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एकादशी व्रत

Ekadashi Vrat

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Overview · परिचय

एकादशी हर महीने के दोनों पक्षों की ग्यारहवीं तिथि है, जो भगवान विष्णु को समर्पित है। इस दिन अन्न नहीं खाया जाता (शक्ति के अनुसार निर्जल, फलाहार या एक समय), विष्णु पूजा, कथा-श्रवण और रात्रि-जागरण किया जाता है; अगले दिन द्वादशी को दान देकर पारण (व्रत खोलना) होता है। हर एकादशी की अपनी कथा है — नीचे कुछ प्रमुख एकादशियों की कथाएँ अलग-अलग अध्याय के रूप में हैं।

Ekadashi vrata kathās in original Sanskrit, transcribed by us from the public-domain Vratarāja (1897) scan, with our own simple-Hindi meaning. Draft, needs pandit proofreading.

एकादशी व्रत कथाएँ — 5 प्रमुख एकादशियाँ (मूल संस्कृत, 52 + 40 + 87 + 43 + 55 श्लोक)

draft · needs pandit proofreading

व्रतराज (१८९७) के स्कैन से हमारे द्वारा पृष्ठ-चित्र देखकर श्लोक-दर-श्लोक लिखी गई। हर कथा का पुराण-स्रोत ग्रंथ की समाप्ति-पंक्ति (इति…) के अनुसार है; हमने पुराणों से मिलान नहीं किया। मूल की पाद-टिप्पणियाँ छोड़ दी गई हैं; शब्दों के बीच अंतराल हमारे हैं। पंडित जी से प्रूफ़ जाँच बाकी — draft। सरल हिंदी अर्थ हमारा अपना है।

निर्जला एकादशी कथा (ज्येष्ठ शुक्ल) — भीम-व्यास संवाद (53 श्लोक)

🔈 संस्कृत पाठ / Sanskrit chanting: audio coming soon / ऑडियो जल्द आएगा

  1. भीमसेन उवाच ॥ पितामह महाबुद्धे शृणु मे परमं वचः ॥ युधिष्ठिरश्च कुन्ती च तथा द्रुपदनन्दिनी ॥ १ ॥

    bhīmasena uvāca || pitāmaha mahābuddhe śṛṇu me paramaṃ vacaḥ || yudhiṣṭhiraśca kuntī ca tathā drupadanandinī || 1 ||

    [1] भीमसेन बोले — हे परम बुद्धिमान पितामह (व्यास जी), मेरी बात सुनिए। युधिष्ठिर, माता कुंती और द्रौपदी,

  2. अर्जुनो नकुलश्चैव सहदेवस्तथैव च ॥ एकादश्यां न भुञ्जन्ति कदाचिदपि सुव्रत ॥ २ ॥

    arjuno nakulaścaiva sahadevastathaiva ca || ekādaśyāṃ na bhuñjanti kadācidapi suvrata || 2 ||

    [2] अर्जुन, नकुल और सहदेव भी — हे उत्तम व्रत वाले — एकादशी के दिन कभी भोजन नहीं करते।

  3. ते मां ब्रुवन्ति वै नित्यं मा भुङ्क्ष्व त्वं वृकोदर ॥ अहं तान्ब्रुवं तात बुभुक्षा दुःसहा मम ॥ ३ ॥

    te māṃ bruvanti vai nityaṃ mā bhuṅkṣva tvaṃ vṛkodara || ahaṃ tānbruvaṃ tāta bubhukṣā duḥsahā mama || 3 ||

    [3] वे मुझसे रोज़ कहते हैं, “भीम, तुम भी (एकादशी को) मत खाओ।” मैं उनसे कहता हूँ, “तात, भूख मुझसे सही नहीं जाती।”

  4. दानं दास्यामि विधिवत्पूजयिष्यामि केशवम् ॥ विनोपवासं लभ्येत कथमेकादशीव्रतम् ॥ ४ ॥

    dānaṃ dāsyāmi vidhivatpūjayiṣyāmi keśavam || vinopavāsaṃ labhyeta kathamekādaśīvratam || 4 ||

    [4] “मैं विधि से दान दूँगा, केशव की पूजा करूँगा; पर बिना उपवास के एकादशी व्रत का फल कैसे मिले?”

  5. भीमसेनवचः श्रुत्वा व्यासो वचनमब्रवीत् ॥ व्यास उवाच ॥ यदि स्वर्गोऽत्यभीष्टस्ते नरकोऽनिष्ट एव च ॥ ५ ॥

    bhīmasenavacaḥ śrutvā vyāso vacanamabravīt || vyāsa uvāca || yadi svargo'tyabhīṣṭaste narako'niṣṭa eva ca || 5 ||

    [5] भीम की बात सुनकर व्यास जी बोले — यदि तुम्हें स्वर्ग बहुत प्रिय है और नरक अप्रिय है,

  6. एकादश्यां न भोक्तव्यं पक्षयोरुभयोरपि ॥ भीमसेन उवाच ॥ पितामह महाबुद्धे कथयामि तवाग्रतः ॥ ६ ॥

    ekādaśyāṃ na bhoktavyaṃ pakṣayorubhayorapi || bhīmasena uvāca || pitāmaha mahābuddhe kathayāmi tavāgrataḥ || 6 ||

    [6] तो दोनों पक्षों की एकादशी को भोजन नहीं करना चाहिए। भीम बोले — हे महाबुद्धिमान पितामह, मैं आपके सामने सच कहता हूँ:

  7. एकभक्तेन शक्तोऽहमुपवासः कुतो मुने ॥ वृको नामास्ति यो वह्निः स सदा जठरे मम ॥ ७ ॥

    ekabhaktena śakto'hamupavāsaḥ kuto mune || vṛko nāmāsti yo vahniḥ sa sadā jaṭhare mama || 7 ||

    [7] मैं दिन में एक बार भोजन करके तो रह सकता हूँ, पर हे मुनि, पूरा उपवास कैसे करूँ? मेरे पेट में ‘वृक’ नाम की अग्नि सदा जलती रहती है।

  8. अतीवान्नं यदाश्नामि तदा स समुपशाम्यति ॥ एकं शक्तोऽस्म्यहं कर्तुं चोपवासं महामुने ॥ ८ ॥

    atīvānnaṃ yadāśnāmi tadā sa samupaśāmyati || ekaṃ śakto'smyahaṃ kartuṃ copavāsaṃ mahāmune || 8 ||

    [8] जब मैं बहुत सारा अन्न खाता हूँ, तभी वह शांत होती है। हे महामुनि, मैं साल में केवल एक ही उपवास कर सकता हूँ।

  9. तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयात् ॥ व्यास उवाच ॥ श्रुतास्ते मानवा धर्मा वैदिकाश्च श्रुतास्त्वया ॥ ९ ॥

    tadekaṃ vada niścitya yena śreyo'hamāpnuyāt || vyāsa uvāca || śrutāste mānavā dharmā vaidikāśca śrutāstvayā || 9 ||

    [9] इसलिए ऐसा एक व्रत निश्चित करके बताइए जिससे मेरा कल्याण हो। व्यास जी बोले — तुमने मनुष्यों के और वेदों के धर्म सुने हैं,

  10. कलौ युगे न शक्यन्ते ते वै कर्तुं नराधिप ॥ सुखोपायं चाल्पधनमल्पक्लेशं महाफलम् ॥ १० ॥

    kalau yuge na śakyante te vai kartuṃ narādhipa || sukhopāyaṃ cālpadhanamalpakleśaṃ mahāphalam || 10 ||

    [10] पर हे राजन, कलियुग में वे सब करना संभव नहीं। (इसलिए) सरल उपाय, थोड़े धन और थोड़े कष्ट वाला, पर बड़े फल वाला —

  11. पुराणानां च सर्वेषां सारभूतं वदामि ते ॥ एकादश्यां न भुञ्जीत पक्षयोरुभयोरपि ॥ ११ ॥

    purāṇānāṃ ca sarveṣāṃ sārabhūtaṃ vadāmi te || ekādaśyāṃ na bhuñjīta pakṣayorubhayorapi || 11 ||

    [11] सब पुराणों का सार मैं तुम्हें बताता हूँ: दोनों पक्षों की एकादशी को भोजन न करो।

  12. एकादश्यां न भुङ्क्ते यो न याति नरकं तु सः ॥ व्यासस्य वचनं श्रुत्वा कम्पितोऽश्वत्थपत्रवत् ॥ १२ ॥

    ekādaśyāṃ na bhuṅkte yo na yāti narakaṃ tu saḥ || vyāsasya vacanaṃ śrutvā kampito'śvatthapatravat || 12 ||

    [12] जो एकादशी को भोजन नहीं करता, वह नरक नहीं जाता। व्यास जी की यह बात सुनकर भीम पीपल के पत्ते की तरह काँप उठे।

  13. भीमसेनो महाबाहुर्भीतो वाक्यमभाषत ॥ भीमसेन उवाच ॥ पितामह न शक्तोऽहमुपवासे करोमि किम् ॥ १३ ॥

    bhīmaseno mahābāhurbhīto vākyamabhāṣata || bhīmasena uvāca || pitāmaha na śakto'hamupavāse karomi kim || 13 ||

    [13] महाबाहु भीम डरकर बोले — पितामह, मैं (हर एकादशी) उपवास नहीं कर सकता, क्या करूँ?

  14. ततो बहुफलं ब्रूहि व्रतमेकं मम प्रभो ॥ व्यास उवाच ॥ वृषस्थे मिथुनस्थेऽर्के शुक्ला यैकादशी भवेत् ॥ १४ ॥

    tato bahuphalaṃ brūhi vratamekaṃ mama prabho || vyāsa uvāca || vṛṣasthe mithunasthe'rke śuklā yaikādaśī bhavet || 14 ||

    [14] हे प्रभु, तो मुझे बहुत फल देने वाला कोई एक व्रत बताइए। व्यास जी बोले — जब सूर्य वृष या मिथुन राशि में हों, उस समय जो शुक्ल एकादशी आती है,

  15. ज्येष्ठमासे प्रयत्नेन सोपोष्या जलवर्जिता ॥ स्नाने चाचमने चैव वर्जयित्वोदकं बुधः ॥ १५ ॥

    jyeṣṭhamāse prayatnena sopoṣyā jalavarjitā || snāne cācamane caiva varjayitvodakaṃ budhaḥ || 15 ||

    [15] ज्येष्ठ मास की उस एकादशी को यत्न से बिना जल के उपवास करना चाहिए। समझदार व्यक्ति स्नान और आचमन के जल को छोड़कर

  16. उपयुञ्जीत नैवान्यद्व्रतभङ्गोऽन्यथा भवेत् ॥ उदयादुदयं यावद्वर्जयित्वा जलं बुधः ॥ १६ ॥

    upayuñjīta naivānyadvratabhaṅgo'nyathā bhavet || udayādudayaṃ yāvadvarjayitvā jalaṃ budhaḥ || 16 ||

    [16] और कोई जल न ले, नहीं तो व्रत टूट जाता है। एक सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक जल छोड़कर

  17. अप्रयत्नादवाप्नोति द्वादशद्वादशीफलम् ॥ ततः प्रभाते विमले द्वादश्यां स्नानमाचरेत् ॥ १७ ॥

    aprayatnādavāpnoti dvādaśadvādaśīphalam || tataḥ prabhāte vimale dvādaśyāṃ snānamācaret || 17 ||

    [17] (रहने से) बिना अधिक परिश्रम के बारहों द्वादशियों (साल भर की एकादशियों) का फल मिल जाता है। फिर द्वादशी की निर्मल सुबह स्नान करे,

  18. जलं सुवर्णं दत्त्वा च द्विजातिभ्यो यथाविधि ॥ भुञ्जीत कृतकृत्यस्तु ब्राह्मणैः सहितो वशी ॥ १८ ॥

    jalaṃ suvarṇaṃ dattvā ca dvijātibhyo yathāvidhi || bhuñjīta kṛtakṛtyastu brāhmaṇaiḥ sahito vaśī || 18 ||

    [18] ब्राह्मणों को विधि से जल और सोना दान करे, और फिर संयम से ब्राह्मणों के साथ, कृतार्थ होकर भोजन करे।

  19. एवं कृते तु यत्पुण्यं भीमसेन शृणुष्व तत् ॥ संवत्सरस्य या मध्ये एकादश्यो भवन्ति वै ॥ १९ ॥

    evaṃ kṛte tu yatpuṇyaṃ bhīmasena śṛṇuṣva tat || saṃvatsarasya yā madhye ekādaśyo bhavanti vai || 19 ||

    [19] भीमसेन, ऐसा करने से जो पुण्य मिलता है, वह सुनो — साल भर में जितनी एकादशियाँ आती हैं,

  20. तासां फलमवाप्नोति अत्र मे नास्ति संशयः ॥ इति मां केशवः प्राह शङ्खचक्रगदाधरः ॥ २० ॥

    tāsāṃ phalamavāpnoti atra me nāsti saṃśayaḥ || iti māṃ keśavaḥ prāha śaṅkhacakragadādharaḥ || 20 ||

    [20] उन सबका फल मिल जाता है; इसमें मुझे कोई संदेह नहीं। शंख, चक्र, गदा धारण करने वाले केशव ने स्वयं मुझसे यही कहा है।

  21. एकादश्यां सिते पक्षे ज्येष्ठस्योदकवर्जितम् ॥ उपोष्य फलमाप्नोति तच्छृणुष्व वृकोदर ॥ २१ ॥

    ekādaśyāṃ site pakṣe jyeṣṭhasyodakavarjitam || upoṣya phalamāpnoti tacchṛṇuṣva vṛkodara || 21 ||

    [21] ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी को बिना जल का उपवास करके जो फल मिलता है, वृकोदर, वह सुनो —

  22. सर्वतीर्थेषु यत्पुण्यं सर्वदानेषु यत्फलम् ॥ तत्फलं समवाप्नोति इमां कृत्वा वृकोदर ॥ २२ ॥

    sarvatīrtheṣu yatpuṇyaṃ sarvadāneṣu yatphalam || tatphalaṃ samavāpnoti imāṃ kṛtvā vṛkodara || 22 ||

    [22] सब तीर्थों में जो पुण्य है और सब दानों में जो फल है, वृकोदर, वह फल इस एक व्रत को करके मिल जाता है।

  23. संवत्सरस्य यावन्त्यः शुक्लाः कृष्णा वृकोदर ॥ उपोषितास्ताः सर्वाः स्युरेकादश्यो न संशयः ॥ २३ ॥

    saṃvatsarasya yāvantyaḥ śuklāḥ kṛṣṇā vṛkodara || upoṣitāstāḥ sarvāḥ syurekādaśyo na saṃśayaḥ || 23 ||

    [23] वृकोदर, साल भर की जितनी शुक्ल और कृष्ण एकादशियाँ हैं, वे सब मानो उपवास कर ली गईं — इसमें संदेह नहीं।

  24. धनधान्यवहाः पुण्याः पुत्रारोग्यफलप्रदाः ॥ उपोषिता नरव्याघ्र इति सत्यं वदामि ते ॥ २४ ॥

    dhanadhānyavahāḥ puṇyāḥ putrārogyaphalapradāḥ || upoṣitā naravyāghra iti satyaṃ vadāmi te || 24 ||

