन में भक्ति जागे, तभी गणेश जी पूज्य हैं।

  12. प्रातः शुक्लतिलैः स्नात्वा मध्याह्ने पूजयेन्नृप ॥ निष्कमात्रसुवर्णेन तदर्धार्धेन वा पुनः ॥ १२ ॥

    prātaḥ śuklatilaiḥ snātvā madhyāhne pūjayennṛpa || niṣkamātrasuvarṇena tadardhārdhena vā punaḥ || 12 ||

    [12] सुबह सफ़ेद तिल लगाकर स्नान करे और दोपहर में पूजा करे। एक निष्क (तोले भर) सोने से, या उसके आधे के आधे से —

  13. स्वशक्त्या गणनाथस्य स्वर्णरौप्यमयाकृतिम् ॥ अथवा मृन्मयीं कुर्याद्वित्तशाठ्यं न कारयेत् ॥ १३ ॥

    svaśaktyā gaṇanāthasya svarṇaraupyamayākṛtim || athavā mṛnmayīṃ kuryādvittaśāṭhyaṃ na kārayet || 13 ||

    [13] अपनी शक्ति के अनुसार गणेश जी की सोने या चाँदी की मूर्ति बनवाए, या मिट्टी की ही बना ले — पर पैसा होते हुए कंजूसी न करे।

  14. एकदन्तं शूर्पकर्णं गजवक्त्रं चतुर्भुजम् ॥ पाशाङ्कुशधरं देवं ध्यायेत्सिद्धिविनायकम् ॥ १४ ॥

    ekadantaṃ śūrpakarṇaṃ gajavaktraṃ caturbhujam || pāśāṅkuśadharaṃ devaṃ dhyāyetsiddhivināyakam || 14 ||

    [14] एक दाँत, सूप जैसे कान, हाथी का मुख, चार भुजाएँ, हाथ में पाश और अंकुश — ऐसे सिद्धिविनायक देव का ध्यान करे।

  15. ध्यात्वा चानेन मन्त्रेण स्नाप्य पञ्चामृतैः पृथक् ॥ गणाध्यक्षेति नाम्नैव गन्धं दद्याच्च भक्तितः ॥ १५ ॥

    dhyātvā cānena mantreṇa snāpya pañcāmṛtaiḥ pṛthak || gaṇādhyakṣeti nāmnaiva gandhaṃ dadyācca bhaktitaḥ || 15 ||

    [15] इस प्रकार ध्यान करके, पंचामृत से अलग-अलग स्नान कराए; ‘गणाध्यक्ष’ नाम लेकर भक्ति से चंदन चढ़ाए।

  16. आवाहनार्घ्यपाद्यं च दत्त्वा पश्चात्प्रयत्नतः ॥ रक्तवस्त्रयुगं सर्वप्रदे दद्याच्च भक्तितः ॥ १६ ॥

    āvāhanārghyapādyaṃ ca dattvā paścātprayatnataḥ || raktavastrayugaṃ sarvaprade dadyācca bhaktitaḥ || 16 ||

    [16] आवाहन, अर्घ्य और पाद्य (पैर धोने का जल) देकर, ध्यान से लाल वस्त्रों का जोड़ा भक्ति सहित ‘सर्वप्रद’ (सब देने वाले) को अर्पित करे।

    टिप्पणी: ‘सर्वप्रदे’ शब्द पृष्ठ-चित्र में ऐसा ही पढ़ा गया — पंडित जी जाँचें।

  17. विनायकेति पुष्पाणि धूपं चोमासुताय च ॥ दीपं रुद्रप्रियायेति नैवेद्यं विघ्ननाशिने ॥ १७ ॥

    vināyaketi puṣpāṇi dhūpaṃ comāsutāya ca || dīpaṃ rudrapriyāyeti naivedyaṃ vighnanāśine || 17 ||

    [17] ‘विनायक’ नाम से फूल, ‘उमासुत’ नाम से धूप, ‘रुद्रप्रिय’ नाम से दीप और ‘विघ्ननाशी’ नाम से नैवेद्य (भोग) चढ़ाए।

  18. किंचित्सुवर्णपूजां च ताम्बूलं च समर्पयेत् ॥ ततो दूर्वाङ्कुरान्गृह्य विंशतिं चैकमेव हि ॥ १८ ॥

    kiṃcitsuvarṇapūjāṃ ca tāmbūlaṃ ca samarpayet || tato dūrvāṅkurāngṛhya viṃśatiṃ caikameva hi || 18 ||

    [18] थोड़ी सोने की दक्षिणा और पान भी अर्पित करे। फिर इक्कीस दूर्वा (दूब) के अंकुर लेकर —

  19. पूजनीयः प्रयत्नेन एभिर्नामपदैः पृथक् ॥ गणाधिप नमस्तेऽस्तु उमापुत्राघनाशन ॥ १९ ॥

    pūjanīyaḥ prayatnena ebhirnāmapadaiḥ pṛthak || gaṇādhipa namaste'stu umāputrāghanāśana || 19 ||

    [19] इन नामों से अलग-अलग ध्यान से पूजा करे: "हे गणाधिप, आपको नमस्कार; हे उमापुत्र, पाप नाश करने वाले;

  20. विनायकेशपुत्रेति सर्वसिद्धिप्रदायक ॥ एकदन्तेभवक्त्रेति तथा मूषकवाहन ॥ २० ॥

    vināyakeśaputreti sarvasiddhipradāyaka || ekadantebhavaktreti tathā mūṣakavāhana || 20 ||

    [20] हे विनायक, हे ईशपुत्र (शिव-पुत्र), सब सिद्धियाँ देने वाले; हे एकदंत, हे गजमुख, हे मूषकवाहन;

  21. कुमारगुरवे तुभ्यं पूजनीयः प्रयत्नतः ॥ दूर्वायुग्मं गृहीत्वा तु गन्धपुष्पाक्षतैर्युतम् ॥ २१ ॥

    kumāragurave tubhyaṃ pūjanīyaḥ prayatnataḥ || dūrvāyugmaṃ gṛhītvā tu gandhapuṣpākṣatairyutam || 21 ||

    [21] हे कुमार (कार्तिकेय) के बड़े भाई, आपको नमस्कार" — ऐसे पूजा करे। चंदन, फूल और अक्षत के साथ दो-दो दूब लेकर —

  22. एकैकेन तु नाम्ना वै दत्त्वैकं सर्वनामभिः ॥ अथैकविंशतिं गृह्य मोदकान्घृतपाचितान् ॥ २२ ॥

    ekaikena tu nāmnā vai dattvaikaṃ sarvanāmabhiḥ || athaikaviṃśatiṃ gṛhya modakānghṛtapācitān || 22 ||

    [22] एक-एक नाम से चढ़ाए, और अंत में एक दूब सब नामों से चढ़ाए। फिर घी में पके इक्कीस मोदक (लड्डू) लेकर —

  23. स्थापयित्वा गणाध्यक्षसमीपे कुरुनन्दन ॥ दश विप्राय दातव्याः स्वयं ग्राह्यास्तथा दश ॥ २३ ॥

    sthāpayitvā gaṇādhyakṣasamīpe kurunandana || daśa viprāya dātavyāḥ svayaṃ grāhyāstathā daśa || 23 ||

    [23] हे कुरुनंदन, उन्हें गणेश जी के पास रखे; उनमें से दस ब्राह्मण को दे और दस स्वयं प्रसाद रूप में ले।

  24. एकं गणाधिपे दद्यात्सनैवेद्यं नृपोत्तम ॥ विनायकस्य प्रतिमां ब्राह्मणाय निवेदयेत् ॥ २४ ॥

    ekaṃ gaṇādhipe dadyātsanaivedyaṃ nṛpottama || vināyakasya pratimāṃ brāhmaṇāya nivedayet || 24 ||

    [24] हे राजश्रेष्ठ, एक मोदक भोग सहित गणेश जी को अर्पित करे; और गणेश जी की मूर्ति ब्राह्मण को दान दे (इस मंत्र से) —

  25. विनायकस्य प्रतिमां वस्त्रयुग्मेन वेष्टिताम् ॥ तुभ्यं संप्रददे विप्र प्रीयतां मे गजाननः ॥ २५ ॥

    vināyakasya pratimāṃ vastrayugmena veṣṭitām || tubhyaṃ saṃpradade vipra prīyatāṃ me gajānanaḥ || 25 ||

    [25] "हे ब्राह्मण देव, दो वस्त्रों में लिपटी यह विनायक की मूर्ति मैं आपको देता हूँ; गजानन मुझ पर प्रसन्न हों।

  26. विनायक गणेश त्वं सर्वदेवनमस्कृत ॥ पार्वतीप्रिय विघ्नेश मम विघ्नं विनाशय ॥ २६ ॥

    vināyaka gaṇeśa tvaṃ sarvadevanamaskṛta || pārvatīpriya vighneśa mama vighnaṃ vināśaya || 26 ||

    [26] हे विनायक, हे गणेश, सब देवता आपको नमन करते हैं; हे पार्वती के प्रिय, हे विघ्नों के स्वामी, मेरे विघ्न दूर कीजिए।

  27. गणेशः प्रतिगृह्णाति गणेशो वै ददाति च ॥ गणेशस्तारकोभाभ्यां गणेशाय नमो नमः ॥ २७ ॥

    gaṇeśaḥ pratigṛhṇāti gaṇeśo vai dadāti ca || gaṇeśastārakobhābhyāṃ gaṇeśāya namo namaḥ || 27 ||

    [27] गणेश ही लेते हैं, गणेश ही देते हैं; गणेश ही दोनों (देने और लेने वाले) को पार लगाते हैं — गणेश जी को बार-बार नमस्कार।"

  28. कृत्वा नैमित्तिकं कर्म पूजयेदिष्टदेवताम् ॥ ब्राह्मणान्भोजयेत्पश्चाद्भुञ्जीयात्तैलवर्जितम् ॥ २८ ॥

    kṛtvā naimittikaṃ karma pūjayediṣṭadevatām || brāhmaṇānbhojayetpaścādbhuñjīyāttailavarjitam || 28 ||

    [28] फिर नित्य-नैमित्तिक कर्म करके अपने इष्ट देवता की पूजा करे; पहले ब्राह्मणों को भोजन कराए, फिर स्वयं बिना तेल का भोजन करे।

  29. एवं कृते धर्मराज गणनाथस्य पूजने ॥ विजयस्ते भवेन्नूनं सत्यं सत्यं मयोदितम् ॥ २९ ॥

    evaṃ kṛte dharmarāja gaṇanāthasya pūjane || vijayaste bhavennūnaṃ satyaṃ satyaṃ mayoditam || 29 ||

    [29] हे धर्मराज, गणेश जी की ऐसी पूजा करने पर तुम्हारी विजय निश्चित है — यह मैं सच-सच कहता हूँ।

  30. त्रिपुरं हन्तुकामेन पूजितः शूलपाणिना ॥ शक्रेण पूजितः पूर्वं वृत्रासुरवधेच्छया ॥ ३० ॥

    tripuraṃ hantukāmena pūjitaḥ śūlapāṇinā || śakreṇa pūjitaḥ pūrvaṃ vṛtrāsuravadhecchayā || 30 ||

    [30] त्रिपुरासुर को मारने की इच्छा से त्रिशूलधारी शिव ने स्वयं इनकी पूजा की थी; वृत्रासुर को मारने के लिए इंद्र ने भी पहले इन्हें पूजा था।

  31. अन्वेषयन्त्या भर्तारं पूजितोऽहल्यया पुरा ॥ नलस्यान्वेषणार्थाय दमयन्त्या पुरार्चितः ॥ ३१ ॥

    anveṣayantyā bhartāraṃ pūjito'halyayā purā || nalasyānveṣaṇārthāya damayantyā purārcitaḥ || 31 ||

    [31] पति को ढूँढती हुई अहल्या ने पहले इनकी पूजा की थी; नल को खोजने के लिए दमयंती ने भी इन्हें पूजा था।

  32. रघुनाथेन तद्वच्च सीतायान्वेषणे पुरा ॥ द्रष्टुं सीतां महाभागां वीरेण च हनूमता ॥ ३२ ॥

    raghunāthena tadvacca sītāyānveṣaṇe purā || draṣṭuṃ sītāṃ mahābhāgāṃ vīreṇa ca hanūmatā || 32 ||

    [32] वैसे ही सीता जी को खोजते समय श्रीराम ने, और महाभागा सीता जी के दर्शन के लिए वीर हनुमान ने इनकी पूजा की थी।

  33. भगीरथेन तद्वच्च गङ्गामानयता पुरा ॥ अमृतोत्पादनार्थाय तथा देवासुरैरपि ॥ ३३ ॥

    bhagīrathena tadvacca gaṅgāmānayatā purā || amṛtotpādanārthāya tathā devāsurairapi || 33 ||

    [33] गंगा जी को धरती पर लाते समय भगीरथ ने, और अमृत निकालने के लिए देवताओं और असुरों ने भी इनकी पूजा की थी।

  34. अमृतं हरता पूर्वं वैनतेयेन पक्षिणा ॥ आराधितो गणाध्यक्षो ह्यमृतं च हृतं बलात् ॥ ३४ ॥

    amṛtaṃ haratā pūrvaṃ vainateyena pakṣiṇā || ārādhito gaṇādhyakṣo hyamṛtaṃ ca hṛtaṃ balāt || 34 ||