    [24] हे नरश्रेष्ठ, यह व्रत धन-धान्य देने वाला, पुण्यदायक, और संतान व आरोग्य देने वाला है — यह मैं सच कहता हूँ।

  25. यमदूता महाकायाः करालाः कृष्णपिङ्गलाः ॥ दण्डपाशधरा रौद्रा मरणे दृष्टिगोचरम् ॥ २५ ॥

    yamadūtā mahākāyāḥ karālāḥ kṛṣṇapiṅgalāḥ || daṇḍapāśadharā raudrā maraṇe dṛṣṭigocaram || 25 ||

    [25] बड़े शरीर वाले, डरावने, काले-पीले, दंड और पाश लिए यमदूत मृत्यु के समय दिखाई देते हैं —

  26. न प्रयान्ति नरव्याघ्र एकादश्यामुपोषणात् ॥ पीताम्बरधराः सौम्याश्चक्रहस्ता मनोजवाः ॥ २६ ॥

    na prayānti naravyāghra ekādaśyāmupoṣaṇāt || pītāmbaradharāḥ saumyāścakrahastā manojavāḥ || 26 ||

    [26] पर एकादशी का उपवास करने वाले के पास वे नहीं आते। (उसके पास) पीतांबर पहने, सौम्य, हाथ में चक्र लिए, मन की गति वाले (विष्णु-दूत आते हैं),

  27. अन्तकाले नयन्त्येव मानवं वैष्णवीं पुरीम् ॥ तस्मात्सर्वप्रयत्नेन सोपोष्योदकवर्जिता ॥ २७ ॥

    antakāle nayantyeva mānavaṃ vaiṣṇavīṃ purīm || tasmātsarvaprayatnena sopoṣyodakavarjitā || 27 ||

    [27] जो अंत समय में उस मनुष्य को विष्णु लोक ले जाते हैं। इसलिए पूरे यत्न से यह एकादशी बिना जल के करनी चाहिए।

  28. जलधेनुं ततो दत्त्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ इति श्रुत्वा तदा चक्रुः पाण्डवा जनमेजय ॥ २८ ॥

    jaladhenuṃ tato dattvā sarvapāpaiḥ pramucyate || iti śrutvā tadā cakruḥ pāṇḍavā janamejaya || 28 ||

    [28] फिर जल-धेनु (जल से भरा घड़ा, गाय के रूप में) दान करने से मनुष्य सब पापों से छूट जाता है। हे जनमेजय, यह सुनकर पांडवों ने यह व्रत किया।

  29. ततः प्रभृति भीमेन कृतेयं निर्जला शुभा ॥ पाण्डवद्वादशीनाम्ना लोके ख्याता बभूव ह ॥ २९ ॥

    tataḥ prabhṛti bhīmena kṛteyaṃ nirjalā śubhā || pāṇḍavadvādaśīnāmnā loke khyātā babhūva ha || 29 ||

    [29] तब से भीम द्वारा की गई यह शुभ निर्जला एकादशी संसार में ‘पांडव द्वादशी’ के नाम से भी प्रसिद्ध हुई।

  30. तथा त्वमपि भूपाल सोपवासार्चनं हरेः ॥ कुरु त्वं च प्रयत्नेन सर्वपापप्रशान्तये ॥ ३० ॥

    tathā tvamapi bhūpāla sopavāsārcanaṃ hareḥ || kuru tvaṃ ca prayatnena sarvapāpapraśāntaye || 30 ||

    [30] (व्यास जी कहते हैं —) हे राजन, उसी तरह तुम भी सब पापों की शांति के लिए यत्न से हरि का पूजन और उपवास करो।

  31. करिष्याम्यद्य देवेश जलवर्जमुपोषणम् ॥ भोक्ष्येऽपरेऽह्नि देवेश ह्यन्नं च तव वासरात् ॥ ३१ ॥

    kariṣyāmyadya deveśa jalavarjamupoṣaṇam || bhokṣye'pare'hni deveśa hyannaṃ ca tava vāsarāt || 31 ||

    [31] (संकल्प मंत्र:) “हे देवेश, आज मैं बिना जल का उपवास करूँगा, और हे देवेश, आपके दिन के बाद अगले दिन भोजन करूँगा।”

  32. इत्युच्चार्य ततो मन्त्रमुपवासपरो भवेत् ॥ सर्वपापविनाशाय श्रद्धादमसमन्वितः ॥ ३२ ॥

    ityuccārya tato mantramupavāsaparo bhavet || sarvapāpavināśāya śraddhādamasamanvitaḥ || 32 ||

    [32] यह मंत्र बोलकर, सब पापों के नाश के लिए श्रद्धा और संयम के साथ उपवास करे।

  33. मेरुमन्दरमानं तु स्त्रियोऽथ पुरुषस्य यत् ॥ पापं तद्भस्मतां याति एकादश्याः प्रभावतः ॥ ३३ ॥

    merumandaramānaṃ tu striyo'tha puruṣasya yat || pāpaṃ tadbhasmatāṃ yāti ekādaśyāḥ prabhāvataḥ || 33 ||

    [33] स्त्री हो या पुरुष, मेरु और मंदर पर्वत जितना बड़ा पाप भी इस एकादशी के प्रभाव से भस्म हो जाता है।

  34. न शक्नोति च यो दातुं जलधेनुं नराधिप ॥ सकाञ्चनो घटस्तेन देयो वस्त्रेण संवृतः ॥ ३४ ॥

    na śaknoti ca yo dātuṃ jaladhenuṃ narādhipa || sakāñcano ghaṭastena deyo vastreṇa saṃvṛtaḥ || 34 ||

    [34] हे राजन, जो जल-धेनु दान न कर सके, वह कपड़े से ढका, सोने सहित एक घड़ा दान करे।

  35. तोयस्य नियमं योऽस्यां कुरुते वै स पुण्यभाक् ॥ पलकोटिसुवर्णस्य यामे यामेऽश्नुते फलम् ॥ ३५ ॥

    toyasya niyamaṃ yo'syāṃ kurute vai sa puṇyabhāk || palakoṭisuvarṇasya yāme yāme'śnute phalam || 35 ||

    [35] जो इस दिन जल का नियम रखता है, वह पुण्य का भागी होता है; उसे हर पहर करोड़ पल सोने के दान का फल मिलता है।

  36. स्नानं दानं जपं होमं यदस्यां कुरुते नरः ॥ तत्सर्वं चाक्षयं प्रोक्तमेतत्कृष्णस्य भाषितम् ॥ ३६ ॥

    snānaṃ dānaṃ japaṃ homaṃ yadasyāṃ kurute naraḥ || tatsarvaṃ cākṣayaṃ proktametatkṛṣṇasya bhāṣitam || 36 ||

    [36] इस दिन मनुष्य जो स्नान, दान, जप और होम करता है, वह सब अक्षय (कभी न घटने वाला) होता है — यह श्रीकृष्ण का वचन है।

  37. किं वा परेण धर्मेण निर्जलैकादशीं नृप ॥ उपोष्य च नरो भक्त्या वैष्णवं पदमाप्नुयात् ॥ ३७ ॥

    kiṃ vā pareṇa dharmeṇa nirjalaikādaśīṃ nṛpa || upoṣya ca naro bhaktyā vaiṣṇavaṃ padamāpnuyāt || 37 ||

    [37] हे राजन, और धर्मों की क्या ज़रूरत? भक्ति से निर्जला एकादशी का उपवास करके मनुष्य विष्णु-पद पा लेता है।

  38. सुवर्णमन्नं वासांसि यदस्यां संप्रदीयते ॥ तदस्य च कुरुश्रेष्ठ सर्वमप्यक्षयं भवेत् ॥ ३८ ॥

    suvarṇamannaṃ vāsāṃsi yadasyāṃ saṃpradīyate || tadasya ca kuruśreṣṭha sarvamapyakṣayaṃ bhavet || 38 ||

    [38] हे कुरुश्रेष्ठ, इस दिन जो सोना, अन्न और वस्त्र दान किया जाता है, वह सब अक्षय हो जाता है।

  39. एकादशीदिने योऽन्नं भुङ्क्ते पापं भुनक्ति सः ॥ इहलोके स चाण्डालो मृतः प्राप्नोति दुर्गतिम् ॥ ३९ ॥

    ekādaśīdine yo'nnaṃ bhuṅkte pāpaṃ bhunakti saḥ || ihaloke sa cāṇḍālo mṛtaḥ prāpnoti durgatim || 39 ||

    [39] जो एकादशी के दिन अन्न खाता है, वह (मानो) पाप खाता है; वह इस लोक में चांडाल-सा होता है और मरकर दुर्गति पाता है।

  40. ये प्रदास्यन्ति दानानि द्वादशीं समुपोष्य च ॥ ज्येष्ठमासि सिते पक्षे प्राप्स्यन्ति परमं पदम् ॥ ४० ॥

    ye pradāsyanti dānāni dvādaśīṃ samupoṣya ca || jyeṣṭhamāsi site pakṣe prāpsyanti paramaṃ padam || 40 ||

    [40] जो ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष में यह (एकादशी-)द्वादशी उपवास करके दान देंगे, वे परम पद पाएँगे।

  41. ब्रह्महा मद्यपः स्तेनो गुरुद्वेष्टा सदाऽनृती ॥ मुच्यन्ते पातकैः सर्वैर्निर्जला यैरुपोषिता ॥ ४१ ॥

    brahmahā madyapaḥ steno gurudveṣṭā sadā'nṛtī || mucyante pātakaiḥ sarvairnirjalā yairupoṣitā || 41 ||

    [41] ब्रह्म-हत्या करने वाला, शराबी, चोर, गुरु से द्वेष करने वाला और सदा झूठ बोलने वाला भी — जिसने निर्जला का उपवास किया, वह सब पापों से छूट जाता है।

  42. विशेषं शृणु राजेन्द्र निर्जलैकादशीदिने ॥ यत्कर्तव्यं नरैः स्त्रीभिः श्रद्धादमसमन्वितैः ॥ ४२ ॥

    viśeṣaṃ śṛṇu rājendra nirjalaikādaśīdine || yatkartavyaṃ naraiḥ strībhiḥ śraddhādamasamanvitaiḥ || 42 ||

    [42] हे राजेंद्र, निर्जला एकादशी के दिन श्रद्धा और संयम वाले स्त्री-पुरुषों को जो विशेष करना चाहिए, वह सुनो —

  43. जलशायी तु संपूज्यो देया धेनुश्च तन्मयी ॥ प्रत्यक्षा वा नृपश्रेष्ठ घृतधेनुरथापि वा ॥ ४३ ॥

    jalaśāyī tu saṃpūjyo deyā dhenuśca tanmayī || pratyakṣā vā nṛpaśreṣṭha ghṛtadhenurathāpi vā || 43 ||

    [43] जल में शयन करने वाले भगवान (विष्णु) की पूजा करें, और जल से बनी धेनु का दान करें; हे नृपश्रेष्ठ, या तो सचमुच की गाय, या घी की धेनु दें।

  44. दक्षिणाभिश्च श्रेष्ठाभिर्मृष्टान्नैश्च पृथग्विधैः ॥ तोषणीयाः प्रयत्नेन द्विजा धर्मभृतां वर ॥ ४४ ॥

    dakṣiṇābhiśca śreṣṭhābhirmṛṣṭānnaiśca pṛthagvidhaiḥ || toṣaṇīyāḥ prayatnena dvijā dharmabhṛtāṃ vara || 44 ||

    [44] हे धर्मात्माओं में श्रेष्ठ, अच्छी दक्षिणा और तरह-तरह के स्वादिष्ट भोजन से ब्राह्मणों को यत्न से संतुष्ट करें।

  45. तुष्टो भवति वै क्षिप्रं तैस्तुष्टैर्मोक्षदो हरिः ॥ आत्मद्रोहः कृतस्तैस्तु यैर्नैषा समुपोषिता ॥ ४५ ॥

    tuṣṭo bhavati vai kṣipraṃ taistuṣṭairmokṣado hariḥ || ātmadrohaḥ kṛtastaistu yairnaiṣā samupoṣitā || 45 ||

    [45] उनके संतुष्ट होने से मोक्ष देने वाले हरि जल्दी प्रसन्न होते हैं। जिन्होंने यह व्रत नहीं किया, उन्होंने अपने ही साथ द्रोह किया।

  46. पापात्मानो दुराचारा दुष्टास्ते नात्र संशयः ॥ कुलानां च शतं साग्रमनाचाररतं सदा ॥ ४६ ॥

    pāpātmāno durācārā duṣṭāste nātra saṃśayaḥ || kulānāṃ ca śataṃ sāgramanācārarataṃ sadā || 46 ||

    [46] (ग्रंथ के अनुसार) वे पापी, दुराचारी और दुष्ट हैं, इसमें संशय नहीं। (और) सदा आचारहीन रहे कुल की सौ से अधिक पीढ़ियों को भी —

  47. आत्मना सह तैर्नीतं वासुदेवस्य मन्दिरम् ॥ शान्तैर्दानपरैश्चैव अर्चद्भिश्च तथा हरिम् ॥ ४७ ॥

    ātmanā saha tairnītaṃ vāsudevasya mandiram || śāntairdānaparaiścaiva arcadbhiśca tathā harim || 47 ||

    [47] जिन्होंने यह व्रत किया, वे अपने साथ वासुदेव के धाम ले जाते हैं — (वे लोग जो) शांत, दान में लगे, हरि की पूजा करते हुए,

  48. कुर्वद्भिर्जागरं रात्रौ यैरेषा समुपोषिता ॥ अन्नं पानं तथा गावो वस्त्रं शय्यासनं शुभम् ॥ ४८ ॥

    kurvadbhirjāgaraṃ rātrau yaireṣā samupoṣitā || annaṃ pānaṃ tathā gāvo vastraṃ śayyāsanaṃ śubham || 48 ||

    [48] और रात में जागरण करते हुए यह व्रत करते हैं। अन्न, जल, गाय, वस्त्र, सुंदर शय्या और आसन,

  49. कमण्डलुस्तथा छत्रं दातव्यं निर्जलादिने ॥ उपानहौ च यो दद्यात्पात्रभूते द्विजोत्तमे ॥ ४९ ॥

    kamaṇḍalustathā chatraṃ dātavyaṃ nirjalādine || upānahau ca yo dadyātpātrabhūte dvijottame || 49 ||

    [49] कमंडल और छाता — ये निर्जला के दिन दान करने चाहिए। जो योग्य श्रेष्ठ ब्राह्मण को जूते (उपानह) दान करता है,

  50. स सौवर्णेन यानेन स्वर्गलोके व्रजेद्ध्रुवम् ॥ यश्चेमां शृणुयाद्भक्त्या यश्चापि परिकीर्तयेत् ॥ ५० ॥

    sa sauvarṇena yānena svargaloke vrajeddhruvam || yaścemāṃ śṛṇuyādbhaktyā yaścāpi parikīrtayet || 50 ||

    [50] वह निश्चय ही सोने के विमान से स्वर्ग जाता है। जो इस कथा को भक्ति से सुनता है और जो इसे सुनाता है,