    [34] अमृत ले जाते समय पक्षीराज गरुड़ ने गणेश जी की आराधना की, और तभी बलपूर्वक अमृत ले जा सके।

  35. रुक्मिणीं हर्तुकामेन पूजितोऽसौ मया प्रभुः ॥ तस्य प्रसादाद्राजेन्द्र रुक्मिणीं प्राप्तवानहम् ॥ ३५ ॥

    rukmiṇīṃ hartukāmena pūjito'sau mayā prabhuḥ || tasya prasādādrājendra rukmiṇīṃ prāptavānaham || 35 ||

    [35] रुक्मिणी को लाने की इच्छा से मैंने (कृष्ण ने) भी इन प्रभु की पूजा की; हे राजन, इन्हीं की कृपा से मुझे रुक्मिणी मिलीं।

  36. यदा पूर्वं हि दैत्येन हृतो रुक्मिणिनन्दनः ॥ आराधितो मया तद्वद्रुक्मिण्या सहितेन च ॥ ३६ ॥

    yadā pūrvaṃ hi daityena hṛto rukmiṇinandanaḥ || ārādhito mayā tadvadrukmiṇyā sahitena ca || 36 ||

    [36] जब पहले एक दैत्य रुक्मिणी के पुत्र (प्रद्युम्न) को उठा ले गया था, तब मैंने रुक्मिणी के साथ मिलकर इनकी आराधना की थी।

  37. कुष्ठव्याधियुतेनाथ साम्बेनाराधितः पुरा ॥ जयकामस्तथा शीघ्रं त्वमाराधय शांकरिम् ॥ ३७ ॥

    kuṣṭhavyādhiyutenātha sāmbenārādhitaḥ purā || jayakāmastathā śīghraṃ tvamārādhaya śāṃkarim || 37 ||

    [37] कोढ़ के रोग से पीड़ित साम्ब ने भी पहले इनकी आराधना की थी। इसलिए जीत चाहने वाले तुम भी जल्दी से शंकर-पुत्र गणेश की आराधना करो।

  38. विद्याकामो लभेद्विद्यां धनकामो धनं तथा ॥ जयं च जयकामस्तु पुत्रार्थी विन्दते सुतान् ॥ ३८ ॥

    vidyākāmo labhedvidyāṃ dhanakāmo dhanaṃ tathā || jayaṃ ca jayakāmastu putrārthī vindate sutān || 38 ||

    [38] विद्या चाहने वाले को विद्या, धन चाहने वाले को धन, जीत चाहने वाले को जीत, और संतान चाहने वाले को संतान मिलती है।

  39. पतिकामा च भर्तारं सौभाग्यं च सुवासिनी ॥ विधवा पूजयित्वा तु वैधव्यं नाप्नुयात्क्वचित् ॥ ३९ ॥

    patikāmā ca bhartāraṃ saubhāgyaṃ ca suvāsinī || vidhavā pūjayitvā tu vaidhavyaṃ nāpnuyātkvacit || 39 ||

    [39] पति चाहने वाली कन्या को पति, सुहागिन को सौभाग्य मिलता है; और विधवा इनकी पूजा करे तो (अगले जन्म में) उसे वैधव्य नहीं मिलता।

  40. वैष्णव्याद्यासु दीक्षासु आदौ पूज्यो गणाधिपः ॥ तस्मिन्संपूजिते विष्णुरीशो भानुस्तथा ह्युमा ॥ ४० ॥

    vaiṣṇavyādyāsu dīkṣāsu ādau pūjyo gaṇādhipaḥ || tasminsaṃpūjite viṣṇurīśo bhānustathā hyumā || 40 ||

    [40] वैष्णव आदि सभी दीक्षाओं में सबसे पहले गणेश जी पूजे जाते हैं; उनकी पूजा से विष्णु, शिव, सूर्य और उमा —

  41. हव्यवाहमुखा देवाः पूजिताः स्युर्न संशयः ॥ चण्डिकाद्या मातृगणाः परितुष्टा भवन्ति च ॥ ४१ ॥

    havyavāhamukhā devāḥ pūjitāḥ syurna saṃśayaḥ || caṇḍikādyā mātṛgaṇāḥ parituṣṭā bhavanti ca || 41 ||

    [41] अग्नि आदि सब देवता पूजित हो जाते हैं, इसमें संदेह नहीं; चंडिका आदि मातृगण भी प्रसन्न हो जाते हैं।

  42. तस्मिन्संपूजिते विप्रा भक्त्या सिद्धिविनायके ॥ एवं कृते धर्मराज गणनाथस्य पूजने ॥ ४२ ॥

    tasminsaṃpūjite viprā bhaktyā siddhivināyake || evaṃ kṛte dharmarāja gaṇanāthasya pūjane || 42 ||

    [42] हे ब्राह्मणो, भक्ति से सिद्धिविनायक की पूजा होने पर — (श्रीकृष्ण ने कहा:) हे धर्मराज, गणेश जी की ऐसी पूजा करने पर —

    टिप्पणी: मूल में इस श्लोक का अर्थ अगले श्लोक से जुड़ता है।

  43. प्राप्स्यसि त्वं स्वकं राज्यं हत्वा शत्रून्रणाजिरे ॥ सिध्यन्ति सर्वकार्याणि नात्र कार्या विचारणा ॥ ४३ ॥

    prāpsyasi tvaṃ svakaṃ rājyaṃ hatvā śatrūnraṇājire || sidhyanti sarvakāryāṇi nātra kāryā vicāraṇā || 43 ||

    [43] तुम युद्धभूमि में शत्रुओं को मारकर अपना राज्य पाओगे; तुम्हारे सब काम सिद्ध होंगे, इसमें सोचने की बात ही नहीं।

  44. एवमुक्तस्तु कृष्णेन सानुजः पाण्डुनन्दनः ॥ पूजयामास देवस्य पुत्रं त्रिपुरघातिनः ॥ ४४ ॥

    evamuktastu kṛṣṇena sānujaḥ pāṇḍunandanaḥ || pūjayāmāsa devasya putraṃ tripuraghātinaḥ || 44 ||

    [44] श्रीकृष्ण के ऐसा कहने पर पांडु-पुत्र युधिष्ठिर ने अपने भाइयों के साथ त्रिपुरारी शिव के पुत्र गणेश की पूजा की,

  45. शत्रुसंघं निहत्याजौ प्राप्तवान्राज्यमोजसा ॥ सूत उवाच ॥ यः पूजयेन्महाभागो गणेशं सिद्धिदायकम् ॥ ४५ ॥

    śatrusaṃghaṃ nihatyājau prāptavānrājyamojasā || sūta uvāca || yaḥ pūjayenmahābhāgo gaṇeśaṃ siddhidāyakam || 45 ||

    [45] और युद्ध में शत्रुओं के झुंड को मारकर अपने पराक्रम से राज्य पाया। सूत जी बोले: जो भाग्यशाली सिद्धि देने वाले गणेश की पूजा करता है,

  46. सिध्यन्ति तस्य कार्याणि मनसा चिन्तितान्यपि ॥ ख्यातिं गमिष्यते तेन नाम्ना सिद्धिविनायकः ॥ ४६ ॥

    sidhyanti tasya kāryāṇi manasā cintitānyapi || khyātiṃ gamiṣyate tena nāmnā siddhivināyakaḥ || 46 ||

    [46] उसके मन में सोचे हुए काम भी पूरे हो जाते हैं; इसी कारण वे ‘सिद्धिविनायक’ नाम से प्रसिद्ध होंगे।

  47. य इदं शृणुयान्नित्यं श्रावयेद्वा समाहितः ॥ सिध्यन्ति सर्वकार्याणि विनायकप्रसादतः ॥ ४७ ॥

    ya idaṃ śṛṇuyānnityaṃ śrāvayedvā samāhitaḥ || sidhyanti sarvakāryāṇi vināyakaprasādataḥ || 47 ||

    [47] जो इस कथा को रोज़ ध्यान से सुनता या सुनाता है, विनायक की कृपा से उसके सब काम सिद्ध होते हैं।

  48. इति सिद्धिविनायकव्रतं भविष्योक्तं संपूर्णम् ॥

    iti siddhivināyakavrataṃ bhaviṣyoktaṃ saṃpūrṇam ||

    [इति] (ग्रंथ के अनुसार) भविष्य पुराण में कहा गया सिद्धिविनायक व्रत यहाँ पूरा हुआ।

स्यमन्तक मणि उपाख्यान (चंद्र-दर्शन दोष निवारण कथा) (139 श्लोक)

🔈 संस्कृत पाठ / Sanskrit chanting: audio coming soon / ऑडियो जल्द आएगा

  1. मासि भाद्रपदे शुक्ले शिवा लोके प्रपूजिता ॥ तस्यां स्नानं तथा दानमुपवासोऽर्चनं तथा ॥ क्रियमाणं शतगुणं प्रसादाद्दन्तिनो नृप ॥ चतुर्थीत्यनुषङ्गः ॥

    māsi bhādrapade śukle śivā loke prapūjitā || tasyāṃ snānaṃ tathā dānamupavāso'rcanaṃ tathā || kriyamāṇaṃ śataguṇaṃ prasādāddantino nṛpa || caturthītyanuṣaṅgaḥ ||

    [भूमिका १] (ग्रंथ की भूमिका) भादों मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी लोक में पूजी जाती है। हे राजन, उस दिन किया गया स्नान, दान, उपवास और पूजा गणेश जी की कृपा से सौ गुना फल देता है।

  2. अस्यामेव चन्द्रदर्शने दोषमाह पराशरः ॥ कन्यादित्ये चतुर्थ्यां च शुक्ले चन्द्रस्य दर्शनम् ॥ मिथ्याभिदूषणं कुर्यात्तस्मात्पश्येन्न तं सदा ॥

    asyāmeva candradarśane doṣamāha parāśaraḥ || kanyāditye caturthyāṃ ca śukle candrasya darśanam || mithyābhidūṣaṇaṃ kuryāttasmātpaśyenna taṃ sadā ||

    [भूमिका २] इसी चतुर्थी को चंद्रमा देखने का दोष पराशर ऋषि बताते हैं: सूर्य जब कन्या राशि में हो, तब शुक्ल चतुर्थी को चंद्र-दर्शन झूठा कलंक लगाता है; इसलिए उस दिन चंद्रमा न देखें।

  3. तद्दोषशान्तये मन्त्रो विष्णुपुराणे ॥ सिंहः प्रसेनमवधीत्सिंहो जाम्बवता हतः ॥ सुकुमारक मारोदीस्तव ह्येष स्यमन्तकः ॥ अथ स्यमन्तकोपाख्यानम् ॥

    taddoṣaśāntaye mantro viṣṇupurāṇe || siṃhaḥ prasenamavadhītsiṃho jāmbavatā hataḥ || sukumāraka mārodīstava hyeṣa syamantakaḥ || atha syamantakopākhyānam ||

    [भूमिका ३] उस दोष की शांति का मंत्र विष्णु पुराण में है: "सिंह ने प्रसेन को मारा, जाम्बवान ने सिंह को मारा; हे सुकुमार बालक, रोओ मत — यह स्यमंतक मणि तुम्हारी ही है।" अब स्यमंतक की कथा आरंभ होती है।

    टिप्पणी: यह चंद्र-दर्शन दोष शांति का प्रसिद्ध मंत्र है (ग्रंथ विष्णु पुराण का बताता है)।

  4. नन्दिकेश्वर उवाच ॥ शृणुष्वैकाग्रचित्तः सन्व्रतं गणेश्वरं महत् ॥ चतुर्थ्यां शुक्लपक्षे तु सदा कार्यं प्रयत्नतः ॥ १ ॥

    nandikeśvara uvāca || śṛṇuṣvaikāgracittaḥ sanvrataṃ gaṇeśvaraṃ mahat || caturthyāṃ śuklapakṣe tu sadā kāryaṃ prayatnataḥ || 1 ||

    [1] नंदिकेश्वर बोले: (हे सनत्कुमार,) एकाग्र मन से गणेश जी का यह महान व्रत सुनो; इसे शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को सदा ध्यान से करना चाहिए।

  5. सनत्कुमार योगीन्द्र यदीच्छेच्छुभमात्मनः ॥ नारी वा पुरुषो वापि यः कुर्याद्विधिवद्व्रतम् ॥ २ ॥

    sanatkumāra yogīndra yadīcchecchubhamātmanaḥ || nārī vā puruṣo vāpi yaḥ kuryādvidhivadvratam || 2 ||

    [2] हे योगिराज सनत्कुमार, जो अपना भला चाहे — स्त्री हो या पुरुष — वह इस व्रत को विधि से करे।

  6. मोचयत्याशु विप्रेन्द्र संकष्टाद्दन्तिनं हि तत् ॥ अपवादहरं चैव सर्वविघ्नप्रणाशनम् ॥ ३ ॥

    mocayatyāśu viprendra saṃkaṣṭāddantinaṃ hi tat || apavādaharaṃ caiva sarvavighnapraṇāśanam || 3 ||

    [3] हे विप्रश्रेष्ठ, यह व्रत गजानन की कृपा से जल्दी ही संकट से छुड़ाता है; झूठे कलंक को हरता है और सब विघ्नों का नाश करता है।

  7. कान्तारे विषमे वापि रणे राजकुलेऽथवा ॥ सर्वसिद्धिकरं विद्धि व्रतानामुत्तमं व्रतम् ॥ ४ ॥

    kāntāre viṣame vāpi raṇe rājakule'thavā || sarvasiddhikaraṃ viddhi vratānāmuttamaṃ vratam || 4 ||

    [4] घने जंगल में, कठिन स्थिति में, युद्ध में या राज-दरबार में — इसे सब सिद्धि देने वाला, व्रतों में उत्तम व्रत जानो।

  8. गजाननप्रियं चाथ त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ॥ अतो न विद्यते ब्रह्मन्सर्वसंकष्टनाशनम् ॥ ५ ॥

    gajānanapriyaṃ cātha triṣu lokeṣu viśrutam || ato na vidyate brahmansarvasaṃkaṣṭanāśanam || 5 ||

    [5] यह गजानन को प्रिय है और तीनों लोकों में प्रसिद्ध है; हे ब्रह्मन्, सब संकटों को मिटाने वाला इससे बढ़कर कुछ नहीं।

  9. सनत्कुमार उवाच ॥ केन चादौ पुराचीर्णं मर्त्यलोके कथं गतम् ॥ एतत्समस्तं विस्तार्य ब्रूहि गणेश्वरं व्रतम् ॥ ६ ॥

    sanatkumāra uvāca || kena cādau purācīrṇaṃ martyaloke kathaṃ gatam || etatsamastaṃ vistārya brūhi gaṇeśvaraṃ vratam || 6 ||

    [6] सनत्कुमार बोले: पहले-पहल यह व्रत किसने किया, और मनुष्य-लोक में यह कैसे आया? गणेश जी का यह व्रत विस्तार से बताइए।

  10. नन्दिकेश्वर उवाच ॥ चक्रे व्रतं जगन्नाथो वासुदेवः प्रतापवान् ॥ आदिष्टं नारदेनैव वृथालाञ्छनमुक्तये ॥ ७ ॥

    nandikeśvara uvāca || cakre vrataṃ jagannātho vāsudevaḥ pratāpavān || ādiṣṭaṃ nāradenaiva vṛthālāñchanamuktaye || 7 ||

    [7] नंदिकेश्वर बोले: प्रतापी जगन्नाथ वासुदेव (श्रीकृष्ण) ने यह व्रत किया था — नारद जी के कहने पर, झूठे कलंक से छूटने के लिए।

  11. सनत्कुमार उवाच ॥ षड्गुणैश्वर्यसंपन्नः सृष्टिसंहारकारकः ॥ वासुदेवो जगद्व्यापी प्राप्तवाँल्लाञ्छनं कथम् ॥ ८ ॥

    sanatkumāra uvāca || ṣaḍguṇaiśvaryasaṃpannaḥ sṛṣṭisaṃhārakārakaḥ || vāsudevo jagadvyāpī prāptavā~llāñchanaṃ katham || 8 ||

    [8] सनत्कुमार बोले: छहों ऐश्वर्यों से भरे, सृष्टि और संहार करने वाले, जगत में व्याप्त वासुदेव को कलंक कैसे लगा?

  12. एतदाश्चर्यमाख्यानं ब्रूहि त्वं नन्दिकेश्वर ॥ नन्दिकेश्वर उवाच ॥ भूमिभारनिवृत्त्यर्थं वसुदेवसुतावुभौ ॥ ९ ॥

    etadāścaryamākhyānaṃ brūhi tvaṃ nandikeśvara || nandikeśvara uvāca || bhūmibhāranivṛttyarthaṃ vasudevasutāvubhau || 9 ||

    [9] हे नंदिकेश्वर, यह आश्चर्य भरी कथा मुझे बताइए। नंदिकेश्वर बोले: धरती का भार उतारने के लिए वसुदेव के दो पुत्र —

  13. रामकृष्णौ समुत्पन्नौ पद्मनाभफणीश्वरौ ॥ जरासंधभयात्कृष्णो द्वारकां समकल्पयत् ॥ १० ॥

    rāmakṛṣṇau samutpannau padmanābhaphaṇīśvarau || jarāsaṃdhabhayātkṛṣṇo dvārakāṃ samakalpayat || 10 ||

    [10] बलराम और कृष्ण जन्मे — मानो शेषनाग और पद्मनाभ विष्णु स्वयं। जरासंध के डर से कृष्ण ने द्वारका नगरी बसाई।

  14. विश्वकर्माणमाहूय पुरीं हाटकनिर्मिताम् ॥ तत्र षोडशसाहस्रं स्त्रीणां चैव शताधिकम् ॥ ११ ॥

    viśvakarmāṇamāhūya purīṃ hāṭakanirmitām || tatra ṣoḍaśasāhasraṃ strīṇāṃ caiva śatādhikam || 11 ||

    [11] विश्वकर्मा को बुलाकर सोने की नगरी बनवाई; वहाँ सोलह हज़ार एक सौ रानियों के लिए —

  15. भवनानि मनोज्ञानि तेषां मध्ये व्यकल्पयत् ॥ पारिजाततरुं मध्ये तासां भोगाय कल्पयत् ॥ १२ ॥

    bhavanāni manojñāni teṣāṃ madhye vyakalpayat || pārijātataruṃ madhye tāsāṃ bhogāya kalpayat || 12 ||

    [12] उनके बीच सुंदर महल बनवाए, और उनके सुख के लिए बीच में पारिजात का वृक्ष लगवाया।

  16. यादवानां गृहास्तत्र षट्पञ्चाशच्च कोटयः ॥ अन्येऽपि बहवो लोका वसन्ति विगतज्वराः ॥ १३ ॥

    yādavānāṃ gṛhāstatra ṣaṭpañcāśacca koṭayaḥ || anye'pi bahavo lokā vasanti vigatajvarāḥ || 13 ||

    [13] वहाँ यादवों के छप्पन करोड़ घर थे; और भी बहुत लोग बिना किसी चिंता के रहते थे।

  17. यत्किंचित्त्रिषु लोकेषु सुन्दरं तत्र दृश्यते ॥ सत्राजितप्रसेनाख्यौ पुत्रावुग्रस्य विश्रुतौ ॥ १४ ॥

    yatkiṃcittriṣu lokeṣu sundaraṃ tatra dṛśyate || satrājitaprasenākhyau putrāvugrasya viśrutau || 14 ||

    [14] तीनों लोकों में जो कुछ सुंदर है, वह सब वहाँ दिखता था। वहाँ उग्रसेन के (कुल के) दो प्रसिद्ध पुत्र थे — सत्राजित और प्रसेन।

  18. अम्भोधितीरमासाद्य तन्मनस्कतया च सः ॥ सत्राजितस्तपस्तेपे सूर्यमुद्दिश्य बुद्धिमान् ॥ १५ ॥

    ambhodhitīramāsādya tanmanaskatayā ca saḥ || satrājitastapastepe sūryamuddiśya buddhimān || 15 ||

    [15] बुद्धिमान सत्राजित ने समुद्र के किनारे जाकर, मन को सूर्य में लगाकर, सूर्य देव के लिए तप किया।

  19. व्रतं निरशनं गृह्य सूर्यसंबद्धलोचनः ॥ ततः प्रसन्नो भगवान्सत्राजितपुरःस्थिरः ॥ १६ ॥

    vrataṃ niraśanaṃ gṛhya sūryasaṃbaddhalocanaḥ || tataḥ prasanno bhagavānsatrājitapuraḥsthiraḥ || 16 ||

    [16] बिना भोजन का व्रत लेकर, आँखें सूर्य पर टिकाए रहा। तब भगवान सूर्य प्रसन्न होकर सत्राजित के सामने आकर खड़े हो गए।

  20. सत्राजितोऽपि तुष्टाव दृष्ट्वा देवं दिवाकरम् ॥ तेजोराशे नमस्तेऽस्तु नमस्ते सर्वतोमुख ॥ १७ ॥

    satrājito'pi tuṣṭāva dṛṣṭvā devaṃ divākaram || tejorāśe namaste'stu namaste sarvatomukha || 17 ||

    [17] सूर्य देव को देखकर सत्राजित ने स्तुति की: "हे तेज के भंडार, आपको नमस्कार; हे सब ओर मुख वाले, आपको नमस्कार।

  21. विश्वव्यापिन्नमस्तेऽस्तु नमस्ते विश्वरूपिणे ॥ काश्यपेय नमस्तेऽस्तु हरिदश्व नमोऽस्तु ते ॥ १८ ॥

    viśvavyāpinnamaste'stu namaste viśvarūpiṇe || kāśyapeya namaste'stu haridaśva namo'stu te || 18 ||

    [18] हे विश्व में व्याप्त, नमस्कार; हे विश्वरूप, नमस्कार; हे कश्यप-पुत्र, नमस्कार; हे हरे घोड़ों वाले, आपको नमस्कार।

  22. ग्रहराज नमस्तेऽस्तु नमस्ते चण्डरोचिषे ॥ वेदत्रय नमस्तेऽस्तु सर्वदेव नमोऽस्तु ते ॥ १९ ॥

    graharāja namaste'stu namaste caṇḍarociṣe || vedatraya namaste'stu sarvadeva namo'stu te || 19 ||

    [19] हे ग्रहों के राजा, नमस्कार; हे प्रचंड प्रकाश वाले, नमस्कार; हे तीनों वेदों के रूप, नमस्कार; हे सर्वदेव, आपको नमस्कार।

  23. प्रसीद पाहि देवेश सुदृष्ट्या मां दिवाकर ॥ इत्थं संस्तूयमानोऽसौ देवदेवो दिवाकरः ॥ २० ॥

    prasīda pāhi deveśa sudṛṣṭyā māṃ divākara || itthaṃ saṃstūyamāno'sau devadevo divākaraḥ || 20 ||

    [20] हे देवेश दिवाकर, प्रसन्न होइए, अपनी कृपा-दृष्टि से मेरी रक्षा कीजिए।" ऐसी स्तुति सुनकर देवों के देव सूर्य —

  24. स्निग्धगम्भीरमधुरं सत्राजितमुवाच ह ॥ सूर्य उवाच ॥ वरं ब्रूहि प्रदास्यामि यत्ते मनसि वर्तते ॥ २१ ॥

    snigdhagambhīramadhuraṃ satrājitamuvāca ha || sūrya uvāca || varaṃ brūhi pradāsyāmi yatte manasi vartate || 21 ||

    [21] सत्राजित से स्नेह भरी, गंभीर और मधुर वाणी में बोले: "जो तुम्हारे मन में हो, वह वर माँगो, मैं दूँगा।

  25. सत्राजित महाभाग तुष्टोऽहं तव निश्चयात् ॥ सत्राजित उवाच ॥ स्यमन्तकमणिं देहि यदि तुष्टोऽसि भास्कर ॥ २२ ॥

    satrājita mahābhāga tuṣṭo'haṃ tava niścayāt || satrājita uvāca || syamantakamaṇiṃ dehi yadi tuṣṭo'si bhāskara || 22 ||

    [22] हे भाग्यशाली सत्राजित, तुम्हारी दृढ़ता से मैं प्रसन्न हूँ।" सत्राजित बोले: "हे भास्कर, यदि आप प्रसन्न हैं तो मुझे स्यमंतक मणि दीजिए।"

  26. ददौ तस्य च तद्रत्नं स्वकण्ठादवतार्य सः ॥ भास्कर उवाच ॥ भाराष्टकं शातकुम्भं स्रवतेऽसौ महामणिः ॥ २३ ॥

    dadau tasya ca tadratnaṃ svakaṇṭhādavatārya saḥ || bhāskara uvāca || bhārāṣṭakaṃ śātakumbhaṃ sravate'sau mahāmaṇiḥ || 23 ||

    [23] सूर्य ने अपने गले से उतारकर वह रत्न उसे दे दिया। सूर्य बोले: "यह महामणि (रोज़) आठ भार सोना देती है।

  27. शुचिष्मता सदा धार्यं रत्नमेतन्महोत्तमम् ॥ सत्राजित क्षणेनैतदशुचिं हन्ति मानवम् ॥ इत्युक्त्वान्तर्दधे देवस्तेजोराशिर्दिवाकरः ॥ २४ ॥

    śuciṣmatā sadā dhāryaṃ ratnametanmahottamam || satrājita kṣaṇenaitadaśuciṃ hanti mānavam || ityuktvāntardadhe devastejorāśirdivākaraḥ || 24 ||

    [24] यह श्रेष्ठ रत्न सदा पवित्र (शुद्ध) रहकर ही पहनना; हे सत्राजित, अपवित्र मनुष्य को यह पल भर में मार देता है।" ऐसा कहकर तेज के भंडार सूर्य देव अंतर्धान हो गए।

  28. तत्कण्ठरत्नं ज्वलमानरूपी पुरीं स कृष्णस्य विवेश सत्वरम् ॥ दृष्ट्वा तु लोका मनसा दिवाकरं संचिन्तयन्तो हि विमुष्टदृष्टयः ॥ २५ ॥

    tatkaṇṭharatnaṃ jvalamānarūpī purīṃ sa kṛṣṇasya viveśa satvaram || dṛṣṭvā tu lokā manasā divākaraṃ saṃcintayanto hi vimuṣṭadṛṣṭayaḥ || 25 ||

    [25] गले में चमकता वह रत्न पहने सत्राजित जल्दी ही कृष्ण की नगरी में आया; उसे देखकर लोग चौंधियाई आँखों से मन में सोचने लगे कि सूर्य ही आ गए —