  51. उभौ तौ स्वर्गतौ स्यातां नात्र कार्या विचारणा ॥ यत्फलं संनिहत्यायां राहुग्रस्ते दिवाकरे ॥ ५१ ॥

    ubhau tau svargatau syātāṃ nātra kāryā vicāraṇā || yatphalaṃ saṃnihatyāyāṃ rāhugraste divākare || 51 ||

    [51] वे दोनों स्वर्ग पाते हैं, इसमें विचार की बात ही नहीं। सूर्यग्रहण के समय (कुरुक्षेत्र के) संनिहत्या तीर्थ में

    टिप्पणी: मूल की पाद-टिप्पणी में ‘संनिहत्या’ के लिए ‘कुरुक्षेत्रे’ दिया है।

  52. कृत्वा श्राद्धं लभेन्मर्त्यस्तदस्याः श्रवणादपि ॥ एवं यः कुरुते पुण्यां द्वादशीं पापनाशिनीम् ॥ सर्वपापविनिर्मुक्तः पदं गच्छत्यनामयम् ॥ ५२ ॥

    kṛtvā śrāddhaṃ labhenmartyastadasyāḥ śravaṇādapi || evaṃ yaḥ kurute puṇyāṃ dvādaśīṃ pāpanāśinīm || sarvapāpavinirmuktaḥ padaṃ gacchatyanāmayam || 52 ||

    [52] श्राद्ध करने से जो फल मिलता है, वह इस कथा को सुनने से भी मिलता है। जो इस प्रकार पाप नाश करने वाली पवित्र द्वादशी (एकादशी) करता है, वह सब पापों से छूटकर दुःख-रहित परम पद पाता है।

  53. इति श्रीभारतपाद्मयोरुक्तं ज्येष्ठशुक्लनिर्जलैकादशीमाहात्म्यं संपूर्णम् ॥

    iti śrībhāratapādmayoruktaṃ jyeṣṭhaśuklanirjalaikādaśīmāhātmyaṃ saṃpūrṇam ||

    [इति] (ग्रंथ के अनुसार) महाभारत और पद्म पुराण में कहा गया ज्येष्ठ शुक्ल निर्जला एकादशी माहात्म्य यहाँ पूरा हुआ।

देवशयनी एकादशी कथा (आषाढ़ शुक्ल) (41 श्लोक)

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  1. युधिष्ठिर उवाच ॥ आषाढस्य सिते पक्षे किं नामैकादशी भवेत् ॥ को देवः को विधिस्तस्या एतदाख्याहि केशव ॥ १ ॥

    yudhiṣṭhira uvāca || āṣāḍhasya site pakṣe kiṃ nāmaikādaśī bhavet || ko devaḥ ko vidhistasyā etadākhyāhi keśava || 1 ||

    [1] युधिष्ठिर बोले — हे केशव, आषाढ़ के शुक्ल पक्ष की एकादशी का क्या नाम है? उसके देवता कौन हैं और उसकी विधि क्या है? यह बताइए।

  2. श्रीकृष्ण उवाच ॥ कथयामि महीपाल कथामाश्चर्यकारिणीम् ॥ कथयामास यां ब्रह्मा नारदाय महात्मने ॥ २ ॥

    śrīkṛṣṇa uvāca || kathayāmi mahīpāla kathāmāścaryakāriṇīm || kathayāmāsa yāṃ brahmā nāradāya mahātmane || 2 ||

    [2] श्रीकृष्ण बोले — हे राजन, मैं एक अद्भुत कथा सुनाता हूँ, जो ब्रह्मा जी ने महात्मा नारद जी को सुनाई थी।

  3. नारद उवाच ॥ कथयस्व प्रसादेन विष्णोराराधनाय मे ॥ आषाढशुक्लपक्षे तु किं नामैकादशी भवेत् ॥ ३ ॥

    nārada uvāca || kathayasva prasādena viṣṇorārādhanāya me || āṣāḍhaśuklapakṣe tu kiṃ nāmaikādaśī bhavet || 3 ||

    [3] नारद जी बोले — विष्णु की आराधना के लिए कृपा करके बताइए कि आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी का क्या नाम है?

  4. ब्रह्मोवाच ॥ वैष्णवोऽसि मुनिश्रेष्ठ साधु पृष्टं कलिप्रिय ॥ नातः परतरं लोके पवित्रं हरिवासरात् ॥ ४ ॥

    brahmovāca || vaiṣṇavo'si muniśreṣṭha sādhu pṛṣṭaṃ kalipriya || nātaḥ parataraṃ loke pavitraṃ harivāsarāt || 4 ||

    [4] ब्रह्मा जी बोले — हे मुनिश्रेष्ठ, तुम सच्चे वैष्णव हो; हे कलहप्रिय (नारद), तुमने बहुत अच्छा प्रश्न किया। संसार में हरि के दिन (एकादशी) से बढ़कर पवित्र कुछ नहीं।

  5. कर्तव्यं तु प्रयत्नेन सर्वपापापनुत्तये ॥ तस्मात्तेऽहं प्रवक्ष्यामि शुक्ल एकादशीव्रतम् ॥ ५ ॥

    kartavyaṃ tu prayatnena sarvapāpāpanuttaye || tasmātte'haṃ pravakṣyāmi śukla ekādaśīvratam || 5 ||

    [5] सब पापों को दूर करने के लिए इसे यत्न से करना चाहिए। इसलिए मैं तुम्हें शुक्ल एकादशी का व्रत बताता हूँ।

  6. एकादश्या व्रतं पुण्यं पापघ्नं सर्वकामदम् ॥ न कृतं यैर्नरैर्लोके ते नरा निरयैषिणः ॥ ६ ॥

    ekādaśyā vrataṃ puṇyaṃ pāpaghnaṃ sarvakāmadam || na kṛtaṃ yairnarairloke te narā nirayaiṣiṇaḥ || 6 ||

    [6] एकादशी का व्रत पुण्य देने वाला, पाप नाशक और सब इच्छाएँ पूरी करने वाला है। जिन लोगों ने यह व्रत नहीं किया, वे (मानो) नरक की ओर जा रहे हैं।

  7. पद्मा नामेति विख्याता शुचौ ह्येकादशी सिता ॥ हृषीकेशप्रीतये तु कर्तव्यं व्रतमुत्तमम् ॥ ७ ॥

    padmā nāmeti vikhyātā śucau hyekādaśī sitā || hṛṣīkeśaprītaye tu kartavyaṃ vratamuttamam || 7 ||

    [7] आषाढ़ (शुचि) मास की शुक्ल एकादशी ‘पद्मा’ नाम से प्रसिद्ध है। भगवान हृषीकेश (विष्णु) की प्रसन्नता के लिए यह उत्तम व्रत करना चाहिए।

    टिप्पणी: ग्रंथ में इस एकादशी का नाम ‘पद्मा’ है; कथा के ठीक बाद ग्रंथ कहता है “इयमेव शयन्याख्या” — यही देवशयनी (हरिशयनी) एकादशी है। उसके बाद का विष्णु-शयन/चातुर्मास्य विधि भाग यहाँ नहीं लिया गया।

  8. कथयामि तवाग्रेऽहं कथां पौराणिकीं शुभाम् ॥ यस्याः श्रवणमात्रेण महापापं प्रणश्यति ॥ ८ ॥

    kathayāmi tavāgre'haṃ kathāṃ paurāṇikīṃ śubhām || yasyāḥ śravaṇamātreṇa mahāpāpaṃ praṇaśyati || 8 ||

    [8] मैं तुम्हें एक शुभ पौराणिक कथा सुनाता हूँ, जिसके केवल सुनने से बड़ा पाप भी नष्ट हो जाता है।

  9. मान्धाता नाम राजर्षिर्विवस्वद्वंशसंभवः ॥ बभूव चक्रवर्ती स सत्यसन्धः प्रतापवान् ॥ ९ ॥

    māndhātā nāma rājarṣirvivasvadvaṃśasaṃbhavaḥ || babhūva cakravartī sa satyasandhaḥ pratāpavān || 9 ||

    [9] सूर्यवंश में मांधाता नाम के एक राजर्षि हुए। वे चक्रवर्ती, सत्य पर अडिग और प्रतापी राजा थे।

  10. धर्मतः पालयामास प्रजाः पुत्रानिवौरसान् ॥ न तस्य राज्ये दुर्भिक्षं नाधयो व्याधयस्तथा ॥ १० ॥

    dharmataḥ pālayāmāsa prajāḥ putrānivaurasān || na tasya rājye durbhikṣaṃ nādhayo vyādhayastathā || 10 ||

    [10] वे प्रजा का पालन धर्म से, अपनी संतान की तरह करते थे। उनके राज्य में न अकाल था, न मानसिक दुःख, न रोग।

  11. निरातङ्काः प्रजास्तस्य धनधान्यसमन्विताः ॥ नान्यायोपार्जितं द्रव्यं कोशे तस्य महीपतेः ॥ ११ ॥

    nirātaṅkāḥ prajāstasya dhanadhānyasamanvitāḥ || nānyāyopārjitaṃ dravyaṃ kośe tasya mahīpateḥ || 11 ||

    [11] उनकी प्रजा निडर और धन-धान्य से भरी थी। उस राजा के खज़ाने में अन्याय से कमाया एक भी पैसा नहीं था।

  12. तस्यैवं कुर्वतो राज्यं बहुवर्षगणो गतः ॥ अथो कदाचित्संप्राप्ते विपाके पापकर्मणः ॥ १२ ॥

    tasyaivaṃ kurvato rājyaṃ bahuvarṣagaṇo gataḥ || atho kadācitsaṃprāpte vipāke pāpakarmaṇaḥ || 12 ||

    [12] इस तरह राज करते हुए बहुत वर्ष बीत गए। फिर एक बार (पिछले) पाप-कर्म का फल सामने आया —

  13. वर्षत्रयं तद्विषये न ववर्ष बलाहकः ॥ तेनोद्विग्नाः प्रजास्तत्र बभूवुः क्षुधयार्दिताः ॥ १३ ॥

    varṣatrayaṃ tadviṣaye na vavarṣa balāhakaḥ || tenodvignāḥ prajāstatra babhūvuḥ kṣudhayārditāḥ || 13 ||

    [13] तीन वर्ष तक उनके राज्य में बादल नहीं बरसे। इससे प्रजा व्याकुल और भूख से पीड़ित हो गई।

  14. स्वाहास्वधावषट्कारवेदाध्ययनवर्जिताः ॥ बभूवुर्विषयास्तस्य सस्याभावेन पीडिताः ॥ १४ ॥

    svāhāsvadhāvaṣaṭkāravedādhyayanavarjitāḥ || babhūvurviṣayāstasya sasyābhāvena pīḍitāḥ || 14 ||

    [14] अन्न न होने से राज्य के लोग इतने पीड़ित हुए कि यज्ञ (स्वाहा, स्वधा, वषट्कार) और वेद-पाठ तक बंद हो गए।

  15. अथ प्रजाः समागत्य राजानमिदमब्रुवन् ॥ श्रूयतां वचनं राजन्प्रजानां हितकारकम् ॥ १५ ॥

    atha prajāḥ samāgatya rājānamidamabruvan || śrūyatāṃ vacanaṃ rājanprajānāṃ hitakārakam || 15 ||

    [15] तब प्रजा ने इकट्ठा होकर राजा से कहा — “हे राजन, प्रजा के हित की बात सुनिए।

  16. आपो नारा इति प्रोक्ताः पुराणेषु मनीषिभिः ॥ अयनं ता भगवतस्तेन नारायणः स्मृतः ॥ १६ ॥

    āpo nārā iti proktāḥ purāṇeṣu manīṣibhiḥ || ayanaṃ tā bhagavatastena nārāyaṇaḥ smṛtaḥ || 16 ||

    [16] ज्ञानियों ने पुराणों में जल को ‘नार’ कहा है; वह भगवान का निवास (अयन) है, इसलिए वे ‘नारायण’ कहलाते हैं।

  17. पर्जन्यरूपी भगवान्विष्णुः सर्वगतः सदा ॥ स एव कुरुते वृष्टिं वृष्टेरन्नं ततः प्रजाः ॥ १७ ॥

    parjanyarūpī bhagavānviṣṇuḥ sarvagataḥ sadā || sa eva kurute vṛṣṭiṃ vṛṣṭerannaṃ tataḥ prajāḥ || 17 ||

    [17] सर्वव्यापी भगवान विष्णु ही बादल के रूप में हैं; वही वर्षा करते हैं, वर्षा से अन्न होता है और अन्न से प्रजा जीती है।

  18. तदभावेन नृपते क्षयं गच्छन्ति वै प्रजाः ॥ तथा कुरु नृपश्रेष्ठ योगक्षेमो यथा भवेत् ॥ १८ ॥

    tadabhāvena nṛpate kṣayaṃ gacchanti vai prajāḥ || tathā kuru nṛpaśreṣṭha yogakṣemo yathā bhavet || 18 ||

    [18] हे राजन, वर्षा न होने से प्रजा नष्ट हो रही है। हे नृपश्रेष्ठ, ऐसा उपाय कीजिए जिससे हमारा भरण-पोषण और रक्षा हो।”

  19. राजोवाच ॥ सत्यमुक्तं भवद्भिश्च न मिथ्याभिहितं वचः ॥ अन्नं ब्रह्ममयं प्रोक्तमन्ने सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥ १९ ॥

    rājovāca || satyamuktaṃ bhavadbhiśca na mithyābhihitaṃ vacaḥ || annaṃ brahmamayaṃ proktamanne sarvaṃ pratiṣṭhitam || 19 ||

    [19] राजा बोले — “आपने सच कहा, कुछ भी गलत नहीं। अन्न को ब्रह्म-रूप कहा गया है, अन्न में ही सब टिका है।

  20. अन्नाद्भवन्ति भूतानि जगदन्नेन वर्तते ॥ इत्येवं श्रूयते लोके पुराणे बहुविस्तरे ॥ २० ॥

    annādbhavanti bhūtāni jagadannena vartate || ityevaṃ śrūyate loke purāṇe bahuvistare || 20 ||

    [20] अन्न से ही प्राणी जन्मते हैं, अन्न से ही संसार चलता है — यह बात विस्तृत पुराणों में सुनी जाती है।

  21. नृपाणामपचारेण प्रजानां पीडनं भवेत् ॥ नाहं पश्याम्यात्मकृतं दोषं बुद्ध्या विचारयन् ॥ २१ ॥

    nṛpāṇāmapacāreṇa prajānāṃ pīḍanaṃ bhavet || nāhaṃ paśyāmyātmakṛtaṃ doṣaṃ buddhyā vicārayan || 21 ||

    [21] राजाओं की गलती से प्रजा को कष्ट होता है; पर बुद्धि से बहुत सोचने पर भी मुझे अपना कोई दोष नहीं दिखता।

  22. तथापि प्रयतिष्यामि प्रजानां हितकाम्यया ॥ इति कृत्वा मतिं राजा परिमेयबलान्वितः ॥ २२ ॥

    tathāpi prayatiṣyāmi prajānāṃ hitakāmyayā || iti kṛtvā matiṃ rājā parimeyabalānvitaḥ || 22 ||

    [22] फिर भी प्रजा के हित के लिए मैं प्रयत्न करूँगा।” ऐसा निश्चय करके राजा थोड़ी-सी सेना लेकर,

  23. नमस्कृत्य विधातारं जगाम गहनं वनम् ॥ चचार मुनिमुख्यानामाश्रमांस्तपसैधितान् ॥ २३ ॥

    namaskṛtya vidhātāraṃ jagāma gahanaṃ vanam || cacāra munimukhyānāmāśramāṃstapasaidhitān || 23 ||

    [23] ब्रह्मा जी को प्रणाम कर घने वन में चले गए। वहाँ वे तप से तेजस्वी श्रेष्ठ मुनियों के आश्रमों में घूमते रहे।

  24. ददर्शाथ ब्रह्मसुतमृषिमङ्गिरसं नृपः ॥ तेजसा द्योतितदिशं द्वितीयमिव पद्मजम् ॥ २४ ॥

    dadarśātha brahmasutamṛṣimaṅgirasaṃ nṛpaḥ || tejasā dyotitadiśaṃ dvitīyamiva padmajam || 24 ||

    [24] फिर राजा ने ब्रह्मा जी के पुत्र अंगिरा ऋषि को देखा, जिनके तेज से दिशाएँ चमक रही थीं — मानो दूसरे ब्रह्मा हों।

  25. तं दृष्ट्वा हर्षितो राजा अवतीर्य च वाहनात् ॥ नमश्चक्रेऽस्य चरणौ कृताञ्जलिपुटो वशी ॥ २५ ॥

    taṃ dṛṣṭvā harṣito rājā avatīrya ca vāhanāt || namaścakre'sya caraṇau kṛtāñjalipuṭo vaśī || 25 ||

    [25] उन्हें देखकर राजा प्रसन्न हुए, वाहन से उतरे, और संयम से हाथ जोड़कर उनके चरणों में प्रणाम किया।

  26. मुनिस्तमभिनन्द्याथ स्वस्तिवाचनपूर्वकम् ॥ पप्रच्छ कुशलं राज्ये सप्तस्वङ्गेषु भूपतेः ॥ २६ ॥

    munistamabhinandyātha svastivācanapūrvakam || papraccha kuśalaṃ rājye saptasvaṅgeṣu bhūpateḥ || 26 ||

    [26] मुनि ने आशीर्वाद देकर राजा का स्वागत किया और राजा के राज्य के सातों अंगों (राजा, मंत्री, प्रजा, किला, खज़ाना, सेना, मित्र) का कुशल पूछा।

  27. निवेदयित्वा कुशलं पप्रच्छानामयं नृपः ॥ ततश्च मुनिना राजा पृष्टागमनकारणः ॥ २७ ॥

    nivedayitvā kuśalaṃ papracchānāmayaṃ nṛpaḥ || tataśca muninā rājā pṛṣṭāgamanakāraṇaḥ || 27 ||

    [27] राजा ने अपना कुशल बताकर मुनि का कुशल पूछा। फिर मुनि ने राजा से आने का कारण पूछा।

  28. अब्रवीन्मुनिशार्दूलं स्वस्यागमनकारणम् ॥ राजोवाच ॥ भगवन्धर्मविधिना मम पालयतो महीम् ॥ अनावृष्टिः संप्रवृत्ता नाहं वेद्म्यत्र कारणम् ॥ २८ ॥

    abravīnmuniśārdūlaṃ svasyāgamanakāraṇam || rājovāca || bhagavandharmavidhinā mama pālayato mahīm || anāvṛṣṭiḥ saṃpravṛttā nāhaṃ vedmyatra kāraṇam || 28 ||

    [28] राजा ने मुनिश्रेष्ठ को आने का कारण बताया — “भगवन, मैं धर्म की विधि से पृथ्वी का पालन करता हूँ, फिर भी अनावृष्टि (सूखा) पड़ गया है; मैं इसका कारण नहीं जानता।

  29. संशयच्छेदनार्थं ह्यागतोऽहं तवान्तिकम् ॥ योगक्षेमविधानेन प्रजानां निर्वृतिं कुरु ॥ २९ ॥

    saṃśayacchedanārthaṃ hyāgato'haṃ tavāntikam || yogakṣemavidhānena prajānāṃ nirvṛtiṃ kuru || 29 ||

    [29] यही संदेह दूर करने मैं आपके पास आया हूँ। प्रजा के भरण-पोषण का उपाय बताकर उन्हें सुख दीजिए।”

  30. ऋषिरुवाच ॥ एतत्कृतयुगं राजन्युगानामुत्तमं स्मृतम् ॥ अत्र ब्रह्मोत्तरा लोका धर्मश्चात्र चतुष्पदः ॥ ३० ॥

    ṛṣiruvāca || etatkṛtayugaṃ rājanyugānāmuttamaṃ smṛtam || atra brahmottarā lokā dharmaścātra catuṣpadaḥ || 30 ||

    [30] ऋषि बोले — “हे राजन, यह सतयुग है, जो सब युगों में उत्तम माना गया है। इसमें लोग ब्रह्म को सबसे ऊपर मानते हैं और धर्म अपने चारों पैरों पर खड़ा है।

  31. अस्मिन्युगे तपोयुक्ता ब्राह्मणा नेतरे जनाः ॥ विषये तव राजेन्द्र वृषलो यत्तपस्यति ॥ ३१ ॥

    asminyuge tapoyuktā brāhmaṇā netare janāḥ || viṣaye tava rājendra vṛṣalo yattapasyati || 31 ||

    [31] (ग्रंथ के कथन के अनुसार) इस युग में केवल ब्राह्मण तप करते हैं, दूसरे लोग नहीं। हे राजेंद्र, तुम्हारे राज्य में एक शूद्र (वृषल) तप कर रहा है।

    टिप्पणी: यह श्लोक उस समय की वर्ण-धारणा दर्शाता है; हम इसे मूल के प्रति ईमानदारी के लिए ज्यों-का-त्यों दे रहे हैं। ध्यान दें कि कथा में राजा निरपराध तपस्वी को मारने से इनकार करते हैं और व्रत का मार्ग चुनते हैं।

  32. अकार्यकरणात्तस्य न वर्षति बलाहकः ॥ कुरु तस्य वधे यत्नं येन दोषः प्रशाम्यति ॥ ३२ ॥

    akāryakaraṇāttasya na varṣati balāhakaḥ || kuru tasya vadhe yatnaṃ yena doṣaḥ praśāmyati || 32 ||

    [32] उस अनुचित कार्य के कारण बादल नहीं बरसते। उसके वध का प्रयत्न करो, जिससे यह दोष शांत हो।”

  33. राजोवाच ॥ नाहमेनं वधिष्यामि तपस्यन्तमनागसम् ॥ धर्मोपदेशं कथय उपसर्गविनाशने ॥ ३३ ॥

    rājovāca || nāhamenaṃ vadhiṣyāmi tapasyantamanāgasam || dharmopadeśaṃ kathaya upasargavināśane || 33 ||

    [33] राजा बोले — “तप करते हुए इस निरपराध (व्यक्ति) को मैं नहीं मारूँगा। इस संकट को मिटाने के लिए कोई धर्म का उपाय बताइए।”

  34. ऋषिरुवाच ॥ यद्येवं तर्हि नृपते कुरुष्वैकादशीव्रतम् ॥ शुचिमासे सिते पक्षे पद्मा नामेति विश्रुता ॥ ३४ ॥

    ṛṣiruvāca || yadyevaṃ tarhi nṛpate kuruṣvaikādaśīvratam || śucimāse site pakṣe padmā nāmeti viśrutā || 34 ||

    [34] ऋषि बोले — “यदि ऐसा है, तो हे राजन, एकादशी का व्रत करो — आषाढ़ (शुचि) मास के शुक्ल पक्ष की, जो ‘पद्मा’ नाम से प्रसिद्ध है।

  35. तस्या व्रतप्रभावेण सुवृष्टिर्भविता ध्रुवम् ॥ सर्वसिद्धिप्रदा ह्येषा सर्वोपद्रवनाशिनी ॥ ३५ ॥

    tasyā vrataprabhāveṇa suvṛṣṭirbhavitā dhruvam || sarvasiddhipradā hyeṣā sarvopadravanāśinī || 35 ||

    [35] उस व्रत के प्रभाव से निश्चय ही अच्छी वर्षा होगी। यह एकादशी सब सिद्धियाँ देने वाली और सब संकट मिटाने वाली है।

  36. अस्या व्रतं कुरु नृप सप्रजः सपरिच्छदः ॥ इति वाक्यं मुनेः श्रुत्वा राजा स्वगृहमागतः ॥ ३६ ॥

    asyā vrataṃ kuru nṛpa saprajaḥ saparicchadaḥ || iti vākyaṃ muneḥ śrutvā rājā svagṛhamāgataḥ || 36 ||

    [36] हे राजन, अपनी प्रजा और परिवार के साथ इसका व्रत करो।” मुनि की यह बात सुनकर राजा अपने घर लौट आए।

  37. आषाढमासे संप्राप्ते पद्माव्रतमथाकरोत् ॥ प्रजाभिः सह सर्वाभिश्चातुर्वर्ण्यसमन्वितः ॥ ३७ ॥

    āṣāḍhamāse saṃprāpte padmāvratamathākarot || prajābhiḥ saha sarvābhiścāturvarṇyasamanvitaḥ || 37 ||

    [37] आषाढ़ मास आने पर राजा ने चारों वर्णों की सारी प्रजा के साथ पद्मा एकादशी का व्रत किया।

  38. एवं कृते व्रते राजन्प्रववर्ष बलाहकः ॥ जलेन प्लाविता भूमिरभवत्सस्यमालिनी ॥ ३८ ॥

    evaṃ kṛte vrate rājanpravavarṣa balāhakaḥ || jalena plāvitā bhūmirabhavatsasyamālinī || 38 ||

    [38] हे राजन, इस प्रकार व्रत करते ही बादल बरस पड़े; धरती जल से भर गई और खेत फसलों से लहलहा उठे।

  39. हृषीकेशप्रसादेन जनाः सौख्यं प्रपेदिरे ॥ एतस्मात्कारणादेव कर्तव्यं व्रतमुत्तमम् ॥ ३९ ॥

    hṛṣīkeśaprasādena janāḥ saukhyaṃ prapedire || etasmātkāraṇādeva kartavyaṃ vratamuttamam || 39 ||

    [39] भगवान हृषीकेश की कृपा से लोग सुखी हो गए। इसीलिए यह उत्तम व्रत करना चाहिए।

  40. भुक्तिमुक्तिप्रदं चैव लोकानां सुखदायकम् ॥ पठनाच्छ्रवणादस्याः सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ४० ॥

    bhuktimuktipradaṃ caiva lokānāṃ sukhadāyakam || paṭhanācchravaṇādasyāḥ sarvapāpaiḥ pramucyate || 40 ||

    [40] यह व्रत भोग और मोक्ष दोनों देने वाला और लोगों को सुख देने वाला है। इसकी कथा पढ़ने और सुनने से मनुष्य सब पापों से छूट जाता है।

  41. इति श्रीब्रह्माण्डपुराणे आषाढशुक्लपद्माख्यैकादशीव्रतमाहात्म्यं संपूर्णम् ॥

    iti śrībrahmāṇḍapurāṇe āṣāḍhaśuklapadmākhyaikādaśīvratamāhātmyaṃ saṃpūrṇam ||

    [इति] (ग्रंथ के अनुसार) श्री ब्रह्मांड पुराण में कहा गया आषाढ़ शुक्ल ‘पद्मा’ (देवशयनी) एकादशी व्रत माहात्म्य यहाँ पूरा हुआ।

प्रबोधिनी (देवउठनी) एकादशी कथा (कार्तिक शुक्ल) (88 श्लोक)

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  1. ब्रह्मोवाच ॥ प्रबोधिन्याश्च माहात्म्यं पापघ्नं पुण्यवर्धनम् ॥ मुक्तिप्रदं सुबुद्धीनां शृणुष्व मुनिसत्तम ॥ १ ॥

    brahmovāca || prabodhinyāśca māhātmyaṃ pāpaghnaṃ puṇyavardhanam || muktipradaṃ subuddhīnāṃ śṛṇuṣva munisattama || 1 ||

    [1] ब्रह्मा जी बोले — हे मुनिश्रेष्ठ (नारद), प्रबोधिनी एकादशी का माहात्म्य सुनो, जो पाप मिटाता है, पुण्य बढ़ाता है और समझदार लोगों को मुक्ति देता है।

  2. तावद्गर्जति विप्रेन्द्र गङ्गा भागीरथी क्षितौ ॥ यावन्नायाति पापघ्नी कार्तिके हरिबोधिनी ॥ २ ॥

    tāvadgarjati viprendra gaṅgā bhāgīrathī kṣitau || yāvannāyāti pāpaghnī kārtike haribodhinī || 2 ||

    [2] हे विप्रश्रेष्ठ, धरती पर भागीरथी गंगा तभी तक (अपनी महिमा का) गर्जन करती है, जब तक कार्तिक में पाप नाश करने वाली हरिबोधिनी (एकादशी) नहीं आती।

  3. तावद्गर्जन्ति तीर्थानि ह्यासमुद्रसरांसि च ॥ यावत्प्रबोधिनी विष्णोस्तिथिर्नायाति कार्तिकी ॥ ३ ॥

    tāvadgarjanti tīrthāni hyāsamudrasarāṃsi ca || yāvatprabodhinī viṣṇostithirnāyāti kārtikī || 3 ||

    [3] समुद्र तक के सारे तीर्थ और सरोवर भी तभी तक गर्जते हैं, जब तक कार्तिक की विष्णु-प्रबोधिनी तिथि नहीं आती।

  4. अश्वमेधसहस्राणि राजसूयशतानि च ॥ एकेनैवोपवासेन प्रबोधिन्यां लभेन्नरः ॥ ४ ॥

    aśvamedhasahasrāṇi rājasūyaśatāni ca || ekenaivopavāsena prabodhinyāṃ labhennaraḥ || 4 ||

    [4] प्रबोधिनी के एक ही उपवास से मनुष्य को हज़ार अश्वमेध और सौ राजसूय यज्ञों का फल मिलता है।

  5. नारद उवाच ॥ एकभक्ते च किं पुण्यं किं पुण्यं नक्तभोजने ॥ उपवासे च किं पुण्यं तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ ५ ॥

    nārada uvāca || ekabhakte ca kiṃ puṇyaṃ kiṃ puṇyaṃ naktabhojane || upavāse ca kiṃ puṇyaṃ tanme brūhi pitāmaha || 5 ||

    [5] नारद जी बोले — हे पितामह, (इस दिन) एक बार भोजन करने का, रात में भोजन करने का, और पूरे उपवास का क्या पुण्य है? मुझे बताइए।

  6. ब्रह्मोवाच ॥ एकभक्तेन जन्मोत्थं नक्तेन द्विजनुर्भवम् ॥ सप्तजन्मभवं पापमुपवासेन नश्यति ॥ ६ ॥

    brahmovāca || ekabhaktena janmotthaṃ naktena dvijanurbhavam || saptajanmabhavaṃ pāpamupavāsena naśyati || 6 ||

    [6] ब्रह्मा जी बोले — एक बार भोजन से एक जन्म का, रात्रि-भोजन (नक्त) से दो जन्मों का, और पूरे उपवास से सात जन्मों का पाप नष्ट होता है।