  29. समागतोऽयं हरिदश्वदीधितिर्जनार्दनं द्रष्टुमसंशयेन ॥ नायं सहस्रांशुरितीह लोकाः सत्राजितोऽयं मणिकण्ठभास्वान् ॥ २६ ॥

    samāgato'yaṃ haridaśvadīdhitirjanārdanaṃ draṣṭumasaṃśayena || nāyaṃ sahasrāṃśuritīha lokāḥ satrājito'yaṃ maṇikaṇṭhabhāsvān || 26 ||

    [26] "निश्चय ही हरे घोड़ों वाले सूर्य जनार्दन के दर्शन को आए हैं।" (फिर समझे:) "नहीं, यह सूर्य नहीं, गले में मणि से चमकता सत्राजित है।"

  30. स्यमन्तकं महारत्नं दृष्ट्वा तत्कण्ठमण्डले ॥ स्पृहां चक्रे जगन्नाथो न जहार मणिं ततः ॥ २७ ॥

    syamantakaṃ mahāratnaṃ dṛṣṭvā tatkaṇṭhamaṇḍale || spṛhāṃ cakre jagannātho na jahāra maṇiṃ tataḥ || 27 ||

    [27] उसके गले में वह महारत्न स्यमंतक देखकर जगन्नाथ कृष्ण के मन में उसकी इच्छा हुई, पर उन्होंने मणि छीनी नहीं।

  31. सत्राजितो जातभयो याचयिष्यति मां हरिः ॥ प्रसेनाय ददौ भ्रात्रे धार्योऽयं शुचिना त्वया ॥ २८ ॥

    satrājito jātabhayo yācayiṣyati māṃ hariḥ || prasenāya dadau bhrātre dhāryo'yaṃ śucinā tvayā || 28 ||

    [28] सत्राजित डर गया कि "कृष्ण मुझसे यह माँगेंगे"; इसलिए उसने मणि अपने भाई प्रसेन को दे दी और कहा, "इसे पवित्र रहकर ही पहनना।"

  32. एकदा कण्ठदेशेऽसौ क्षिप्त्वा तं मणिमुत्तमम् ॥ मृगयाक्रीडनार्थाय ययौ कृष्णेन संयुतः ॥ २९ ॥

    ekadā kaṇṭhadeśe'sau kṣiptvā taṃ maṇimuttamam || mṛgayākrīḍanārthāya yayau kṛṣṇena saṃyutaḥ || 29 ||

    [29] एक दिन प्रसेन वह उत्तम मणि गले में डालकर कृष्ण के साथ शिकार खेलने गया।

  33. अश्वारूढोऽशुचिश्चासौ हतः सिंहेन तत्क्षणात् ॥ रत्नमादाय सिंहोऽपि गच्छञ्जाम्बवता हतः ॥ ३० ॥

    aśvārūḍho'śuciścāsau hataḥ siṃhena tatkṣaṇāt || ratnamādāya siṃho'pi gacchañjāmbavatā hataḥ || 30 ||

    [30] घोड़े पर सवार और अपवित्र अवस्था में होने से उसे तुरंत एक सिंह ने मार डाला; सिंह रत्न लेकर जा रहा था कि जाम्बवान (ऋक्षराज) ने उसे मार डाला।

  34. नीत्वा स विवरे रत्नं ददौ पुत्राय जाम्बवान् ॥ पुरीं विवेश कृष्णोऽपि स्वकैः सर्वैः समावृतः ॥ ३१ ॥

    nītvā sa vivare ratnaṃ dadau putrāya jāmbavān || purīṃ viveśa kṛṣṇo'pi svakaiḥ sarvaiḥ samāvṛtaḥ || 31 ||

    [31] जाम्बवान ने रत्न अपनी गुफा में ले जाकर अपने बेटे को दे दिया। उधर कृष्ण अपने साथियों के साथ नगरी लौट आए।

  35. प्रसेनोऽद्यापि नायाति हतः कृष्णेन निश्चितम् ॥ मणिलोभेन हा कष्टं बान्धवः पापिना हतः ॥ ३२ ॥

    praseno'dyāpi nāyāti hataḥ kṛṣṇena niścitam || maṇilobhena hā kaṣṭaṃ bāndhavaḥ pāpinā hataḥ || 32 ||

    [32] "प्रसेन अब तक नहीं लौटा — ज़रूर कृष्ण ने उसे मार दिया; हाय, मणि के लोभ में इस पापी ने अपने ही भाई-बंधु को मार डाला!" —

  36. द्वारकावासिनः सर्वे जना ऊचुः परस्परम् ॥ वृथापवादसंतप्तः कृष्णोऽपि निरगाच्छनैः ॥ ३३ ॥

    dvārakāvāsinaḥ sarve janā ūcuḥ parasparam || vṛthāpavādasaṃtaptaḥ kṛṣṇo'pi niragācchanaiḥ || 33 ||

    [33] द्वारका के सब लोग आपस में यही कहने लगे। इस झूठे कलंक से दुखी होकर कृष्ण धीरे से (नगर से) निकल पड़े।

  37. सहैव तैर्गतोऽरण्यं दृष्ट्वा सिंहेन पातितम् ॥ प्रसेनं वाहनयुतं तत्पदानुचरः शनैः ॥ ३४ ॥

    sahaiva tairgato'raṇyaṃ dṛṣṭvā siṃhena pātitam || prasenaṃ vāhanayutaṃ tatpadānucaraḥ śanaiḥ || 34 ||

    [34] लोगों को साथ लेकर वन में गए; वहाँ घोड़े सहित प्रसेन को सिंह द्वारा मारा हुआ देखा; फिर पैरों के निशानों के पीछे धीरे-धीरे चलते हुए —

  38. ऋक्षेण निहतं दृष्ट्वा कृष्ण ऋक्षबिलं गतः ॥ विवेश योजनशतमन्धकारं स्वतेजसा ॥ ३५ ॥

    ṛkṣeṇa nihataṃ dṛṣṭvā kṛṣṇa ṛkṣabilaṃ gataḥ || viveśa yojanaśatamandhakāraṃ svatejasā || 35 ||

    [35] सिंह को रीछ द्वारा मारा गया देखा; तब कृष्ण रीछ की गुफा में घुसे; सौ योजन लंबे अंधकार में अपने तेज से —

  39. निवारयन्ददर्शाग्रे प्रासादं बद्धभूमिकम् ॥ तं कुमारं जाम्बवतो दोलायामसितद्युतिम् ॥ ३६ ॥

    nivārayandadarśāgre prāsādaṃ baddhabhūmikam || taṃ kumāraṃ jāmbavato dolāyāmasitadyutim || 36 ||

    [36] अँधेरा हटाते हुए आगे कई मंज़िला महल देखा; वहाँ झूले में जाम्बवान का साँवला-सा बालक था,

  40. माणिक्यं लम्बमानं च ददर्श भगवान्हरिः ॥ रूपयौवनसंपन्नां कन्यां जाम्बवतीं पुनः ॥ ३७ ॥

    māṇikyaṃ lambamānaṃ ca dadarśa bhagavānhariḥ || rūpayauvanasaṃpannāṃ kanyāṃ jāmbavatīṃ punaḥ || 37 ||

    [37] और उसके ऊपर लटकती मणि भगवान हरि ने देखी; फिर सुंदर रूप और यौवन वाली कन्या जाम्बवती को —

  41. दोलां दोलयमानां च ददर्श कमलेक्षणः ॥ महान्तं विस्मयं चक्रे दृष्ट्वा तां चारुहासिनीम् ॥ दोलां दोलयमाना च जगौ गीतमिदं मुहुः ॥ ३८ ॥

    dolāṃ dolayamānāṃ ca dadarśa kamalekṣaṇaḥ || mahāntaṃ vismayaṃ cakre dṛṣṭvā tāṃ cāruhāsinīm || dolāṃ dolayamānā ca jagau gītamidaṃ muhuḥ || 38 ||

    [38] झूला झुलाते हुए कमलनयन कृष्ण ने देखा; उस मधुर मुस्कान वाली को देखकर वे बहुत चकित हुए। झूला झुलाते हुए वह बार-बार यह गीत गा रही थी —

  42. सिंहः प्रसेनमवधीत्सिंहो जाम्बवता हतः ॥ सुकुमारक मारोदीस्तव ह्येष स्यमन्तकः ॥ ३९ ॥

    siṃhaḥ prasenamavadhītsiṃho jāmbavatā hataḥ || sukumāraka mārodīstava hyeṣa syamantakaḥ || 39 ||

    [39] "सिंह ने प्रसेन को मारा, जाम्बवान ने सिंह को मारा; हे सुकुमार बालक, रोओ मत — यह स्यमंतक तुम्हारा ही है।"

  43. मदनज्वरदाहार्ता दृष्ट्वा तं कमलेक्षणम् ॥ उवाच ललितं बाला गम्यतां गम्यतामिति ॥ ४० ॥

    madanajvaradāhārtā dṛṣṭvā taṃ kamalekṣaṇam || uvāca lalitaṃ bālā gamyatāṃ gamyatāmiti || 40 ||

    [40] कमलनयन कृष्ण को देखकर, प्रेम-भाव से व्याकुल वह कन्या धीमे से बोली: "चले जाइए, चले जाइए —

  44. रत्नं गृहीत्वा वेगेन यावच्छेते तु जाम्बवान् ॥ इत्याकर्ण्य वचः शौरिः शङ्खं दध्मौ प्रतापवान् ॥ ४१ ॥

    ratnaṃ gṛhītvā vegena yāvacchete tu jāmbavān || ityākarṇya vacaḥ śauriḥ śaṅkhaṃ dadhmau pratāpavān || 41 ||

    [41] जब तक जाम्बवान सो रहे हैं, रत्न लेकर जल्दी चले जाइए।" यह सुनकर प्रतापी शौरि (कृष्ण) ने शंख बजा दिया।

  45. आकर्ण्य सहसोत्थाय युयुधे ऋक्षराट् ततः ॥ तयोर्युद्धमभूद्घोरं हरिजाम्बवतोस्तदा ॥ ४२ ॥

    ākarṇya sahasotthāya yuyudhe ṛkṣarāṭ tataḥ || tayoryuddhamabhūdghoraṃ harijāmbavatostadā || 42 ||

    [42] शंख सुनते ही ऋक्षराज जाम्बवान झट उठकर लड़ने लगे; तब हरि और जाम्बवान के बीच भयंकर युद्ध हुआ।

  46. द्वारकावासिनः सर्वे गतास्ते सप्तमे दिने ॥ मृतः कृष्णो भक्षितो वा निःसंदिग्धं विचार्य च ॥ ४३ ॥

    dvārakāvāsinaḥ sarve gatāste saptame dine || mṛtaḥ kṛṣṇo bhakṣito vā niḥsaṃdigdhaṃ vicārya ca || 43 ||

    [43] द्वारका के सब लोग सातवें दिन (आस छोड़कर) लौट गए; यह सोचकर कि "कृष्ण मर गए या खा लिए गए" —

  47. परलोकक्रियां चक्रुः परेतस्य तु ते तदा ॥ एकविंशद्दिनं यावद्बाहुप्रहरणो विभुः ॥ ४४ ॥

    paralokakriyāṃ cakruḥ paretasya tu te tadā || ekaviṃśaddinaṃ yāvadbāhupraharaṇo vibhuḥ || 44 ||

    [44] उन्होंने कृष्ण को मृत मानकर उनकी अंतिम क्रिया कर दी। उधर प्रभु इक्कीस दिन तक केवल भुजाओं से —

  48. युयुधे तेन ऋक्षेण युद्धकर्मणि तोषितः ॥ जाम्बवान्प्राक्तनं स्मृत्वा दृष्ट्वा देवबलं महत् ॥ ४५ ॥

    yuyudhe tena ṛkṣeṇa yuddhakarmaṇi toṣitaḥ || jāmbavānprāktanaṃ smṛtvā dṛṣṭvā devabalaṃ mahat || 45 ||

    [45] उस रीछ से लड़ते रहे; युद्ध से प्रसन्न हुए जाम्बवान को पुरानी बात (रामावतार) याद आई, और प्रभु का महान दिव्य बल देखकर —

  49. जाम्बवानुवाच ॥ अजेयोऽहं सुरैः सर्वैर्यक्षराक्षसदानवैः ॥ त्वया जितोऽहं देवेश देवस्त्वमसि निश्चितम् ॥ ४६ ॥

    jāmbavānuvāca || ajeyo'haṃ suraiḥ sarvairyakṣarākṣasadānavaiḥ || tvayā jito'haṃ deveśa devastvamasi niścitam || 46 ||

    [46] जाम्बवान बोले: "मुझे देवता, यक्ष, राक्षस, दानव — कोई नहीं जीत सकता; हे देवेश, आपने मुझे जीत लिया, निश्चित ही आप भगवान हैं।

  50. जाने त्वां वैष्णवं तेजो नान्यथा बलमीदृशम् ॥ इति प्रसाद्य देवेशं ददौ माणिक्यमुत्तमम् ॥ ४७ ॥

    jāne tvāṃ vaiṣṇavaṃ tejo nānyathā balamīdṛśam || iti prasādya deveśaṃ dadau māṇikyamuttamam || 47 ||

    [47] मैं जानता हूँ कि आप विष्णु का तेज हैं, नहीं तो ऐसा बल हो ही नहीं सकता।" ऐसा कहकर देवेश को प्रसन्न करके उत्तम मणि उन्हें दे दी,