  7. यद्दुर्लभं यदप्राप्यं त्रैलोक्ये न तु गोचरम् ॥ यदप्यप्रार्थितं पुत्र ददाति हरिबोधिनी ॥ ७ ॥

    yaddurlabhaṃ yadaprāpyaṃ trailokye na tu gocaram || yadapyaprārthitaṃ putra dadāti haribodhinī || 7 ||

    [7] हे पुत्र, जो दुर्लभ है, जो मिलना कठिन है, जो तीनों लोकों में दिखाई भी नहीं देता, और जो माँगा भी न गया हो — वह भी हरिबोधिनी दे देती है।

  8. मेरुमन्दरमात्राणि पापान्युग्राणि यानि तु ॥ एकेनैवोपवासेन दहते पापहारिणी ॥ ८ ॥

    merumandaramātrāṇi pāpānyugrāṇi yāni tu || ekenaivopavāsena dahate pāpahāriṇī || 8 ||

    [8] मेरु और मंदर पर्वत जितने भयंकर पाप भी, यह पापहारिणी एक ही उपवास से जला देती है।

  9. पूर्वजन्मसहस्रैस्तु यद्दुष्कर्म ह्युपार्जितम् ॥ जागरस्तत्प्रबोधिन्यां दहते तूलराशिवत् ॥ ९ ॥

    pūrvajanmasahasraistu yadduṣkarma hyupārjitam || jāgarastatprabodhinyāṃ dahate tūlarāśivat || 9 ||

    [9] हज़ारों पिछले जन्मों में जो बुरे कर्म इकट्ठे हुए हैं, उन्हें प्रबोधिनी का रात्रि-जागरण रुई के ढेर की तरह जला देता है।

  10. उपवासं प्रबोधिन्यां यः करोति स्वभावतः ॥ विधिवन्मुनिशार्दूल यथोक्तं लभते फलम् ॥ १० ॥

    upavāsaṃ prabodhinyāṃ yaḥ karoti svabhāvataḥ || vidhivanmuniśārdūla yathoktaṃ labhate phalam || 10 ||

    [10] हे मुनिश्रेष्ठ, जो प्रबोधिनी को सहज भाव से, विधि के साथ उपवास करता है, उसे शास्त्र में कहा गया पूरा फल मिलता है।

  11. यथोक्तं सुकृतं यस्तु विधिवत्कुरुते नरः ॥ स्वल्पं मुनिवरश्रेष्ठ मेरुतुल्यं भवेच्च तत् ॥ ११ ॥

    yathoktaṃ sukṛtaṃ yastu vidhivatkurute naraḥ || svalpaṃ munivaraśreṣṭha merutulyaṃ bhavecca tat || 11 ||

    [11] जो मनुष्य विधि से, जैसा कहा गया है वैसा पुण्य-कर्म करता है, उसका थोड़ा-सा पुण्य भी मेरु पर्वत के बराबर हो जाता है।

  12. विधिहीनं तु यः कुर्यात्सुकृतं मेरुमात्रकम् ॥ अणुमात्रं न चाप्नोति फलं धर्मस्य नारद ॥ १२ ॥

    vidhihīnaṃ tu yaḥ kuryātsukṛtaṃ merumātrakam || aṇumātraṃ na cāpnoti phalaṃ dharmasya nārada || 12 ||

    [12] पर हे नारद, जो बिना विधि के मेरु जितना बड़ा पुण्य-कर्म भी करे, उसे धर्म का कण भर भी फल नहीं मिलता।

  13. ये ध्यायन्ति मनोवृत्त्या करिष्यामः प्रबोधिनीम् ॥ तेषां विलीयते पापं पूर्वजन्मशतोद्भवम् ॥ १३ ॥

    ye dhyāyanti manovṛttyā kariṣyāmaḥ prabodhinīm || teṣāṃ vilīyate pāpaṃ pūrvajanmaśatodbhavam || 13 ||

    [13] जो मन में केवल यह सोचते हैं कि “हम प्रबोधिनी का व्रत करेंगे”, उनके सैकड़ों पिछले जन्मों के पाप भी घुल जाते हैं।

  14. समतीतं भविष्यं च वर्तमानं कुलायुतम् ॥ विष्णुलोकं नयत्याशु प्रबोधिन्यां तु जागरात् ॥ १४ ॥

    samatītaṃ bhaviṣyaṃ ca vartamānaṃ kulāyutam || viṣṇulokaṃ nayatyāśu prabodhinyāṃ tu jāgarāt || 14 ||

    [14] प्रबोधिनी के जागरण से (मनुष्य की) बीती, आने वाली और वर्तमान — दस हज़ार पीढ़ियाँ जल्दी ही विष्णु लोक पहुँच जाती हैं।

  15. वसन्ति पितरो हृष्टा विष्णुलोके त्वलंकृताः ॥ विमुक्ता नारकैर्दुःखैः पूर्वकर्मसमुद्भवैः ॥ १५ ॥

    vasanti pitaro hṛṣṭā viṣṇuloke tvalaṃkṛtāḥ || vimuktā nārakairduḥkhaiḥ pūrvakarmasamudbhavaiḥ || 15 ||

    [15] (उसके) पितर पिछले कर्मों से मिले नरक के दुःखों से छूटकर, सजे-धजे और प्रसन्न होकर विष्णु लोक में रहते हैं।

  16. कृत्वा तु पातकं घोरं ब्रह्महत्यादिकं नरः ॥ कृत्वा तु जागरं विष्णोर्धौतपापो भवेन्मुने ॥ १६ ॥

    kṛtvā tu pātakaṃ ghoraṃ brahmahatyādikaṃ naraḥ || kṛtvā tu jāgaraṃ viṣṇordhautapāpo bhavenmune || 16 ||

    [16] हे मुनि, ब्रह्म-हत्या जैसा भयंकर पाप करने वाला मनुष्य भी विष्णु के लिए (प्रबोधिनी का) जागरण करके पापों से धुल जाता है।

  17. दुष्प्राप्यं यत्फलं विप्रैरश्वमेधादिभिर्मखैः ॥ प्राप्यते तत्सुखेनैव प्रबोधिन्यां तु जागरात् ॥ १७ ॥

    duṣprāpyaṃ yatphalaṃ viprairaśvamedhādibhirmakhaiḥ || prāpyate tatsukhenaiva prabodhinyāṃ tu jāgarāt || 17 ||

    [17] जो फल ब्राह्मणों को अश्वमेध आदि यज्ञों से भी कठिनाई से मिलता है, वह प्रबोधिनी के जागरण से आसानी से मिल जाता है।

  18. आप्लुत्य सर्वतीर्थेषु दत्त्वा गाः काञ्चनं महीम् ॥ न तत्फलमवाप्नोति यत्कृत्वा जागरं हरेः ॥ १८ ॥

    āplutya sarvatīrtheṣu dattvā gāḥ kāñcanaṃ mahīm || na tatphalamavāpnoti yatkṛtvā jāgaraṃ hareḥ || 18 ||

    [18] सब तीर्थों में स्नान करके और गाय, सोना व भूमि दान करके भी वह फल नहीं मिलता, जो हरि के लिए जागरण करने से मिलता है।

  19. जातः स एव सुकृती कुलं तेनैव पावितम् ॥ कार्तिके मुनिशार्दूल कृता येन प्रबोधिनी ॥ १९ ॥

    jātaḥ sa eva sukṛtī kulaṃ tenaiva pāvitam || kārtike muniśārdūla kṛtā yena prabodhinī || 19 ||

    [19] हे मुनिश्रेष्ठ, जिसने कार्तिक में प्रबोधिनी का व्रत किया, उसी का जन्म सफल है और उसी ने अपने कुल को पवित्र किया।

  20. यानि कानि च तीर्थानि त्रैलोक्ये संभवन्ति च ॥ तानि तस्य गृहे सम्यग्यः करोति प्रबोधिनीम् ॥ २० ॥

    yāni kāni ca tīrthāni trailokye saṃbhavanti ca || tāni tasya gṛhe samyagyaḥ karoti prabodhinīm || 20 ||

    [20] तीनों लोकों में जितने भी तीर्थ हैं, वे सब उसके घर में आ बसते हैं जो प्रबोधिनी का व्रत करता है।

  21. सर्वकृत्यं परित्यज्य तुष्ट्यर्थं चक्रपाणिनः ॥ उपोष्यैकादशीं रम्यां कार्तिके हरिबोधिनीम् ॥ २१ ॥

    sarvakṛtyaṃ parityajya tuṣṭyarthaṃ cakrapāṇinaḥ || upoṣyaikādaśīṃ ramyāṃ kārtike haribodhinīm || 21 ||

    [21] चक्रधारी भगवान की प्रसन्नता के लिए सब काम छोड़कर कार्तिक की सुंदर हरिबोधिनी एकादशी का उपवास करना चाहिए।

  22. स ज्ञानी स च योगी च स तपस्वी जितेन्द्रियः ॥ विष्णुप्रियतरा ह्येषा धर्मसारस्य दायिनी ॥ २२ ॥

    sa jñānī sa ca yogī ca sa tapasvī jitendriyaḥ || viṣṇupriyatarā hyeṣā dharmasārasya dāyinī || 22 ||

    [22] (ऐसा करने वाला) ज्ञानी है, योगी है, तपस्वी है और इंद्रियों को जीतने वाला है। यह एकादशी विष्णु को बहुत प्रिय है और धर्म का सार देने वाली है।

  23. सकृदेनामुपोष्यैव मुक्तिभाक्च भवेन्नरः ॥ प्रबोधिनीमुपोषित्वा न गर्भे विशते नरः ॥ २३ ॥

    sakṛdenāmupoṣyaiva muktibhākca bhavennaraḥ || prabodhinīmupoṣitvā na garbhe viśate naraḥ || 23 ||

    [23] इसका एक बार भी उपवास करके मनुष्य मुक्ति का भागी हो जाता है; प्रबोधिनी का उपवास करने वाला फिर गर्भ में (जन्म के चक्र में) नहीं आता।

  24. कर्मणा मनसा वाचा पापं यत्समुपार्जितम् ॥ तत्क्षालयति गोविन्दः प्रबोधिन्यां तु जागरात् ॥ २४ ॥

    karmaṇā manasā vācā pāpaṃ yatsamupārjitam || tatkṣālayati govindaḥ prabodhinyāṃ tu jāgarāt || 24 ||

    [24] कर्म से, मन से और वाणी से जो भी पाप कमाया गया है, उसे प्रबोधिनी के जागरण से गोविंद धो देते हैं।

  25. स्नानं दानं जपो होमः समुद्दिश्य जनार्दनम् ॥ नरैर्यत्क्रियते वत्स प्रबोधिन्यां तदक्षयम् ॥ २५ ॥

    snānaṃ dānaṃ japo homaḥ samuddiśya janārdanam || narairyatkriyate vatsa prabodhinyāṃ tadakṣayam || 25 ||

    [25] हे वत्स, प्रबोधिनी के दिन जनार्दन के लिए जो स्नान, दान, जप और होम किया जाता है, वह अक्षय होता है।

  26. व्रतेनानेन देवेशं परितोष्य जनार्दनम् ॥ विराजयन्दिशः सर्वाः प्रयाति भवनं हरेः ॥ २६ ॥

    vratenānena deveśaṃ paritoṣya janārdanam || virājayandiśaḥ sarvāḥ prayāti bhavanaṃ hareḥ || 26 ||

    [26] इस व्रत से देवों के देव जनार्दन को प्रसन्न करके मनुष्य सब दिशाओं को प्रकाशित करता हुआ हरि के धाम जाता है।

  27. बाल्ये यच्चार्जितं वत्स यौवने वार्धके तथा ॥ शतजन्मकृतं पापं स्वल्पं वा यदि वा बहु ॥ २७ ॥

    bālye yaccārjitaṃ vatsa yauvane vārdhake tathā || śatajanmakṛtaṃ pāpaṃ svalpaṃ vā yadi vā bahu || 27 ||

    [27] हे वत्स, बचपन, जवानी और बुढ़ापे में — सौ जन्मों में किया गया पाप, थोड़ा हो या बहुत —

  28. तत्क्षालयति गोविन्दो ह्यस्यामभ्यर्चितो मुने ॥ चन्द्रसूर्योपरागे च यत्फलं परिकीर्तितम् ॥ तत्सहस्रगुणं प्रोक्तं प्रबोधिन्यां तु जागरात् ॥ २८ ॥

    tatkṣālayati govindo hyasyāmabhyarcito mune || candrasūryoparāge ca yatphalaṃ parikīrtitam || tatsahasraguṇaṃ proktaṃ prabodhinyāṃ tu jāgarāt || 28 ||

    [28] हे मुनि, इस दिन पूजे गए गोविंद उसे धो देते हैं। चंद्र-सूर्य ग्रहण में (स्नान-दान का) जो फल कहा गया है, प्रबोधिनी के जागरण का फल उससे हज़ार गुना कहा गया है।

  29. जन्मप्रभृति यत्पुण्यं नरेणासादितं भवेत् ॥ वृथा भवति तत्सर्वमकृते कार्तिकव्रते ॥ २९ ॥

    janmaprabhṛti yatpuṇyaṃ nareṇāsāditaṃ bhavet || vṛthā bhavati tatsarvamakṛte kārtikavrate || 29 ||

    [29] जन्म से अब तक मनुष्य ने जो पुण्य कमाया है, वह सब व्यर्थ हो जाता है यदि कार्तिक का व्रत न किया जाए।

  30. अकृत्वा नियमं विष्णोः कार्तिकं यः क्षिपेन्नरः ॥ जन्मार्जितस्य पुण्यस्य फलं नाप्नोति नारद ॥ ३० ॥

    akṛtvā niyamaṃ viṣṇoḥ kārtikaṃ yaḥ kṣipennaraḥ || janmārjitasya puṇyasya phalaṃ nāpnoti nārada || 30 ||

    [30] हे नारद, जो मनुष्य विष्णु का कोई नियम लिए बिना ही कार्तिक बिता देता है, उसे जीवन भर के पुण्य का फल नहीं मिलता।

  31. तस्मात्त्वया प्रयत्नेन देवदेवो जनार्दनः ॥ उपासनीयो विप्रेन्द्र सर्वकामफलप्रदः ॥ ३१ ॥

    tasmāttvayā prayatnena devadevo janārdanaḥ || upāsanīyo viprendra sarvakāmaphalapradaḥ || 31 ||

    [31] इसलिए हे विप्रश्रेष्ठ, तुम्हें यत्न से सब इच्छाओं का फल देने वाले देवदेव जनार्दन की उपासना करनी चाहिए।

  32. परान्नं वर्जयेद्यस्तु कार्तिके विष्णुतत्परः ॥ अवश्यं स नरो वत्स चान्द्रायणफलं लभेत् ॥ ३२ ॥

    parānnaṃ varjayedyastu kārtike viṣṇutatparaḥ || avaśyaṃ sa naro vatsa cāndrāyaṇaphalaṃ labhet || 32 ||

    [32] हे वत्स, जो विष्णु-भक्त कार्तिक में दूसरों का अन्न नहीं खाता, उसे निश्चय ही चांद्रायण व्रत का फल मिलता है।

  33. न तथा तुष्यते यज्ञैर्न दानैर्मुनिसत्तम ॥ यथा शास्त्रकथालापैः कार्तिके मधुसूदनः ॥ ३३ ॥

    na tathā tuṣyate yajñairna dānairmunisattama || yathā śāstrakathālāpaiḥ kārtike madhusūdanaḥ || 33 ||

    [33] हे मुनिश्रेष्ठ, कार्तिक में मधुसूदन यज्ञों और दानों से उतने प्रसन्न नहीं होते, जितने शास्त्र-कथा की चर्चा से होते हैं।

  34. ये कुर्वन्ति कथां विष्णोर्ये शृण्वन्ति समाहिताः ॥ श्लोकार्धं श्लोकमेकं वा कार्तिके गोशतं फलम् ॥ ३४ ॥

    ye kurvanti kathāṃ viṣṇorye śṛṇvanti samāhitāḥ || ślokārdhaṃ ślokamekaṃ vā kārtike gośataṃ phalam || 34 ||

    [34] कार्तिक में जो विष्णु की कथा कहते हैं और जो ध्यान से सुनते हैं — चाहे आधा श्लोक या एक ही श्लोक — उन्हें सौ गायों (के दान) का फल मिलता है।

  35. श्रेयसे लोभबुद्ध्या वा यः करोति हरेः कथाम् ॥ कार्तिके मुनिशार्दूल कुलानां तारयेच्छतम् ॥ ३५ ॥

    śreyase lobhabuddhyā vā yaḥ karoti hareḥ kathām || kārtike muniśārdūla kulānāṃ tārayecchatam || 35 ||

    [35] हे मुनिश्रेष्ठ, कल्याण के लिए या लाभ की इच्छा से भी, जो कार्तिक में हरि की कथा करता है, वह अपने कुल की सौ पीढ़ियों को तार देता है।

  36. नियमेन नरो यस्तु शृणुते वैष्णवीं कथाम् ॥ कार्तिके तु विशेषेण गोसहस्रफलं लभेत् ॥ ३६ ॥

    niyamena naro yastu śṛṇute vaiṣṇavīṃ kathām || kārtike tu viśeṣeṇa gosahasraphalaṃ labhet || 36 ||

    [36] जो मनुष्य नियम से वैष्णव कथा सुनता है — विशेषकर कार्तिक में — उसे हज़ार गायों (के दान) का फल मिलता है।

  37. प्रबोधवासरे विष्णोः कुरुते यो हरेः कथाम् ॥ सप्तद्वीपवतीदानफलं स लभते मुने ॥ ३७ ॥

    prabodhavāsare viṣṇoḥ kurute yo hareḥ kathām || saptadvīpavatīdānaphalaṃ sa labhate mune || 37 ||

    [37] हे मुनि, जो विष्णु के प्रबोध (जागने) के दिन हरि की कथा करता है, उसे सातों द्वीपों वाली पृथ्वी दान करने का फल मिलता है।

  38. श्रुत्वा विष्णुकथां दिव्यां ये चार्चयन्ति कथाविदम् ॥ स्वशक्त्या मुनिशार्दूल तेषां लोकाः सनातनाः ॥ ३८ ॥

    śrutvā viṣṇukathāṃ divyāṃ ye cārcayanti kathāvidam || svaśaktyā muniśārdūla teṣāṃ lokāḥ sanātanāḥ || 38 ||

    [38] हे मुनिश्रेष्ठ, जो विष्णु की दिव्य कथा सुनकर अपनी शक्ति के अनुसार कथा कहने वाले का सत्कार करते हैं, उन्हें सनातन लोक मिलते हैं।

  39. ब्रह्मणो वचनं श्रुत्वा नारदः पुनरब्रवीत् ॥ नारद उवाच ॥ विधानं ब्रूहि मे स्वामिन्नेकादश्याः सुरोत्तम ॥ ३९ ॥

    brahmaṇo vacanaṃ śrutvā nāradaḥ punarabravīt || nārada uvāca || vidhānaṃ brūhi me svāminnekādaśyāḥ surottama || 39 ||

    [39] ब्रह्मा जी की बात सुनकर नारद जी ने फिर पूछा — हे स्वामी, हे देवश्रेष्ठ, मुझे इस एकादशी की विधि बताइए,

  40. चीर्णेन येन भगवन्यादृशं फलमाप्नुयात् ॥ नारदस्य वचः श्रुत्वा ब्रह्मा वचनमब्रवीत् ॥ ४० ॥

    cīrṇena yena bhagavanyādṛśaṃ phalamāpnuyāt || nāradasya vacaḥ śrutvā brahmā vacanamabravīt || 40 ||

    [40] हे भगवन, जिसके पालन से कैसा फल मिलता है। नारद जी की बात सुनकर ब्रह्मा जी बोले —

  41. ब्रह्मोवाच ॥ ब्राह्मे मुहूर्ते चोत्थाय ह्येकादश्यां द्विजोत्तम ॥ स्नानं चैव प्रकर्तव्यं दन्तधावनपूर्वकम् ॥ ४१ ॥

    brahmovāca || brāhme muhūrte cotthāya hyekādaśyāṃ dvijottama || snānaṃ caiva prakartavyaṃ dantadhāvanapūrvakam || 41 ||

    [41] हे द्विजश्रेष्ठ, एकादशी के दिन ब्राह्म मुहूर्त में उठकर, दातुन करके स्नान करना चाहिए —

  42. नद्यां तडागे कूपे वा वाप्यां गेहे तथैव च ॥ नियमार्थं महाभाग इमं मन्त्रमुदीरयेत् ॥ ४२ ॥

    nadyāṃ taḍāge kūpe vā vāpyāṃ gehe tathaiva ca || niyamārthaṃ mahābhāga imaṃ mantramudīrayet || 42 ||

    [42] नदी, तालाब, कुएँ, बावड़ी या घर में ही। हे महाभाग, फिर नियम (संकल्प) के लिए यह मंत्र बोले —

  43. एकादश्यां निराहारः स्थित्वाऽहनि परे ह्यहम् ॥ भोक्ष्यामि पुण्डरीकाक्ष शरणं मे भवाच्युत ॥ ४३ ॥

    ekādaśyāṃ nirāhāraḥ sthitvā'hani pare hyaham || bhokṣyāmi puṇḍarīkākṣa śaraṇaṃ me bhavācyuta || 43 ||

    [43] “हे पुंडरीकाक्ष, एकादशी के दिन मैं निराहार रहकर अगले दिन भोजन करूँगा। हे अच्युत, आप मेरी शरण हैं।”

  44. गृहीत्वाऽनेन नियमं देवदेवं च चक्रिणम् ॥ संपूज्य भक्त्या तुष्टात्मा ह्युपवासं समाचरेत् ॥ ४४ ॥

    gṛhītvā'nena niyamaṃ devadevaṃ ca cakriṇam || saṃpūjya bhaktyā tuṣṭātmā hyupavāsaṃ samācaret || 44 ||

    [44] इस मंत्र से नियम लेकर, चक्रधारी देवदेव की भक्ति से पूजा करके, प्रसन्न मन से उपवास करे।

  45. रात्रौ जागरणं कुर्याद्देवदेवस्य संनिधौ ॥ गीतं नृत्यं च वाद्यं च तथा कृष्णकथां मुने ॥ ४५ ॥

    rātrau jāgaraṇaṃ kuryāddevadevasya saṃnidhau || gītaṃ nṛtyaṃ ca vādyaṃ ca tathā kṛṣṇakathāṃ mune || 45 ||

    [45] हे मुनि, रात में भगवान के पास जागरण करे — गीत, नृत्य, वाद्य और श्रीकृष्ण की कथा के साथ।

  46. बहुपुष्पैर्बहुफलैः कर्पूरागुरुकुङ्कुमैः ॥ हरेः पूजा विधातव्या कार्तिक्यां बोधवासरे ॥ ४६ ॥

    bahupuṣpairbahuphalaiḥ karpūrāgurukuṅkumaiḥ || hareḥ pūjā vidhātavyā kārtikyāṃ bodhavāsare || 46 ||

    [46] कार्तिक के बोध-दिवस (प्रबोधिनी) पर बहुत से फूलों, फलों, कपूर, अगरु और कुमकुम से हरि की पूजा करनी चाहिए।

  47. वित्तशाठ्यं न कर्तव्यं संप्राप्ते हरिवासरे ॥ फलैर्नानाविधैर्दिव्यैः प्रबोधिन्यां तु भक्तितः ॥ ४७ ॥

    vittaśāṭhyaṃ na kartavyaṃ saṃprāpte harivāsare || phalairnānāvidhairdivyaiḥ prabodhinyāṃ tu bhaktitaḥ || 47 ||

    [47] हरि के दिन आने पर धन खर्च करने में कंजूसी नहीं करनी चाहिए। प्रबोधिनी के दिन भक्ति से तरह-तरह के सुंदर फलों के साथ,

  48. शङ्खतोयं समादाय ह्यर्घो देयो जनार्दने ॥ यत्फलं सर्वतीर्थेषु सर्वदानेषु यत्फलम् ॥ ४८ ॥

    śaṅkhatoyaṃ samādāya hyargho deyo janārdane || yatphalaṃ sarvatīrtheṣu sarvadāneṣu yatphalam || 48 ||

    [48] शंख में जल लेकर जनार्दन को अर्घ्य देना चाहिए। सब तीर्थों और सब दानों में जो फल है,

  49. तत्फलं कोटिगुणितं दत्तेऽर्घे बोधवासरे ॥ अगस्त्यकुसुमैर्देवं पूजयेद्यो जनार्दनम् ॥ ४९ ॥

    tatphalaṃ koṭiguṇitaṃ datte'rghe bodhavāsare || agastyakusumairdevaṃ pūjayedyo janārdanam || 49 ||

    [49] उससे करोड़ गुना फल बोध-दिवस पर अर्घ्य देने से मिलता है। जो अगस्त्य (अगस्तिया) के फूलों से जनार्दन की पूजा करता है,

  50. देवेन्द्रोऽपि तदग्रे च करोति करसंपुटम् ॥ न तत्करोति विप्रेन्द्र तपसा तोषितो हरिः ॥ ५० ॥

    devendro'pi tadagre ca karoti karasaṃpuṭam || na tatkaroti viprendra tapasā toṣito hariḥ || 50 ||

    [50] उसके सामने देवराज इंद्र भी हाथ जोड़ते हैं। हे विप्रश्रेष्ठ, तप से प्रसन्न होकर भी हरि वह (कृपा) नहीं करते,

  51. यत्करोति हृषीकेशो मुनिपुष्पैरलंकृतः ॥ बिल्वपत्रैश्च ये कृष्णं कार्तिके कलिवर्द्धन ॥ ५१ ॥

    yatkaroti hṛṣīkeśo munipuṣpairalaṃkṛtaḥ || bilvapatraiśca ye kṛṣṇaṃ kārtike kalivarddhana || 51 ||

    [51] जो अगस्त्य-पुष्पों से सजाए जाने पर हृषीकेश करते हैं। हे नारद (कलिवर्धन), जो कार्तिक में बेलपत्र से

  52. पूजयन्ति महाभक्त्या मुक्तिस्तेषां मयोदिता ॥ तुलसीदलपुष्पैर्ये पूजयन्ति जनार्दनम् ॥ ५२ ॥

    pūjayanti mahābhaktyā muktisteṣāṃ mayoditā || tulasīdalapuṣpairye pūjayanti janārdanam || 52 ||

    [52] बड़ी भक्ति के साथ श्रीकृष्ण की पूजा करते हैं, उनके लिए मैंने मुक्ति कही है। जो तुलसी के पत्तों और मंजरी से जनार्दन की पूजा करते हैं,

  53. कार्तिके स दहेत्तेषां पापं जन्मायुतोद्भवम् ॥ दृष्टा स्पृष्टाथवा ध्याता कीर्तिता नमिता स्तुता ॥ ५३ ॥

    kārtike sa dahetteṣāṃ pāpaṃ janmāyutodbhavam || dṛṣṭā spṛṣṭāthavā dhyātā kīrtitā namitā stutā || 53 ||

    [53] कार्तिक में वे (भगवान) उनके दस हज़ार जन्मों के पाप जला देते हैं। (शुभ तुलसी) देखी गई, छुई गई, ध्यान की गई, नाम ली गई, प्रणाम की गई, स्तुति की गई,

  54. रोपिता सेचिता नित्यं पूजिता तुलसी शुभा ॥ नवधा सेविता भक्त्या कार्तिके यैर्दिने दिने ॥ ५४ ॥

    ropitā secitā nityaṃ pūjitā tulasī śubhā || navadhā sevitā bhaktyā kārtike yairdine dine || 54 ||

    [54] लगाई गई, रोज़ सींची गई और पूजी गई — इस तरह जिन्होंने कार्तिक में रोज़ भक्ति से नौ प्रकार से तुलसी की सेवा की,

  55. युगकोटिसहस्राणि ते वसन्ति हरेर्गृहे ॥ रोपिता तुलसी यैस्तु वर्धते वसुधातले ॥ ५५ ॥

    yugakoṭisahasrāṇi te vasanti harergṛhe || ropitā tulasī yaistu vardhate vasudhātale || 55 ||

    [55] वे हज़ारों करोड़ युगों तक हरि के धाम में रहते हैं। जिनकी लगाई तुलसी धरती पर बढ़ती है,

  56. कुले तेषां तु ये जाता ये भविष्यन्ति ये गताः ॥ आकल्पयुगसाहस्रं तेषां वासो हरेर्गृहे ॥ ५६ ॥

    kule teṣāṃ tu ye jātā ye bhaviṣyanti ye gatāḥ || ākalpayugasāhasraṃ teṣāṃ vāso harergṛhe || 56 ||

    [56] उनके कुल में जो पैदा हुए, जो आगे होंगे और जो जा चुके हैं — वे सब कल्प भर, हज़ारों युगों तक हरि के धाम में रहते हैं।

  57. कदम्बकुसुमैर्देवं येऽर्चयन्ति जनार्दनम् ॥ तेषां यमालयो नैव प्रसादाच्चक्रपाणिनः ॥ ५७ ॥

    kadambakusumairdevaṃ ye'rcayanti janārdanam || teṣāṃ yamālayo naiva prasādāccakrapāṇinaḥ || 57 ||

    [57] जो कदंब के फूलों से जनार्दन की पूजा करते हैं, चक्रपाणि की कृपा से उन्हें यमलोक नहीं जाना पड़ता।

  58. दृष्ट्वा कदम्बकुसुमं प्रीतो भवति केशवः ॥ किं पुनः पूजितो विप्र सर्वकामप्रदो हरिः ॥ ५८ ॥

    dṛṣṭvā kadambakusumaṃ prīto bhavati keśavaḥ || kiṃ punaḥ pūjito vipra sarvakāmaprado hariḥ || 58 ||

    [58] हे विप्र, कदंब का फूल देखकर ही केशव प्रसन्न हो जाते हैं — फिर उससे पूजे जाने पर तो सब इच्छाएँ पूरी करने वाले हरि (कितने प्रसन्न होंगे)।

  59. यः पुनः पाटलापुष्पैः कार्तिके गरुडध्वजम् ॥ अर्चयेत्परया भक्त्या मुक्तिभागी भवेद्धि सः ॥ ५९ ॥

    yaḥ punaḥ pāṭalāpuṣpaiḥ kārtike garuḍadhvajam || arcayetparayā bhaktyā muktibhāgī bhaveddhi saḥ || 59 ||