  51. सुतां जाम्बवतीं नाम भार्यार्थं वरवर्णिनीम् ॥ पाणिं वै ग्राहयामास देवदेवं च जाम्बवान् ॥ ४८ ॥

    sutāṃ jāmbavatīṃ nāma bhāryārthaṃ varavarṇinīm || pāṇiṃ vai grāhayāmāsa devadevaṃ ca jāmbavān || 48 ||

    [48] और अपनी सुंदर बेटी जाम्बवती का पत्नी रूप में हाथ भगवान के हाथ में दे दिया।

  52. मणिमादाय देवोऽपि जाम्बवत्यापि संयुतः ॥ तद्वृत्तान्तं समाचष्टे द्वारकावासिनां स्वयम् ॥ ४९ ॥

    maṇimādāya devo'pi jāmbavatyāpi saṃyutaḥ || tadvṛttāntaṃ samācaṣṭe dvārakāvāsināṃ svayam || 49 ||

    [49] मणि और जाम्बवती को साथ लेकर भगवान लौटे, और द्वारकावासियों को स्वयं सारी घटना बताई।

  53. सत्राजितस्य माणिक्यं दत्तवान्संसदि स्थितः ॥ मिथ्यापवादसंशुद्धिं प्राप्तवान्मधुसूदनः ॥ ५० ॥

    satrājitasya māṇikyaṃ dattavānsaṃsadi sthitaḥ || mithyāpavādasaṃśuddhiṃ prāptavānmadhusūdanaḥ || 50 ||

    [50] सभा में बैठकर वह मणि सत्राजित को लौटा दी; इस तरह मधुसूदन झूठे कलंक से शुद्ध हो गए।

  54. सत्राजितोऽपि संत्रस्तः कृष्णाय प्रददौ सुताम् ॥ सत्यभामां महाबुद्धिस्तदा सर्वगुणान्विताम् ॥ ५१ ॥

    satrājito'pi saṃtrastaḥ kṛṣṇāya pradadau sutām || satyabhāmāṃ mahābuddhistadā sarvaguṇānvitām || 51 ||

    [51] सत्राजित ने भी डर और पछतावे में, सब गुणों वाली अपनी बेटी सत्यभामा का विवाह कृष्ण से कर दिया।

  55. शतधन्वाक्रूरमुखा यादवा दुष्टमानसाः ॥ सत्राजितेन ते वैरं चक्रू रत्नाभिलाषिणः ॥ ५२ ॥

    śatadhanvākrūramukhā yādavā duṣṭamānasāḥ || satrājitena te vairaṃ cakrū ratnābhilāṣiṇaḥ || 52 ||

    [52] शतधन्वा, अक्रूर आदि कुछ बुरी नीयत वाले यादव उस रत्न के लोभ में सत्राजित से बैर करने लगे।

  56. दुरात्मा शतधन्वापि गते कृष्णे च कुत्रचित् ॥ सत्राजितं निहत्याशु मणिं जग्राह पापधीः ॥ ५३ ॥

    durātmā śatadhanvāpi gate kṛṣṇe ca kutracit || satrājitaṃ nihatyāśu maṇiṃ jagrāha pāpadhīḥ || 53 ||

    [53] एक बार जब कृष्ण कहीं बाहर गए थे, दुष्ट पापी शतधन्वा ने सत्राजित को मारकर मणि छीन ली।

  57. कृष्णस्य पुरतः सत्या समाचष्टे विचेष्टितम् ॥ अन्तर्हृष्टो बहिःकोपी कृष्णः कपटनायकः ॥ ५४ ॥

    kṛṣṇasya purataḥ satyā samācaṣṭe viceṣṭitam || antarhṛṣṭo bahiḥkopī kṛṣṇaḥ kapaṭanāyakaḥ || 54 ||

    [54] सत्यभामा ने कृष्ण के सामने सारी करतूत बताई। भीतर से (लीला में) प्रसन्न पर बाहर से क्रोध दिखाते कृष्ण —

  58. बलदेवपुरो वाक्यमुवाच धरणीधरः ॥ हत्वा सत्राजितं दुष्टो मणिमादाय गच्छति ॥ ५५ ॥

    baladevapuro vākyamuvāca dharaṇīdharaḥ || hatvā satrājitaṃ duṣṭo maṇimādāya gacchati || 55 ||

    [55] धरती को धारण करने वाले बलदेव के सामने बोले: "दुष्ट (शतधन्वा) सत्राजित को मारकर मणि लेकर भाग रहा है।

  59. निहत्य शतधन्वानं गृह्णीमो रत्नमावयोः ॥ मम भोग्यं च तद्रत्नं भविष्यति सुनिश्चितम् ॥ ५६ ॥

    nihatya śatadhanvānaṃ gṛhṇīmo ratnamāvayoḥ || mama bhogyaṃ ca tadratnaṃ bhaviṣyati suniścitam || 56 ||

    [56] शतधन्वा को मारकर हम दोनों रत्न ले लें; वह रत्न निश्चित ही मेरे काम आएगा।"

    टिप्पणी: पंक्ति के आरंभ का अक्षर स्कैन में अस्पष्ट; ‘मम भोग्यं’ पढ़ा गया — पंडित जी जाँचें।

  60. एतच्छ्रुत्वा भयत्रस्तः शतधन्वापि यादवः ॥ आहूयाक्रूरनामानं माणिक्यं प्रददौ च सः ॥ ५७ ॥

    etacchrutvā bhayatrastaḥ śatadhanvāpi yādavaḥ || āhūyākrūranāmānaṃ māṇikyaṃ pradadau ca saḥ || 57 ||

    [57] यह सुनकर डरा हुआ यादव शतधन्वा अक्रूर को बुलाकर वह मणि उसे सौंप गया,

  61. आरुह्य वडवां वेगान्निर्गतो दक्षिणां दिशम् ॥ रथस्थावनुगच्छेतां तदा रामजनार्दनौ ॥ ५८ ॥

    āruhya vaḍavāṃ vegānnirgato dakṣiṇāṃ diśam || rathasthāvanugacchetāṃ tadā rāmajanārdanau || 58 ||

    [58] और घोड़ी पर चढ़कर तेज़ी से दक्षिण दिशा में भाग गया; तब रथ पर सवार बलराम और कृष्ण उसके पीछे गए।

  62. शतयोजनमात्रेण ममार वडवा तदा ॥ पलायमानो निहतः पदातिस्तु पदातिना ॥ ५९ ॥

    śatayojanamātreṇa mamāra vaḍavā tadā || palāyamāno nihataḥ padātistu padātinā || 59 ||

    [59] सौ योजन जाने पर घोड़ी मर गई; पैदल भागते शतधन्वा को पैदल कृष्ण ने मार डाला।

  63. रथस्थे बलदेवे तु हरिणा रत्नलोभतः ॥ न दृष्टं तत्र तद्रत्नं बलदेवपुरोऽवदत् ॥ ६० ॥

    rathasthe baladeve tu hariṇā ratnalobhataḥ || na dṛṣṭaṃ tatra tadratnaṃ baladevapuro'vadat || 60 ||

    [60] बलदेव रथ पर ही थे; कृष्ण ने (शतधन्वा के पास) रत्न ढूँढा पर नहीं मिला, और बलदेव से यही कहा।

  64. तदाकर्ण्य महारोषादुवाच वचनं बली ॥ कपटी त्वं सदा कृष्ण लोभी पापी सुनिश्चितम् ॥ ६१ ॥

    tadākarṇya mahāroṣāduvāca vacanaṃ balī || kapaṭī tvaṃ sadā kṛṣṇa lobhī pāpī suniścitam || 61 ||

    [61] यह सुनकर बलदेव बहुत क्रोध में बोले: "कृष्ण, तुम सदा कपटी हो — निश्चित ही लोभी और पापी हो।

  65. अर्थाय स्वजनं हंसि कस्त्वां बन्धुः समाश्रयेत् ॥ अनेकशपथैः कृष्णो बलदेवं प्रसादयत् ॥ ६२ ॥

    arthāya svajanaṃ haṃsi kastvāṃ bandhuḥ samāśrayet || anekaśapathaiḥ kṛṣṇo baladevaṃ prasādayat || 62 ||

    [62] धन के लिए अपनों को मारते हो; तुम पर कौन भाई भरोसा करे?" कृष्ण ने बहुत सी शपथें खाकर बलदेव को मनाना चाहा।

  66. सोऽपि धिक्कष्टमित्युक्त्वा ययौ वैदर्भमण्डलम् ॥ कृष्णोऽपि रथमारुह्य द्वारकां प्रययौ पुनः ॥ ६३ ॥

    so'pi dhikkaṣṭamityuktvā yayau vaidarbhamaṇḍalam || kṛṣṇo'pi rathamāruhya dvārakāṃ prayayau punaḥ || 63 ||

    [63] पर वे भी "धिक्कार है!" कहकर विदर्भ देश चले गए; कृष्ण रथ पर चढ़कर फिर द्वारका लौट आए।

  67. तथैवोचुर्जनाः सर्वे न साधीयानयं हरिः ॥ निष्कासितो रत्नलोभाज्ज्येष्ठो भ्राता बलो बली ॥ ६४ ॥

    tathaivocurjanāḥ sarve na sādhīyānayaṃ hariḥ || niṣkāsito ratnalobhājjyeṣṭho bhrātā balo balī || 64 ||

    [64] सब लोग फिर वैसे ही कहने लगे: "यह हरि भला नहीं है; रत्न के लोभ में बड़े भाई बलवान बलराम को भी निकाल दिया।"

  68. तच्छ्रुत्वा दीनवदनः पापीयानिव संस्थितः ॥ वृथाभिशापात्संतप्तो बभूव स जगत्पतिः ॥ ६५ ॥

    tacchrutvā dīnavadanaḥ pāpīyāniva saṃsthitaḥ || vṛthābhiśāpātsaṃtapto babhūva sa jagatpatiḥ || 65 ||

    [65] यह सुनकर जगत के स्वामी कृष्ण उदास मुख से, मानो कोई पापी हों, ऐसे बैठे रहे; झूठे कलंक से बहुत दुखी हुए।

  69. अक्रूरोऽपि विनिष्क्रम्य तीर्थयात्रानिमित्ततः ॥ काशीं गत्वा सुखेनासौ यजन्यज्ञपतिं प्रभुम् ॥ ६६ ॥

    akrūro'pi viniṣkramya tīrthayātrānimittataḥ || kāśīṃ gatvā sukhenāsau yajanyajñapatiṃ prabhum || 66 ||

    [66] उधर अक्रूर भी तीर्थयात्रा के बहाने निकलकर काशी गया, और वहाँ आराम से यज्ञों के स्वामी प्रभु का यज्ञ करने लगा।

  70. तोषमुत्पादयामास तेन द्रव्येण बुद्धिमान् ॥ सुरालयगृहैश्चित्रैर्नगरं समकल्पयत् ॥ ६७ ॥

    toṣamutpādayāmāsa tena dravyeṇa buddhimān || surālayagṛhaiścitrairnagaraṃ samakalpayat || 67 ||

    [67] उस (मणि के) धन से उस बुद्धिमान ने (देवताओं को) संतुष्ट किया, और मंदिरों व सुंदर भवनों से एक नगर बसा दिया।

  71. न दुर्भिक्षं न वै रोगा ईतयो न च विड्वरम् ॥ शुचिना धार्यते यत्र मणिः सूर्यस्य निश्चितम् ॥ ६८ ॥

    na durbhikṣaṃ na vai rogā ītayo na ca viḍvaram || śucinā dhāryate yatra maṇiḥ sūryasya niścitam || 68 ||

    [68] जहाँ सूर्य की वह मणि पवित्रता से धारण की जाती है, वहाँ न अकाल पड़ता है, न रोग, न (टिड्डी आदि) आपदाएँ, न उपद्रव।

  72. जानन्नपि हि तत्सर्वं मानुषं भावमाश्रितः ॥ लोकाचारं तथा मायामज्ञानं च समाश्रितः ॥ ६९ ॥

    jānannapi hi tatsarvaṃ mānuṣaṃ bhāvamāśritaḥ || lokācāraṃ tathā māyāmajñānaṃ ca samāśritaḥ || 69 ||

    [69] (कृष्ण) यह सब जानते हुए भी मनुष्य-भाव में रहे — संसार की रीति, माया और अनजानेपन का भाव ओढ़े हुए।

  73. बन्धुवैरं समुत्पन्नं लाञ्छनं समुपस्थितम् ॥ वृथापवादबहुलं जायमानं कथं सहे ॥ ७० ॥

    bandhuvairaṃ samutpannaṃ lāñchanaṃ samupasthitam || vṛthāpavādabahulaṃ jāyamānaṃ kathaṃ sahe || 70 ||

    [70] (वे सोचने लगे:) "भाइयों से बैर हो गया, कलंक लग गया; बढ़ते हुए इस झूठे अपवाद को मैं कैसे सहूँ?"

  74. इति चिन्तातुरं कृष्णं नारदः समुपस्थितः ॥ गृहीत्वा तत्कृतां पूजां सुखासीनस्ततोऽब्रवीत् ॥ ७१ ॥

    iti cintāturaṃ kṛṣṇaṃ nāradaḥ samupasthitaḥ || gṛhītvā tatkṛtāṃ pūjāṃ sukhāsīnastato'bravīt || 71 ||

    [71] ऐसे चिंतित कृष्ण के पास नारद जी आए; उनकी की हुई पूजा स्वीकार करके, आराम से बैठकर बोले —

  75. नारद उवाच ॥ किमर्थं खिद्यसे देव किं वा ते शोककारणम् ॥ यथावृत्तं समाचष्टे नारदाय च केशवः ॥ ७२ ॥

    nārada uvāca || kimarthaṃ khidyase deva kiṃ vā te śokakāraṇam || yathāvṛttaṃ samācaṣṭe nāradāya ca keśavaḥ || 72 ||

    [72] नारद बोले: "हे देव, आप क्यों दुखी हैं? आपके शोक का कारण क्या है?" केशव ने नारद को सारी घटना ज्यों की त्यों बताई।

  76. नारद उवाच ॥ जानामि कारणं देव यदर्थं लाञ्छनं तव ॥ त्वया भाद्रपदे शुक्लचतुर्थ्यां चन्द्रदर्शनम् ॥ ७३ ॥

    nārada uvāca || jānāmi kāraṇaṃ deva yadarthaṃ lāñchanaṃ tava || tvayā bhādrapade śuklacaturthyāṃ candradarśanam || 73 ||

    [73] नारद बोले: "हे देव, आपके कलंक का कारण मैं जानता हूँ — आपने भादों शुक्ल चतुर्थी को चंद्रमा देखा था;

  77. कृतं तेन समुत्पन्नं लाञ्छनं तु वृथैव हि ॥ श्रीकृष्ण उवाच ॥ वद नारद मे शीघ्रं को दोषश्चन्द्रदर्शने ॥ ७४ ॥

    kṛtaṃ tena samutpannaṃ lāñchanaṃ tu vṛthaiva hi || śrīkṛṣṇa uvāca || vada nārada me śīghraṃ ko doṣaścandradarśane || 74 ||

    [74] इसी से यह बिना बात का कलंक लगा है।" श्रीकृष्ण बोले: "हे नारद, जल्दी बताइए — चंद्र-दर्शन में क्या दोष है?

  78. किमर्थं तु द्वितीयायां तस्य कुर्वन्ति दर्शनम् ॥ नारद उवाच ॥ गणनाथेन संशप्तश्चन्द्रमा रूपगर्वितः ॥ ७५ ॥

    kimarthaṃ tu dvitīyāyāṃ tasya kurvanti darśanam || nārada uvāca || gaṇanāthena saṃśaptaścandramā rūpagarvitaḥ || 75 ||

    [75] और लोग (उसके बजाय) द्वितीया को चंद्रमा का दर्शन क्यों करते हैं?" नारद बोले: "अपने रूप पर घमंड करने वाले चंद्रमा को गणेश जी ने शाप दिया था —

  79. त्वद्दर्शनेन नराणां हि वृथा निन्दा भविष्यति ॥ श्रीकृष्ण उवाच ॥ किमर्थं गणनाथेन शप्तश्चन्द्रः सुधामयः ॥ ७६ ॥

    tvaddarśanena narāṇāṃ hi vṛthā nindā bhaviṣyati || śrīkṛṣṇa uvāca || kimarthaṃ gaṇanāthena śaptaścandraḥ sudhāmayaḥ || 76 ||

    [76] कि तुम्हें देखने से मनुष्यों की झूठी निंदा होगी।" श्रीकृष्ण बोले: "अमृत से भरे चंद्रमा को गणेश जी ने शाप क्यों दिया?

  80. इदमाख्यानकं श्रेष्ठं यथावद्वक्तुमर्हसि ॥ नारद उवाच ॥ गणानामाधिपत्ये च रुद्रेण विहितः पुरा ॥ ७७ ॥

    idamākhyānakaṃ śreṣṭhaṃ yathāvadvaktumarhasi || nārada uvāca || gaṇānāmādhipatye ca rudreṇa vihitaḥ purā || 77 ||

    [77] यह श्रेष्ठ कथा ठीक-ठीक बताइए।" नारद बोले: "पहले रुद्र (शिव) ने गणेश जी को गणों का स्वामी बनाया था।

  81. अणिमा महिमा चैव लघिमा गरिमा तथा ॥ प्राप्तिः प्राकाम्यमीशित्वं वशित्वं चाष्टसिद्धयः ॥ ७८ ॥

    aṇimā mahimā caiva laghimā garimā tathā || prāptiḥ prākāmyamīśitvaṃ vaśitvaṃ cāṣṭasiddhayaḥ || 78 ||

    [78] अणिमा, महिमा, लघिमा, गरिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व — ये आठ सिद्धियाँ —

  82. भार्यार्थं प्रददौ देवो गणेशस्य प्रजापतिः ॥ पूजयित्वा गणाध्यक्षं स्तुतिं कर्तुं प्रचक्रमे ॥ ७९ ॥

    bhāryārthaṃ pradadau devo gaṇeśasya prajāpatiḥ || pūjayitvā gaṇādhyakṣaṃ stutiṃ kartuṃ pracakrame || 79 ||

    [79] प्रजापति ब्रह्मा जी ने गणेश जी को पत्नी रूप में दीं; और गणाध्यक्ष की पूजा करके उनकी स्तुति करने लगे।

  83. ब्रह्मोवाच ॥ गजवक्त्र गणाध्यक्ष लम्बोदर वरप्रद ॥ विघ्नाधीश्वर देवेश सृष्टिसंहारकारक ॥ ८० ॥

    brahmovāca || gajavaktra gaṇādhyakṣa lambodara varaprada || vighnādhīśvara deveśa sṛṣṭisaṃhārakāraka || 80 ||

    [80] ब्रह्मा जी बोले: "हे गजमुख, हे गणाध्यक्ष, हे लंबोदर, हे वर देने वाले, हे विघ्नों के स्वामी, हे देवेश, हे सृष्टि और संहार कराने वाले!

  84. यः पूजयेद्गणाध्यक्षं मोदकाद्यैः प्रयत्नतः ॥ तस्य प्रजायते सिद्धिर्निर्विघ्नेन न संशयः ॥ ८१ ॥

    yaḥ pūjayedgaṇādhyakṣaṃ modakādyaiḥ prayatnataḥ || tasya prajāyate siddhirnirvighnena na saṃśayaḥ || 81 ||

    [81] जो मोदक आदि से ध्यानपूर्वक गणाध्यक्ष की पूजा करता है, उसे निस्संदेह बिना विघ्न के सिद्धि मिलती है।

  85. असंपूज्य गणाध्यक्षं ये वाञ्छन्ति सुरासुराः ॥ न तेषां जायते सिद्धिः कल्पकोटिशतैरपि ॥ ८२ ॥

    asaṃpūjya gaṇādhyakṣaṃ ye vāñchanti surāsurāḥ || na teṣāṃ jāyate siddhiḥ kalpakoṭiśatairapi || 82 ||

    [82] जो देवता या असुर गणेश जी की पूजा किए बिना कुछ चाहते हैं, उन्हें करोड़ों कल्पों में भी सिद्धि नहीं मिलती।

  86. त्वद्भक्त्या तु गणाध्यक्ष विष्णुः पालयते सदा ॥ रुद्रोऽपि संहरत्याशु त्वद्भक्त्यैव करोम्यहम् ॥ ८३ ॥

    tvadbhaktyā tu gaṇādhyakṣa viṣṇuḥ pālayate sadā || rudro'pi saṃharatyāśu tvadbhaktyaiva karomyaham || 83 ||

    [83] हे गणाध्यक्ष, आपकी भक्ति से ही विष्णु सदा पालन करते हैं, रुद्र संहार करते हैं, और मैं भी आपकी भक्ति से ही (सृष्टि) करता हूँ।"

  87. इत्थं संस्तूयमानोऽसौ देवदेवो गजाननः ॥ उवाच परमप्रीतो ब्रह्माणं जगतां पतिम् ॥ ८४ ॥

    itthaṃ saṃstūyamāno'sau devadevo gajānanaḥ || uvāca paramaprīto brahmāṇaṃ jagatāṃ patim || 84 ||

    [84] ऐसी स्तुति सुनकर देवों के देव गजानन बहुत प्रसन्न होकर जगत के स्वामी ब्रह्मा जी से बोले —

  88. श्रीगणेश उवाच ॥ वरं ब्रूहि प्रदास्यामि यत्ते मनसि वर्तते ॥ ब्रह्मोवाच ॥ क्रियमाणस्य मे सृष्टिर्निर्विघ्नं जायतां प्रभो ॥ ८५ ॥

    śrīgaṇeśa uvāca || varaṃ brūhi pradāsyāmi yatte manasi vartate || brahmovāca || kriyamāṇasya me sṛṣṭirnirvighnaṃ jāyatāṃ prabho || 85 ||

    [85] श्री गणेश बोले: "जो मन में हो, वह वर माँगो, मैं दूँगा।" ब्रह्मा जी बोले: "हे प्रभु, मेरी रची जा रही सृष्टि बिना विघ्न के हो।"

  89. एवमस्त्विति देवोऽसौ गृहीत्वा मोदकान्करे ॥ सत्यलोकात्समागच्छत्स्वेच्छया गगने शनैः ॥ ८६ ॥

    evamastviti devo'sau gṛhītvā modakānkare || satyalokātsamāgacchatsvecchayā gagane śanaiḥ || 86 ||

    [86] "ऐसा ही हो" कहकर गणेश जी हाथ में मोदक लिए सत्यलोक से अपनी इच्छा से धीरे-धीरे आकाश मार्ग से चले।

  90. चन्द्रलोकं समासाद्य चलितो गणनायकः ॥ उपहासं तदा चक्रे सोमो रूपमदान्वितः ॥ ८७ ॥

    candralokaṃ samāsādya calito gaṇanāyakaḥ || upahāsaṃ tadā cakre somo rūpamadānvitaḥ || 87 ||

    [87] चंद्रलोक पहुँचकर जब गणनायक आगे बढ़े, तब रूप के मद में चूर चंद्रमा ने उनकी हँसी उड़ाई।

  91. तं दृष्ट्वा कोपताम्राक्षो गणनाथः शशाप ह ॥ दर्शनीयः सुरूपोऽहं सुन्दरश्चाहमित्यथ ॥ ८८ ॥

    taṃ dṛṣṭvā kopatāmrākṣo gaṇanāthaḥ śaśāpa ha || darśanīyaḥ surūpo'haṃ sundaraścāhamityatha || 88 ||

    [88] यह देखकर क्रोध से लाल आँखें करके गणनाथ ने शाप दिया — "मैं देखने योग्य, सुंदर, रूपवान हूँ" ऐसा सोचकर —

  92. गर्वितोऽसि शशाङ्क त्वं फलं प्राप्स्यसि सत्वरम् ॥ अद्यप्रभृति लोकास्त्वां न हि पश्यन्ति पापिनम् ॥ ८९ ॥

    garvito'si śaśāṅka tvaṃ phalaṃ prāpsyasi satvaram || adyaprabhṛti lokāstvāṃ na hi paśyanti pāpinam || 89 ||

    [89] "हे शशांक, तुम घमंड में हो; तुम्हें इसका फल जल्दी मिलेगा। आज से लोग तुम पापी को नहीं देखेंगे।

  93. ये पश्यन्ति प्रमादेन त्वां नरा मृगलाञ्छनम् ॥ मिथ्याभिशापसंयुक्ता भविष्यन्तीह ते ध्रुव ॥ ९० ॥

    ye paśyanti pramādena tvāṃ narā mṛgalāñchanam || mithyābhiśāpasaṃyuktā bhaviṣyantīha te dhruva || 90 ||

    [90] जो मनुष्य भूल से भी तुम मृग-चिह्न वाले चंद्रमा को देखेंगे, उन पर निश्चित ही झूठा कलंक लगेगा।"

  94. हाहाकारो महाञ्जातः श्रुत्वा शापं च भीषणम् ॥ अत्यन्तं म्लानवदनश्चन्द्रो जलमथाविशत् ॥ ९१ ॥

    hāhākāro mahāñjātaḥ śrutvā śāpaṃ ca bhīṣaṇam || atyantaṃ mlānavadanaścandro jalamathāviśat || 91 ||

    [91] वह भयंकर शाप सुनकर बड़ा हाहाकार मच गया; अत्यंत उदास मुख वाला चंद्रमा जल में जा छिपा।

  95. कुमुदं कौमुदीनाथः स्थितस्तत्र कृतालयः ॥ ततो देवर्षिगन्धर्वा निराशा दीनमानसाः ॥ ९२ ॥

    kumudaṃ kaumudīnāthaḥ sthitastatra kṛtālayaḥ || tato devarṣigandharvā nirāśā dīnamānasāḥ || 92 ||

    [92] चाँदनी के स्वामी चंद्रमा कुमुद (कमलिनी) में घर बनाकर रहने लगे। तब देवता, ऋषि और गंधर्व निराश और दुखी मन से —

  96. तुरासाहं पुरोधाय जग्मुस्ते तं पितामहम् ॥ देवं शशंसुश्चन्द्रस्य गणेशस्य च चेष्टितम् ॥ ९३ ॥

    turāsāhaṃ purodhāya jagmuste taṃ pitāmaham || devaṃ śaśaṃsuścandrasya gaṇeśasya ca ceṣṭitam || 93 ||

    [93] इंद्र को आगे करके पितामह ब्रह्मा जी के पास गए, और चंद्रमा व गणेश जी की सारी बात उन्हें बताई;

  97. दत्तः शापो गणेशेन कथयामासुरादरात् ॥ विचार्य भगवान्ब्रह्मा तान्सुरानिदमब्रवीत् ॥ ९४ ॥

    dattaḥ śāpo gaṇeśena kathayāmāsurādarāt || vicārya bhagavānbrahmā tānsurānidamabravīt || 94 ||

    [94] आदर से बताया कि गणेश जी ने शाप दे दिया है। विचार करके भगवान ब्रह्मा उन देवताओं से बोले —

  98. गणेशशापो देवेन्द्र शक्यते केन वान्यथा ॥ कर्तुं रुद्रेण न मया विष्णुना चापि निश्चितम् ॥ ९५ ॥

    gaṇeśaśāpo devendra śakyate kena vānyathā || kartuṃ rudreṇa na mayā viṣṇunā cāpi niścitam || 95 ||

    [95] "हे देवेंद्र, गणेश जी का शाप कौन बदल सकता है? रुद्र, मैं या विष्णु भी — कोई नहीं, यह निश्चित है।

  99. तमेव देवदेवेशं व्रजध्वं शरणं सुराः ॥ स एव शापमोक्षं च करिष्यति न संशयः ॥ ९६ ॥

    tameva devadeveśaṃ vrajadhvaṃ śaraṇaṃ surāḥ || sa eva śāpamokṣaṃ ca kariṣyati na saṃśayaḥ || 96 ||

    [96] हे देवताओ, उन्हीं देवों के देव (गणेश) की शरण में जाओ; वही शाप से छुटकारा देंगे, इसमें संदेह नहीं।"

  100. देवा ऊचुः ॥ केनोपायेन वरदो गजवक्त्रो गणेश्वरः ॥ पितामह महाप्राज्ञ तदस्माकं वद प्रभो ॥ ९७ ॥

    devā ūcuḥ || kenopāyena varado gajavaktro gaṇeśvaraḥ || pitāmaha mahāprājña tadasmākaṃ vada prabho || 97 ||

    [97] देवता बोले: "हे महाज्ञानी पितामह प्रभु, बताइए — किस उपाय से वरदायक गजमुख गणेश्वर प्रसन्न होंगे?"