    [59] जो कार्तिक में पाटला (पाढ़र) के फूलों से परम भक्ति के साथ गरुड़ध्वज भगवान की पूजा करता है, वह निश्चय ही मुक्ति का भागी होता है।

  60. बकुलाशोककुसुमैर्येऽर्चयन्ति जगत्पतिम् ॥ विशोकास्ते भविष्यन्ति यावच्चन्द्रदिवाकरौ ॥ ६० ॥

    bakulāśokakusumairye'rcayanti jagatpatim || viśokāste bhaviṣyanti yāvaccandradivākarau || 60 ||

    [60] जो बकुल (मौलसिरी) और अशोक के फूलों से जगत्पति की पूजा करते हैं, वे जब तक सूर्य-चंद्र हैं तब तक शोक-रहित रहेंगे।

  61. येऽर्चयन्ति जगन्नाथं करवीरैः सितासितैः ॥ तेषां सदा तु विप्रेन्द्र प्रीतो भवति केशवः ॥ ६१ ॥

    ye'rcayanti jagannāthaṃ karavīraiḥ sitāsitaiḥ || teṣāṃ sadā tu viprendra prīto bhavati keśavaḥ || 61 ||

    [61] हे विप्रश्रेष्ठ, जो सफ़ेद और लाल कनेर से जगन्नाथ की पूजा करते हैं, उन पर केशव सदा प्रसन्न रहते हैं।

  62. मञ्जरीं सहकारस्य केशवोपरि ये नराः ॥ यच्छन्ति ते महाभागा गोकोटिफलभागिनः ॥ ६२ ॥

    mañjarīṃ sahakārasya keśavopari ye narāḥ || yacchanti te mahābhāgā gokoṭiphalabhāginaḥ || 62 ||

    [62] जो लोग केशव पर आम की मंजरी चढ़ाते हैं, वे महाभाग करोड़ गायों (के दान) के फल के भागी होते हैं।

  63. दूर्वाङ्कुरैर्हरेर्यस्तु पूजाकाले प्रयच्छति ॥ पूजाफलं शतगुणं सम्यगाप्नोति मानवः ॥ ६३ ॥

    dūrvāṅkurairhareryastu pūjākāle prayacchati || pūjāphalaṃ śataguṇaṃ samyagāpnoti mānavaḥ || 63 ||

    [63] जो पूजा के समय हरि को दूब के अंकुर चढ़ाता है, उसे पूजा का सौ गुना फल मिलता है।

  64. शमीपत्रैस्तु ये देवं पूजयन्ति सुखप्रदम् ॥ यममार्गो महाघोरो निस्तीर्णस्तैस्तु नारद ॥ ६४ ॥

    śamīpatraistu ye devaṃ pūjayanti sukhapradam || yamamārgo mahāghoro nistīrṇastaistu nārada || 64 ||

    [64] हे नारद, जो सुख देने वाले भगवान की शमी के पत्तों से पूजा करते हैं, वे यमलोक का भयंकर रास्ता पार कर जाते हैं।

  65. वर्षाकाले तु देवेशं कुसुमैश्चम्पकोद्भवैः ॥ येऽर्चयन्ति न ते मर्त्याः संसरेयुः पुनर्भवे ॥ ६५ ॥

    varṣākāle tu deveśaṃ kusumaiścampakodbhavaiḥ || ye'rcayanti na te martyāḥ saṃsareyuḥ punarbhave || 65 ||

    [65] जो वर्षा ऋतु में चंपा के फूलों से देवेश की पूजा करते हैं, वे फिर जन्म-मरण के चक्र में नहीं आते।

  66. सुवर्णकेतकीपुष्पं यो ददाति जनार्दने ॥ कोटिजन्मार्जितं पापं दहते गरुडध्वजः ॥ ६६ ॥

    suvarṇaketakīpuṣpaṃ yo dadāti janārdane || koṭijanmārjitaṃ pāpaṃ dahate garuḍadhvajaḥ || 66 ||

    [66] जो जनार्दन को सुनहरा केतकी का फूल चढ़ाता है, उसके करोड़ जन्मों के पाप गरुड़ध्वज भगवान जला देते हैं।

  67. कुङ्कुमारुणवर्णां च गन्धाढ्यां शतपत्रिकाम् ॥ यो ददाति जगन्नाथे श्वेतद्वीपालये वसेत् ॥ ६७ ॥

    kuṅkumāruṇavarṇāṃ ca gandhāḍhyāṃ śatapatrikām || yo dadāti jagannāthe śvetadvīpālaye vaset || 67 ||

    [67] जो कुमकुम जैसे लाल रंग का, सुगंधित शतपत्र (सौ पंखुड़ियों वाला कमल) जगन्नाथ को चढ़ाता है, वह श्वेतद्वीप (विष्णु धाम) में बसता है।

  68. एवं संपूज्य रात्रौ च केशवं भुक्तिमुक्तिदम् ॥ प्रातरुत्थाय च ब्रह्मन्गत्वा तु सजलां नदीम् ॥ ६८ ॥

    evaṃ saṃpūjya rātrau ca keśavaṃ bhuktimuktidam || prātarutthāya ca brahmangatvā tu sajalāṃ nadīm || 68 ||

    [68] हे ब्रह्मन्, इस प्रकार रात में भोग और मोक्ष देने वाले केशव की पूजा करके, सुबह उठकर जल से भरी नदी पर जाए,

  69. तत्र स्नात्वा जपित्वा च कृत्वा पौर्वाह्णिकीः क्रियाः ॥ गृहं गत्वा च संपूज्यः केशवो विधिवन्नरैः ॥ ६९ ॥

    tatra snātvā japitvā ca kṛtvā paurvāhṇikīḥ kriyāḥ || gṛhaṃ gatvā ca saṃpūjyaḥ keśavo vidhivannaraiḥ || 69 ||

    [69] वहाँ स्नान, जप और सुबह के नित्य कर्म करके घर लौटे, और विधि से केशव की पूजा करे।

  70. व्रतस्य पूरणार्थाय ब्राह्मणान्भोजयेत्सुधीः ॥ क्षमापयेत्सुवचसा भक्तियुक्तेन चेतसा ॥ ७० ॥

    vratasya pūraṇārthāya brāhmaṇānbhojayetsudhīḥ || kṣamāpayetsuvacasā bhaktiyuktena cetasā || 70 ||

    [70] व्रत पूरा करने के लिए समझदार व्यक्ति ब्राह्मणों को भोजन कराए और भक्ति भरे मन से मीठे वचनों में उनसे क्षमा माँगे।

  71. गुरुपूजा ततः कार्या भोजनाच्छादनादिभिः ॥ दक्षिणा गौश्च दातव्या तुष्ट्यर्थं चक्रपाणिनः ॥ ७१ ॥

    gurupūjā tataḥ kāryā bhojanācchādanādibhiḥ || dakṣiṇā gauśca dātavyā tuṣṭyarthaṃ cakrapāṇinaḥ || 71 ||

    [71] फिर भोजन, वस्त्र आदि से गुरु की पूजा करे; चक्रपाणि की प्रसन्नता के लिए दक्षिणा और गाय दान करे।

  72. भूयसी चैव दातव्या ब्राह्मणेभ्यः प्रयत्नतः ॥ नियमश्चैव संत्याज्यो ब्राह्मणाग्रे प्रयत्नतः ॥ ७२ ॥

    bhūyasī caiva dātavyā brāhmaṇebhyaḥ prayatnataḥ || niyamaścaiva saṃtyājyo brāhmaṇāgre prayatnataḥ || 72 ||

    [72] ब्राह्मणों को यत्न से भरपूर दक्षिणा दे, और (चातुर्मास में लिया) नियम ब्राह्मणों के सामने विधि से छोड़े।

  73. कथयित्वा द्विजेभ्यस्तु दद्याच्छक्त्या च दक्षिणाम् ॥ नक्तभोजी नरो राजन्ब्राह्मणान्भोजयेच्छुभान् ॥ ७३ ॥

    kathayitvā dvijebhyastu dadyācchaktyā ca dakṣiṇām || naktabhojī naro rājanbrāhmaṇānbhojayecchubhān || 73 ||

    [73] ब्राह्मणों को (अपना नियम) बताकर शक्ति के अनुसार दक्षिणा दे। हे राजन, जिसने नक्त-भोजन (केवल रात में भोजन) का नियम लिया हो, वह अच्छे ब्राह्मणों को भोजन कराए।

  74. अयाचिते बलीवर्दं सहिरण्यं प्रदापयेत् ॥ अमांसाशी नरो यस्तु प्रददेद्गां सदक्षिणाम् ॥ ७४ ॥

    ayācite balīvardaṃ sahiraṇyaṃ pradāpayet || amāṃsāśī naro yastu pradadedgāṃ sadakṣiṇām || 74 ||

    [74] जिसने बिना माँगे मिला भोजन ही करने का नियम लिया हो, वह सोने सहित बैल दान करे; जिसने मांस न खाने का नियम लिया हो, वह दक्षिणा सहित गाय दान करे।

  75. धात्रीस्नायी नरो दद्याद्दधि माक्षिकमेव च ॥ फलानां नियमे राजन्फलदानं समाचरेत् ॥ ७५ ॥

    dhātrīsnāyī naro dadyāddadhi mākṣikameva ca || phalānāṃ niyame rājanphaladānaṃ samācaret || 75 ||

    [75] आँवले से स्नान का नियम लेने वाला दही और शहद दान करे; हे राजन, फलों का नियम लेने वाला फल दान करे।

  76. तैलस्थाने घृतं देयं घृतस्थाने पयः स्मृतम् ॥ धान्यानां नियमे राजन्दीयन्ते शालितण्डुलाः ॥ ७६ ॥

    tailasthāne ghṛtaṃ deyaṃ ghṛtasthāne payaḥ smṛtam || dhānyānāṃ niyame rājandīyante śālitaṇḍulāḥ || 76 ||

    [76] तेल छोड़ा हो तो घी, घी छोड़ा हो तो दूध दान करना कहा गया है; हे राजन, अनाज छोड़ा हो तो शाली चावल दान किए जाते हैं।

  77. दद्याद्भूशयने शय्यां सतूलां सपरिच्छदाम् ॥ पत्रभोजी नरो दद्याद्भाजनं घृतसंयुतम् ॥ ७७ ॥

    dadyādbhūśayane śayyāṃ satūlāṃ saparicchadām || patrabhojī naro dadyādbhājanaṃ ghṛtasaṃyutam || 77 ||

    [77] ज़मीन पर सोने का नियम लिया हो तो रुई के गद्दे और बिछावन सहित शय्या दान करे; पत्ते पर भोजन करने वाला घी सहित बर्तन दान करे।

  78. मौने घण्टां तिलांश्चैव सहिरण्यं प्रदापयेत् ॥ धारणे तु स्वकेशानामादर्शं दापयेद्बुधः ॥ ७८ ॥

    maune ghaṇṭāṃ tilāṃścaiva sahiraṇyaṃ pradāpayet || dhāraṇe tu svakeśānāmādarśaṃ dāpayedbudhaḥ || 78 ||

    [78] मौन का नियम लिया हो तो घंटा, तिल और सोना दान करे; अपने बाल न कटवाने का नियम लिया हो तो समझदार व्यक्ति दर्पण दान करे।

  79. उपानहौ प्रदातव्यावुपानत्परिवर्जनात् ॥ लवणस्य च संत्यागे शर्करां च प्रदापयेत् ॥ ७९ ॥

    upānahau pradātavyāvupānatparivarjanāt || lavaṇasya ca saṃtyāge śarkarāṃ ca pradāpayet || 79 ||

    [79] जूते छोड़े हों तो जूते दान करे; नमक छोड़ा हो तो शक्कर दान करे।

  80. नित्यं दीपप्रदो यस्तु विष्णोर्वा विबुधालये ॥ सदीपं सघृतं ताम्रं काञ्चनं वा दशायुतम् ॥ ८० ॥

    nityaṃ dīpaprado yastu viṣṇorvā vibudhālaye || sadīpaṃ saghṛtaṃ tāmraṃ kāñcanaṃ vā daśāyutam || 80 ||

    [80] जो रोज़ विष्णु मंदिर या देवालय में दीपक जलाने का नियम ले, वह व्रत पूरा करने के लिए घी सहित दीपक, तांबा या सोना — (या) दस हज़ार (मुद्रा) —

  81. प्रदद्याद्विष्णुभक्ताय व्रतसंपूर्तिहेतवे ॥ एकान्तरोपवासे तु कुम्भानष्टौ प्रदापयेत् ॥ ८१ ॥

    pradadyādviṣṇubhaktāya vratasaṃpūrtihetave || ekāntaropavāse tu kumbhānaṣṭau pradāpayet || 81 ||

    [81] किसी विष्णु-भक्त को दान करे। एक-एक दिन छोड़कर उपवास का नियम लिया हो तो आठ घड़े दान करे —

  82. सवस्त्रान्काञ्चनोपेतान्सर्वान्सालंकृताञ्छुभान् ॥ यथोक्तकरणे शक्तिर्यदि न स्यात्तदा मुने ॥ ८२ ॥

    savastrānkāñcanopetānsarvānsālaṃkṛtāñchubhān || yathoktakaraṇe śaktiryadi na syāttadā mune || 82 ||

    [82] सब वस्त्र और सोने सहित, सुंदर सजाकर। हे मुनि, यदि बताए अनुसार करने की शक्ति न हो, तो

  83. द्विजवाक्यं स्मृतं राजन्संपूर्णव्रतसिद्धिदम् ॥ नत्वा विसर्जयेद्विप्रांस्ततो भुञ्जीत च स्वयम् ॥ ८३ ॥

    dvijavākyaṃ smṛtaṃ rājansaṃpūrṇavratasiddhidam || natvā visarjayedviprāṃstato bhuñjīta ca svayam || 83 ||

    [83] हे राजन, ब्राह्मणों का वचन (आशीर्वाद) ही व्रत को पूरी सिद्धि देने वाला माना गया है। ब्राह्मणों को प्रणाम करके विदा करे, फिर स्वयं भोजन करे।

  84. यत्त्यक्तं चतुरो मासान्समाप्तिं तस्य चाचरेत् ॥ एवं य आचरेत्पार्थ सोऽनन्तफलमाप्नुयात् ॥ ८४ ॥

    yattyaktaṃ caturo māsānsamāptiṃ tasya cācaret || evaṃ ya ācaretpārtha so'nantaphalamāpnuyāt || 84 ||

    [84] चार महीनों में जो कुछ छोड़ा था, उसका (आज) समापन करे। हे पार्थ, जो ऐसा करता है, उसे अनंत फल मिलता है।

    टिप्पणी: यहाँ से संबोधन ‘पार्थ’, ‘राजेन्द्र’, ‘नृप’ है — यानी कथा का अंतिम भाग श्रीकृष्ण द्वारा युधिष्ठिर को कहा गया लगता है, जबकि आरंभ ब्रह्मा-नारद संवाद है। मूल में ऐसा ही छपा है।

  85. अवसाने तु राजेन्द्र वासुदेवपुरं व्रजेत् ॥ यश्चाविघ्नं समाप्यैवं चातुर्मास्यव्रतं नृप ॥ ८५ ॥

    avasāne tu rājendra vāsudevapuraṃ vrajet || yaścāvighnaṃ samāpyaivaṃ cāturmāsyavrataṃ nṛpa || 85 ||