  101. पितामह उवाच ॥ चतुर्थ्यां देवदेवोऽसौ पूजनीयः प्रयत्नतः ॥ कृष्णपक्षे विशेषेण नक्तं कुर्याच्च तद्व्रतम् ॥ ९८ ॥

    pitāmaha uvāca || caturthyāṃ devadevo'sau pūjanīyaḥ prayatnataḥ || kṛṣṇapakṣe viśeṣeṇa naktaṃ kuryācca tadvratam || 98 ||

    [98] पितामह बोले: "चतुर्थी को — विशेषकर कृष्ण पक्ष की — देवों के देव गणेश की ध्यान से पूजा करनी चाहिए, और नक्त व्रत (दिन भर व्रत, रात को एक बार भोजन) करना चाहिए।

  102. अपूपैर्घृतसंयुक्तैर्मोदकैः परितोषयेत् ॥ मधुरान्नं हविष्यं च स्वयं भुञ्जीत वाग्यतः ॥ ९९ ॥

    apūpairghṛtasaṃyuktairmodakaiḥ paritoṣayet || madhurānnaṃ haviṣyaṃ ca svayaṃ bhuñjīta vāgyataḥ || 99 ||

    [99] घी वाले पुए और मोदकों से उन्हें प्रसन्न करे; फिर स्वयं मौन रहकर मीठा, सात्त्विक (हविष्य) भोजन करे।

  103. स्वर्णरूपं गणेशस्य दातव्यं द्विजसत्तम ॥ शक्त्या च दक्षिणां दद्याद्वित्तशाठ्यं न कारयेत् ॥ १०० ॥

    svarṇarūpaṃ gaṇeśasya dātavyaṃ dvijasattama || śaktyā ca dakṣiṇāṃ dadyādvittaśāṭhyaṃ na kārayet || 100 ||

    [100] हे द्विजश्रेष्ठ, गणेश जी की सोने की मूर्ति दान करे; और शक्ति के अनुसार दक्षिणा दे — कंजूसी न करे।"

  104. एवं श्रुत्वा च तैः सर्वैर्गीष्पतिः प्रेषितस्तदा ॥ स गत्वा कथयामास चन्द्राय ब्रह्मणोदितम् ॥ १०१ ॥

    evaṃ śrutvā ca taiḥ sarvairgīṣpatiḥ preṣitastadā || sa gatvā kathayāmāsa candrāya brahmaṇoditam || 101 ||

    [101] यह सुनकर उन सबने बृहस्पति को भेजा; उन्होंने जाकर ब्रह्मा जी की कही बात चंद्रमा को बताई।

  105. व्रतं चक्रे ततश्चन्द्रो यथोक्तं ब्रह्मणा पुरा ॥ आविर्बभूव भगवान्गणेशो व्रततोषितः ॥ २ ॥

    vrataṃ cakre tataścandro yathoktaṃ brahmaṇā purā || āvirbabhūva bhagavāngaṇeśo vratatoṣitaḥ || 2 ||

    [102] तब चंद्रमा ने ब्रह्मा जी के बताए अनुसार व्रत किया; व्रत से प्रसन्न होकर भगवान गणेश प्रकट हुए।

    टिप्पणी: १०२ से आगे ग्रंथ में श्लोक-संख्या का केवल अंतिम अंक छपा है (जैसे ‘२’, ‘३’); हमने पूरी संख्या लिखी है।

  106. तं क्रीडमानं गणनायकं च तुष्टाव दृष्ट्वा तु कलानिधानः ॥ त्वं कारणं कारणकारणानां वेत्तासि वेद्यं च विभो प्रसीद ॥ ३ ॥

    taṃ krīḍamānaṃ gaṇanāyakaṃ ca tuṣṭāva dṛṣṭvā tu kalānidhānaḥ || tvaṃ kāraṇaṃ kāraṇakāraṇānāṃ vettāsi vedyaṃ ca vibho prasīda || 3 ||

    [103] उन खेलते हुए गणनायक को देखकर चंद्रमा ने स्तुति की: "हे विभु, आप कारणों के भी कारण हैं; आप ही जानने वाले और जानने योग्य हैं — प्रसन्न होइए।

  107. प्रसीद देवेश जगन्निवास गणेश लम्बोदर वक्रतुण्ड ॥ विरिञ्चिनारायणपूज्यमान क्षमस्व मे गर्वकृतं च हास्यम् ॥ ४ ॥

    prasīda deveśa jagannivāsa gaṇeśa lambodara vakratuṇḍa || viriñcinārāyaṇapūjyamāna kṣamasva me garvakṛtaṃ ca hāsyam || 4 ||

    [104] हे देवेश, हे जगत के निवास, हे गणेश, हे लंबोदर, हे वक्रतुंड, ब्रह्मा और नारायण भी आपको पूजते हैं — घमंड में की गई मेरी हँसी क्षमा कीजिए।

  108. ये त्वामसंपूज्य गणेश नूनं वाञ्छन्ति मूढाः स्वकृतार्थसिद्धिम् ॥ ते दैवनष्टा निभृतं च लोके ज्ञातो मया ते सकलः प्रभावः ॥ ५ ॥

    ye tvāmasaṃpūjya gaṇeśa nūnaṃ vāñchanti mūḍhāḥ svakṛtārthasiddhim || te daivanaṣṭā nibhṛtaṃ ca loke jñāto mayā te sakalaḥ prabhāvaḥ || 5 ||

    [105] हे गणेश, जो मूर्ख आपकी पूजा किए बिना अपने काम की सिद्धि चाहते हैं, वे संसार में भाग्यहीन होकर नष्ट होते हैं — आपका सारा प्रभाव मैंने जान लिया।

  109. ये चाप्युदासीनतरास्तु पापास्ते यान्ति वासं नरके सदैव ॥ हेरम्ब लम्बोदर मे क्षमस्व दुश्चेष्टितं तत्करुणासमुद्र ॥ ६ ॥

    ye cāpyudāsīnatarāstu pāpāste yānti vāsaṃ narake sadaiva || heramba lambodara me kṣamasva duśceṣṭitaṃ tatkaruṇāsamudra || 6 ||

    [106] और जो पापी (आपसे) मुँह फेरे रहते हैं, वे सदा नरक में रहते हैं। हे हेरम्ब, हे लंबोदर, हे करुणा के सागर, मेरी उस बुरी करनी को क्षमा कीजिए।"

  110. एवं संस्तूयमानोऽसौ चन्द्रेणाह गजाननः ॥ तुष्टोऽहं तव दास्यामि वरं ब्रूहि निशाकर ॥ ७ ॥

    evaṃ saṃstūyamāno'sau candreṇāha gajānanaḥ || tuṣṭo'haṃ tava dāsyāmi varaṃ brūhi niśākara || 7 ||

    [107] चंद्रमा की ऐसी स्तुति सुनकर गजानन बोले: "हे निशाकर (चंद्रमा), मैं प्रसन्न हूँ; वर माँगो, मैं दूँगा।"

  111. चन्द्र उवाच ॥ लोकानां दर्शनीयोऽहं भवामि पुनरेव हि ॥ विशापोऽहं भविष्यामि त्वत्प्रसादाद्गणेश्वर ॥ ८ ॥

    candra uvāca || lokānāṃ darśanīyo'haṃ bhavāmi punareva hi || viśāpo'haṃ bhaviṣyāmi tvatprasādādgaṇeśvara || 8 ||

    [108] चंद्रमा बोले: "हे गणेश्वर, आपकी कृपा से मैं फिर से लोगों के देखने योग्य हो जाऊँ, शाप से छूट जाऊँ।"

  112. गणेश उवाच ॥ वरमन्यं प्रदास्यामि नैतद्देयं मया तव ॥ ततो ब्रह्मादयः सर्वे समाजग्मुर्भयार्दिताः ॥ ९ ॥

    gaṇeśa uvāca || varamanyaṃ pradāsyāmi naitaddeyaṃ mayā tava || tato brahmādayaḥ sarve samājagmurbhayārditāḥ || 9 ||

    [109] गणेश बोले: "कोई और वर दूँगा, यह वर मैं तुम्हें नहीं दे सकता।" तब ब्रह्मा आदि सब देवता डरते हुए वहाँ आए —

  113. विशापं कुरु देवेश प्रार्थयामो वयं तव ॥ विशापमकरोच्चन्द्रं कमलासनगौरवात् ॥ ११० ॥

    viśāpaṃ kuru deveśa prārthayāmo vayaṃ tava || viśāpamakaroccandraṃ kamalāsanagauravāt || 110 ||

    [110] "हे देवेश, हम आपसे प्रार्थना करते हैं — चंद्रमा को शाप-मुक्त कीजिए।" तब कमलासन ब्रह्मा जी के सम्मान में गणेश जी ने चंद्रमा का शाप हटा दिया (पर एक शर्त रखी):

  114. भाद्रशुक्लचतुर्थ्यां तु ये पश्यन्ति सदैव हि ॥ मिथ्यापवादमावर्षं प्राप्स्यन्तीह न संशयः ॥ ११ ॥

    bhādraśuklacaturthyāṃ tu ye paśyanti sadaiva hi || mithyāpavādamāvarṣaṃ prāpsyantīha na saṃśayaḥ || 11 ||

    [111] "जो भादों शुक्ल चतुर्थी को चंद्रमा देखेंगे, उन्हें साल भर के भीतर झूठा कलंक लगेगा, इसमें संदेह नहीं।

  115. मासादौ पूर्वमेव त्वां ये पश्यन्ति सदा जनाः ॥ भद्रायां (द्वितीया) शुक्लपक्षस्य तेषां दोषो न जायते ॥ १२ ॥

    māsādau pūrvameva tvāṃ ye paśyanti sadā janāḥ || bhadrāyāṃ (dvitīyā) śuklapakṣasya teṣāṃ doṣo na jāyate || 12 ||

    [112] जो लोग महीने की शुरुआत में ही — शुक्ल पक्ष की भद्रा (द्वितीया) को — पहले तुम्हें देख लेते हैं, उन्हें दोष नहीं लगता।"

    टिप्पणी: ‘भद्रायां (द्वितीया)’ — कोष्ठक ग्रंथ में ही छपा है।

  116. तदाप्रभृति लोकोऽयं द्वितीयायां कृतादरः ॥ पुनरेव तु पप्रच्छ कलावान्गणनायकम् ॥ १३ ॥

    tadāprabhṛti loko'yaṃ dvitīyāyāṃ kṛtādaraḥ || punareva tu papraccha kalāvāngaṇanāyakam || 13 ||

    [113] तभी से लोग द्वितीया के चंद्रमा का आदर करते हैं। फिर चंद्रमा ने गणनायक से पूछा —

  117. केनोपायेन देवेश तुष्टो भवसि तद्वद ॥ गणेश उवाच ॥ यश्च कृष्णचतुर्थ्यां तु मोदकाद्यैः प्रपूज्य माम् ॥ १४ ॥

    kenopāyena deveśa tuṣṭo bhavasi tadvada || gaṇeśa uvāca || yaśca kṛṣṇacaturthyāṃ tu modakādyaiḥ prapūjya mām || 14 ||

    [114] "हे देवेश, आप किस उपाय से प्रसन्न होते हैं, वह बताइए।" गणेश बोले: "जो कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मोदक आदि से मेरी पूजा करके,

  118. रोहिण्या सहितं त्वां च समभ्यर्च्यार्घ्यदानतः ॥ यथाशक्त्या च मद्रूपं स्वर्णेन परिकल्पितम् ॥ १५ ॥

    rohiṇyā sahitaṃ tvāṃ ca samabhyarcyārghyadānataḥ || yathāśaktyā ca madrūpaṃ svarṇena parikalpitam || 15 ||

    [115] रोहिणी सहित तुम्हारी (चंद्रमा की) भी अर्घ्य देकर पूजा करे, और अपनी शक्ति के अनुसार सोने से बनी मेरी मूर्ति —

  119. दत्त्वा द्विजाय भुञ्जीयात्कथां श्रुत्वा विधानतः ॥ सदा तस्य करिष्यामि संकष्टस्य निवारणम् ॥ १६ ॥

    dattvā dvijāya bhuñjīyātkathāṃ śrutvā vidhānataḥ || sadā tasya kariṣyāmi saṃkaṣṭasya nivāraṇam || 16 ||

    [116] ब्राह्मण को दान देकर, विधि से कथा सुनकर भोजन करे — उसके संकट मैं सदा दूर करूँगा।

  120. भाद्रशुक्लचतुर्थ्यां तु मृण्मयी प्रतिमा शुभा ॥ हेमाभावे तु कर्तव्या नानापुष्पैः प्रपूज्य माम् ॥ १७ ॥

    bhādraśuklacaturthyāṃ tu mṛṇmayī pratimā śubhā || hemābhāve tu kartavyā nānāpuṣpaiḥ prapūjya mām || 17 ||

    [117] भादों शुक्ल चतुर्थी को सोना न हो तो मिट्टी की सुंदर मूर्ति बनाए, और तरह-तरह के फूलों से मेरी पूजा करे।

  121. ब्राह्मणान्भोजयेत्पश्चाज्जागरं च विशेषतः ॥ स्थापयेदव्रणं कुम्भं धान्यस्योपरि शोभितम् ॥ १८ ॥

    brāhmaṇānbhojayetpaścājjāgaraṃ ca viśeṣataḥ || sthāpayedavraṇaṃ kumbhaṃ dhānyasyopari śobhitam || 18 ||

    [118] फिर ब्राह्मणों को भोजन कराए, और विशेष रूप से रात्रि-जागरण करे; अनाज के ऊपर बिना दरार का सुंदर कलश स्थापित करे।

  122. यथाशक्त्या च मद्रूपं शातकुम्भेन निर्मितम् ॥ वस्त्रद्वयसमाच्छन्नं मोदकाद्यैः प्रपूज्य माम् ॥ १९ ॥

    yathāśaktyā ca madrūpaṃ śātakumbhena nirmitam || vastradvayasamācchannaṃ modakādyaiḥ prapūjya mām || 19 ||

    [119] अपनी शक्ति के अनुसार सोने से बनी मेरी मूर्ति, दो वस्त्रों से ढककर, मोदक आदि से मेरी पूजा करे।

  123. रक्ताम्बरधरो मर्त्यो ब्रह्मचर्यव्रतः शुचिः ॥ रोहिणीसहितं त्वां च पूजयेत्स्थाप्य मत्पुरः ॥ १२० ॥

    raktāmbaradharo martyo brahmacaryavrataḥ śuciḥ || rohiṇīsahitaṃ tvāṃ ca pūjayetsthāpya matpuraḥ || 120 ||

    [120] लाल वस्त्र पहने, ब्रह्मचर्य रखे और पवित्र रहे; और रोहिणी सहित तुम्हें (चंद्रमा को) मेरे सामने स्थापित करके पूजे।

  124. रजतस्य तु रूपं ते कृत्वा शक्त्या विनिर्मितम् ॥ वस्त्रं शिवप्रियायेति उपवस्त्रं गणाधिपे ॥ २१ ॥

    rajatasya tu rūpaṃ te kṛtvā śaktyā vinirmitam || vastraṃ śivapriyāyeti upavastraṃ gaṇādhipe || 21 ||

    [121] अपनी शक्ति के अनुसार तुम्हारी चाँदी की मूर्ति बनवाए। ‘शिवप्रिय’ नाम से वस्त्र और ‘गणाधिप’ नाम से उपवस्त्र चढ़ाए;

  125. गन्धं लम्बोदरायेति पुष्पं सिद्धिप्रदायके ॥ धूपं गजमुखायेति दीपं मूषकवाहने ॥ २२ ॥

    gandhaṃ lambodarāyeti puṣpaṃ siddhipradāyake || dhūpaṃ gajamukhāyeti dīpaṃ mūṣakavāhane || 22 ||

    [122] ‘लंबोदर’ नाम से चंदन, ‘सिद्धिप्रदायक’ नाम से फूल, ‘गजमुख’ नाम से धूप, ‘मूषकवाहन’ नाम से दीप;

  126. विघ्ननाथाय नैवेद्यं फलं सर्वार्थसिद्धिदे ॥ ताम्बूलं कामरूपाय दक्षिणां धनदाय च ॥ २३ ॥

    vighnanāthāya naivedyaṃ phalaṃ sarvārthasiddhide || tāmbūlaṃ kāmarūpāya dakṣiṇāṃ dhanadāya ca || 23 ||

    [123] ‘विघ्ननाथ’ नाम से नैवेद्य, ‘सर्वार्थसिद्धिद’ नाम से फल, ‘कामरूप’ नाम से पान और ‘धनद’ नाम से दक्षिणा अर्पित करे।

  127. इक्षुदण्डैर्मोदकैश्च होमं कुर्याच्च नामभिः ॥ विसर्जनं ततः कुर्यात्सर्वसिद्धिप्रदायकम् ॥ २४ ॥

    ikṣudaṇḍairmodakaiśca homaṃ kuryācca nāmabhiḥ || visarjanaṃ tataḥ kuryātsarvasiddhipradāyakam || 24 ||

    [124] गन्ने के टुकड़ों और मोदकों से (इन्हीं) नामों के साथ हवन करे; फिर सब सिद्धियाँ देने वाला विसर्जन करे।

  128. एवं संपूज्य विघ्नेशं कथां श्रुत्वा विधानतः ॥ मन्त्रेणानेन तत्सर्वं ब्राह्मणाय निवेदयेत् ॥ २५ ॥

    evaṃ saṃpūjya vighneśaṃ kathāṃ śrutvā vidhānataḥ || mantreṇānena tatsarvaṃ brāhmaṇāya nivedayet || 25 ||

    [125] इस प्रकार विघ्नेश की पूजा करके और विधि से कथा सुनकर, इस मंत्र के साथ सब कुछ ब्राह्मण को दान करे —

  129. दानेनानेन देवेश प्रीतो भव गणेश्वर ॥ सर्वत्र सर्वदा देव निर्विघ्नं कुरु सर्वदा ॥ २६ ॥

    dānenānena deveśa prīto bhava gaṇeśvara || sarvatra sarvadā deva nirvighnaṃ kuru sarvadā || 26 ||

    [126] "हे देवेश गणेश्वर, इस दान से प्रसन्न होइए; हे देव, सब जगह, सब समय मेरे काम बिना विघ्न के कीजिए।

  130. मानोन्नतिं च राज्यं च पुत्रपौत्रान्प्रदेहि मे ॥ गाश्च धान्यं च वासांसि दद्यात्सर्वस्वशक्तितः ॥ २७ ॥

    mānonnatiṃ ca rājyaṃ ca putrapautrānpradehi me || gāśca dhānyaṃ ca vāsāṃsi dadyātsarvasvaśaktitaḥ || 27 ||

    [127] मुझे मान-सम्मान, राज्य, पुत्र और पौत्र दीजिए।" फिर अपनी पूरी शक्ति के अनुसार गाय, अनाज और वस्त्र दान करे।

  131. दत्त्वा तु ब्राह्मणे सर्वं स्वयं भुञ्जीत वाग्यतः ॥ मोदकापूपमधुरं लवणक्षारवर्जितम् ॥ २८ ॥

    dattvā tu brāhmaṇe sarvaṃ svayaṃ bhuñjīta vāgyataḥ || modakāpūpamadhuraṃ lavaṇakṣāravarjitam || 28 ||

    [128] सब कुछ ब्राह्मण को देकर स्वयं मौन रहकर भोजन करे — मोदक, पुए और मीठा, बिना नमक और खार के।

  132. एवं करोति यश्चन्द्र तस्याहं सर्वदा जयम् ॥ सिद्धिं च धनधान्ये च ददामि विपुलां प्रजाम् ॥ २९ ॥

    evaṃ karoti yaścandra tasyāhaṃ sarvadā jayam || siddhiṃ ca dhanadhānye ca dadāmi vipulāṃ prajām || 29 ||

    [129] हे चंद्रमा, जो ऐसा करता है, उसे मैं सदा विजय, सिद्धि, धन-धान्य और बहुत सी संतान देता हूँ।"

  133. इत्युक्त्वान्तर्दधे देवो विघ्नराजो विनायकः ॥ तद्व्रतं कुरु कृष्ण त्वं ततः सिद्धिमवाप्स्यसि ॥ १३० ॥

    ityuktvāntardadhe devo vighnarājo vināyakaḥ || tadvrataṃ kuru kṛṣṇa tvaṃ tataḥ siddhimavāpsyasi || 130 ||

    [130] ऐसा कहकर विघ्नराज विनायक अंतर्धान हो गए। (नारद ने कहा:) "हे कृष्ण, आप भी यही व्रत कीजिए, तब आपको सफलता मिलेगी।"

  134. नारदेनैवमुक्तस्तु व्रतं चक्रे हरिः स्वयम् ॥ मिथ्यापवादं निर्मृज्य ततः कृष्णोऽभवच्छुचिः ॥ ३१ ॥

    nāradenaivamuktastu vrataṃ cakre hariḥ svayam || mithyāpavādaṃ nirmṛjya tataḥ kṛṣṇo'bhavacchuciḥ || 31 ||

    [131] नारद के ऐसा कहने पर हरि ने स्वयं यह व्रत किया; झूठे कलंक को धोकर कृष्ण फिर निर्मल (कलंक-मुक्त) हो गए।

  135. ये शृण्वन्ति तवाख्यानं स्यमन्तकमणीयकम् ॥ चन्द्रस्य चरितं सर्वं तेषां दोषो न जायते ॥ ३२ ॥

    ye śṛṇvanti tavākhyānaṃ syamantakamaṇīyakam || candrasya caritaṃ sarvaṃ teṣāṃ doṣo na jāyate || 32 ||

    [132] (नंदिकेश्वर ने कहा:) "जो आपकी यह स्यमंतक मणि की कथा और चंद्रमा का पूरा चरित्र सुनते हैं, उन्हें दोष नहीं लगता।

  136. भाद्रशुक्लचतुर्थ्यां तु कचिच्चन्द्रस्य दर्शनम् ॥ जातं तत्परिहारार्थं श्रोतव्यं सर्वमेव हि ॥ ३३ ॥

    bhādraśuklacaturthyāṃ tu kaciccandrasya darśanam || jātaṃ tatparihārārthaṃ śrotavyaṃ sarvameva hi || 33 ||

    [133] यदि भादों शुक्ल चतुर्थी को कभी चंद्र-दर्शन हो जाए, तो उसके निवारण के लिए यह पूरी कथा सुननी चाहिए।

    टिप्पणी: स्रोत में ‘कचिच्चन्द्रस्य’ छपा है; संभवतः ‘क्वचिच्चन्द्रस्य’ (कभी) — पंडित जी जाँचें।

  137. यदा यदा मनःकष्टं संदेह उपजायते ॥ तदा तदा च श्रोतव्यमाख्यानं कष्टनाशनम् ॥ एवमुक्त्वा गतो देवो गणेशः कृष्णतोषितः ॥ ३४ ॥

    yadā yadā manaḥkaṣṭaṃ saṃdeha upajāyate || tadā tadā ca śrotavyamākhyānaṃ kaṣṭanāśanam || evamuktvā gato devo gaṇeśaḥ kṛṣṇatoṣitaḥ || 34 ||

    [134] जब-जब मन में कष्ट या संदेह उठे, तब-तब कष्ट मिटाने वाली यह कथा सुननी चाहिए।" ऐसा कहकर कृष्ण से प्रसन्न हुए गणेश जी चले गए।

    टिप्पणी: ‘मनःकष्टं संदेह’ — दो पंक्तियों में बँटा शब्द, ऐसा पढ़ा गया।

  138. यदा यदा पश्यति कार्यमुत्थितं नारी नरश्चाथ करोति तद्व्रतम् ॥ सिध्यन्ति कार्याणि मनेप्सितानि किं दुर्लभं विघ्नहरे प्रसन्ने ॥ ३५ ॥

    yadā yadā paśyati kāryamutthitaṃ nārī naraścātha karoti tadvratam || sidhyanti kāryāṇi manepsitāni kiṃ durlabhaṃ vighnahare prasanne || 35 ||

    [135] स्त्री हो या पुरुष — जब-जब कोई काम सामने आए, तब यह व्रत करे; उसके मन चाहे काम सिद्ध होते हैं — विघ्नहर्ता प्रसन्न हों तो क्या दुर्लभ है?

  139. इति श्रीस्कन्दपुराणे नन्दिकेश्वरसनत्कुमारसंवादे स्यमन्तकोपाख्यानं संपूर्णम् ॥

    iti śrīskandapurāṇe nandikeśvarasanatkumārasaṃvāde syamantakopākhyānaṃ saṃpūrṇam ||

    [इति] (ग्रंथ के अनुसार) श्री स्कंद पुराण में नंदिकेश्वर-सनत्कुमार संवाद का स्यमंतक उपाख्यान यहाँ पूरा हुआ।