    [85] हे राजेंद्र, अंत में वह वासुदेव के धाम जाता है। हे राजन, जो इस तरह बिना बाधा के चातुर्मास्य व्रत पूरा करता है,

  86. स भवेत्कृतकृत्यस्तु न पुनर्मानुषो भवेत् ॥ एतत्कृत्वा महीपाल परिपूर्णं व्रतं भवेत् ॥ ८६ ॥

    sa bhavetkṛtakṛtyastu na punarmānuṣo bhavet || etatkṛtvā mahīpāla paripūrṇaṃ vrataṃ bhavet || 86 ||

    [86] वह कृतार्थ हो जाता है और फिर मनुष्य-जन्म में नहीं आता। हे राजन, ऐसा करने पर व्रत पूर्ण होता है।

  87. व्रतवैकल्यमासाद्य ह्यन्धः कुष्ठी प्रजायते ॥ एतत्ते सर्वमाख्यातं यत्पृष्टोऽहमिह त्वया ॥ पठनाच्छ्रवणाद्वापि लभेद्गोदानजं फलम् ॥ ८७ ॥

    vratavaikalyamāsādya hyandhaḥ kuṣṭhī prajāyate || etatte sarvamākhyātaṃ yatpṛṣṭo'hamiha tvayā || paṭhanācchravaṇādvāpi labhedgodānajaṃ phalam || 87 ||

    [87] (ग्रंथ के अनुसार) व्रत अधूरा छोड़ने पर मनुष्य अंधा या कोढ़ी जन्मता है। तुमने जो पूछा, वह सब मैंने बता दिया। इसे पढ़ने या सुनने से भी गोदान का फल मिलता है।

  88. इति श्रीस्कं० का० शु० प्रबो० मा० सं० ॥

    iti śrīskaṃ0 kā0 śu0 prabo0 mā0 saṃ0 ||

    [इति] (ग्रंथ के अनुसार) श्री स्कंद पुराण में कहा गया कार्तिक शुक्ल प्रबोधिनी (देवउठनी) एकादशी माहात्म्य यहाँ पूरा हुआ।

    टिप्पणी: मूल में समाप्ति-पंक्ति संक्षेप में छपी है: “इति श्रीस्कं० का० शु० प्रबो० मा० सं०” = इति श्रीस्कन्दपुराणे कार्तिकशुक्लप्रबोधिनीमाहात्म्यं संपूर्णम्।

मोक्षदा एकादशी कथा (मार्गशीर्ष शुक्ल) (44 श्लोक)

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  1. युधिष्ठिर उवाच ॥ वन्दे विष्णुं प्रभुं साक्षाल्लोकत्रयसुखप्रदम् ॥ विश्वेशं विश्वकर्तारं पुराणं पुरुषोत्तमम् ॥ १ ॥

    yudhiṣṭhira uvāca || vande viṣṇuṃ prabhuṃ sākṣāllokatrayasukhapradam || viśveśaṃ viśvakartāraṃ purāṇaṃ puruṣottamam || 1 ||

    [1] युधिष्ठिर बोले — मैं उन प्रभु विष्णु को प्रणाम करता हूँ जो तीनों लोकों को सुख देते हैं, जो विश्व के स्वामी, विश्व के रचयिता, सनातन पुरुषोत्तम हैं।

  2. पृच्छामि देवदेवेश संशयोऽस्ति महान्मम ॥ लोकानां तु हितार्थाय पापानां च क्षयाय च ॥ २ ॥

    pṛcchāmi devadeveśa saṃśayo'sti mahānmama || lokānāṃ tu hitārthāya pāpānāṃ ca kṣayāya ca || 2 ||

    [2] हे देवों के देव, मेरे मन में एक बड़ा प्रश्न है; लोगों के भले और पापों के नाश के लिए पूछता हूँ।

  3. मार्गशीर्षे सिते पक्षे किं नामैकादशी भवेत् ॥ कीदृशश्च विधिस्तस्याः को देवस्तत्र पूज्यते ॥ ३ ॥

    mārgaśīrṣe site pakṣe kiṃ nāmaikādaśī bhavet || kīdṛśaśca vidhistasyāḥ ko devastatra pūjyate || 3 ||

    [3] मार्गशीर्ष (अगहन) के शुक्ल पक्ष की एकादशी का क्या नाम है? उसकी विधि कैसी है और उसमें किस देवता की पूजा होती है?

  4. एतदाचक्ष्व मे स्वामिन्विस्तरेण यथातथम् ॥ श्रीकृष्ण उवाच ॥ सम्यक्पृष्टं त्वया राजन्साधु ते विमला मतिः ॥ ४ ॥

    etadācakṣva me svāminvistareṇa yathātatham || śrīkṛṣṇa uvāca || samyakpṛṣṭaṃ tvayā rājansādhu te vimalā matiḥ || 4 ||

    [4] हे स्वामी, यह मुझे ठीक-ठीक विस्तार से बताइए। श्रीकृष्ण बोले — हे राजन, तुमने अच्छा प्रश्न किया; तुम्हारी बुद्धि निर्मल है।

  5. कथयिष्यामि राजेन्द्र हरिवासरमुत्तमम् ॥ उत्पन्ना साऽसिते पक्षे द्वादशी मम वल्लभा ॥ ५ ॥

    kathayiṣyāmi rājendra harivāsaramuttamam || utpannā sā'site pakṣe dvādaśī mama vallabhā || 5 ||

    [5] हे राजेन्द्र, मैं उत्तम हरि-वासर (एकादशी) के बारे में बताता हूँ। कृष्ण पक्ष में उत्पन्न हुई वह एकादशी मुझे प्रिय है।

    टिप्पणी: मूल की पाद-टिप्पणी: यहाँ ‘द्वादशी’ शब्द का अर्थ एकादशी है।

  6. मार्गशीर्षे समुत्पन्ना मम देहान्नराधिप ॥ मुरस्य च वधार्थाय प्रख्याता मम वल्लभा ॥ ६ ॥

    mārgaśīrṣe samutpannā mama dehānnarādhipa || murasya ca vadhārthāya prakhyātā mama vallabhā || 6 ||

    [6] हे नरेश, वह मार्गशीर्ष में मेरे शरीर से मुर दैत्य के वध के लिए प्रकट हुई थी; वह मेरी प्रिय के रूप में प्रसिद्ध है।

  7. कथिता सा मया चैव त्वदग्रे राजसत्तम ॥ पूर्वमेकादशी राजंस्त्रैलोक्ये सचराचरे ॥ ७ ॥

    kathitā sā mayā caiva tvadagre rājasattama || pūrvamekādaśī rājaṃstrailokye sacarācare || 7 ||

    [7] हे श्रेष्ठ राजा, उसकी कथा मैं पहले ही तुम्हें सुना चुका हूँ — चर-अचर सहित तीनों लोकों में वह पहली एकादशी है,

  8. मार्गशीर्षेऽसिते पक्षे चोत्पत्तिरिति नामतः ॥ अतः परं प्रवक्ष्यामि मार्गशीर्षसितां तथा ॥ ८ ॥

    mārgaśīrṣe'site pakṣe cotpattiriti nāmataḥ || ataḥ paraṃ pravakṣyāmi mārgaśīrṣasitāṃ tathā || 8 ||

    [8] जो मार्गशीर्ष के कृष्ण पक्ष में ‘उत्पत्ति’ (उत्पन्ना) नाम से जानी जाती है। अब मैं मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष की एकादशी के बारे में बताता हूँ।

  9. मोक्षा नाम्नाति विख्यातां सर्वपापहरां पराम् ॥ देवं दामोदरं तस्यां पूजयेच्च प्रयत्नतः ॥ ९ ॥

    mokṣā nāmnāti vikhyātāṃ sarvapāpaharāṃ parām || devaṃ dāmodaraṃ tasyāṃ pūjayecca prayatnataḥ || 9 ||

    [9] वह ‘मोक्षा’ नाम से प्रसिद्ध है, सब पापों को हरने वाली और श्रेष्ठ है। उस दिन भगवान दामोदर की ध्यान से पूजा करनी चाहिए —

    टिप्पणी: ग्रंथ में नाम ‘मोक्षा’ है; यही आज मोक्षदा एकादशी (गीता जयंती का दिन) के नाम से प्रसिद्ध है।

  10. गन्धपुष्पादिभिश्चैव गीतनृत्यैः सुमङ्गलैः ॥ शृणु राजेन्द्र वक्ष्यामि कथां पौराणिकीं शुभाम् ॥ १० ॥

    gandhapuṣpādibhiścaiva gītanṛtyaiḥ sumaṅgalaiḥ || śṛṇu rājendra vakṣyāmi kathāṃ paurāṇikīṃ śubhām || 10 ||

    [10] गंध, फूल आदि से और मंगल गीत-नृत्य के साथ। हे राजेन्द्र, सुनो, मैं एक शुभ पुराण-कथा सुनाता हूँ।

  11. यस्याः श्रवणमात्रेण वाजपेयफलं लभेत् ॥ अधोगतिं गता ये वै पितृमातृसुतादयः ॥ ११ ॥

    yasyāḥ śravaṇamātreṇa vājapeyaphalaṃ labhet || adhogatiṃ gatā ye vai pitṛmātṛsutādayaḥ || 11 ||

    [11] इसे केवल सुनने से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है। जो पिता, माता, पुत्र आदि नीच गति (नरक) में गए हों,

  12. अस्याः पुण्यप्रभावेण स्वर्गं यान्ति न संशयः ॥ एतस्मात्कारणाद्राजन्महिमानं शृणुष्व तम् ॥ १२ ॥

    asyāḥ puṇyaprabhāveṇa svargaṃ yānti na saṃśayaḥ || etasmātkāraṇādrājanmahimānaṃ śṛṇuṣva tam || 12 ||

    [12] वे भी इस एकादशी के पुण्य के प्रभाव से स्वर्ग जाते हैं, इसमें संशय नहीं। इसलिए हे राजन, इसकी महिमा सुनो।

  13. पुरा वै नगरे रम्ये गोकुले न्यवसन्नृपः ॥ वैखानस इति राजर्षिः पुत्रवत्पालयन्प्रजाः ॥ १३ ॥

    purā vai nagare ramye gokule nyavasannṛpaḥ || vaikhānasa iti rājarṣiḥ putravatpālayanprajāḥ || 13 ||

    [13] पहले सुंदर नगर गोकुल में वैखानस नाम के एक राजर्षि राजा रहते थे, जो प्रजा का पालन अपने पुत्रों की तरह करते थे।

  14. द्विजाश्च न्यवसंस्तत्र चतुर्वेदपरायणाः ॥ एवं स राज्यं कुर्वाणो रात्रौ तु स्वप्नमध्यतः ॥ १४ ॥

    dvijāśca nyavasaṃstatra caturvedaparāyaṇāḥ || evaṃ sa rājyaṃ kurvāṇo rātrau tu svapnamadhyataḥ || 14 ||

    [14] वहाँ चारों वेदों में निपुण ब्राह्मण भी रहते थे। इस प्रकार राज्य करते हुए एक रात राजा ने स्वप्न में

  15. ददर्श जनकं स्वं तु अधोयोनिगतं नृपः ॥ एवं दृष्ट्वा तु तं तत्र विस्मयोत्फुल्ललोचनः ॥ १५ ॥

    dadarśa janakaṃ svaṃ tu adhoyonigataṃ nṛpaḥ || evaṃ dṛṣṭvā tu taṃ tatra vismayotphullalocanaḥ || 15 ||

    [15] अपने पिता को नीच योनि (नरक) में पड़ा देखा। उन्हें ऐसी दशा में देखकर राजा आश्चर्य से आँखें फाड़े रह गए।

  16. कथयामास वृत्तान्तं द्विजाग्रे स्वप्नसंभवम् ॥ राजोवाच ॥ मया तु स्वपिता दृष्टो नरके पतितो द्विजाः ॥ १६ ॥

    kathayāmāsa vṛttāntaṃ dvijāgre svapnasaṃbhavam || rājovāca || mayā tu svapitā dṛṣṭo narake patito dvijāḥ || 16 ||

    [16] उन्होंने स्वप्न का सारा हाल ब्राह्मणों के सामने कहा। राजा बोले — हे ब्राह्मणो, मैंने अपने पिता को नरक में गिरा हुआ देखा।

  17. तारयस्वेति मां तात अधोयोनिगतं सुत ॥ इति ब्रुवाणः स तदा मया दृष्टः पिता स्वयम् ॥ १७ ॥

    tārayasveti māṃ tāta adhoyonigataṃ suta || iti bruvāṇaḥ sa tadā mayā dṛṣṭaḥ pitā svayam || 17 ||

    [17] वे कह रहे थे — “बेटा, मैं नीच योनि में पड़ा हूँ, मुझे तार दो।” ऐसा कहते हुए मैंने स्वयं अपने पिता को देखा।

  18. तदाप्रभृति भो विप्रा नाहं शर्म लभाम्यहो ॥ एतद्राज्यं मम महदसह्यमसुखं तथा ॥ १८ ॥

    tadāprabhṛti bho viprā nāhaṃ śarma labhāmyaho || etadrājyaṃ mama mahadasahyamasukhaṃ tathā || 18 ||

    [18] हे विप्रो, तब से मुझे ज़रा भी चैन नहीं है। यह बड़ा राज्य भी मुझे असहनीय और दुःखदायी लगता है।

  19. अश्वा गजा रथाश्चैव न मां रोचन्ति सर्वथा ॥ न कोशोऽपि सुखायालं न किंचित्सुखदं मम ॥ १९ ॥

    aśvā gajā rathāścaiva na māṃ rocanti sarvathā || na kośo'pi sukhāyālaṃ na kiṃcitsukhadaṃ mama || 19 ||

    [19] घोड़े, हाथी, रथ — कुछ भी मुझे अच्छा नहीं लगता। ख़ज़ाना भी सुख नहीं देता; मुझे कुछ भी सुखद नहीं लगता।

  20. न दारा न सुता मह्यं रोचन्ते द्विजसत्तमाः ॥ किं करोमि क्व गच्छामि शरीरं मे तु दह्यते ॥ २० ॥

    na dārā na sutā mahyaṃ rocante dvijasattamāḥ || kiṃ karomi kva gacchāmi śarīraṃ me tu dahyate || 20 ||

    [20] हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो, पत्नी और पुत्र भी मुझे अच्छे नहीं लगते। मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ? मेरा शरीर जल रहा है।

  21. दानं व्रतं तपो योगो येनैव मम पूर्वजाः ॥ मोक्षमायान्ति विप्रेन्द्रास्तदेव कथयन्तु मे ॥ २१ ॥

    dānaṃ vrataṃ tapo yogo yenaiva mama pūrvajāḥ || mokṣamāyānti viprendrāstadeva kathayantu me || 21 ||

    [21] हे विप्रश्रेष्ठो, वह दान, व्रत, तप या योग बताइए जिससे मेरे पूर्वजों को मुक्ति मिले।

  22. किं तेन जीवता लोके सुपुत्रेण बलीयसा ॥ पिता तु यस्य नरके तस्य जन्म निरर्थकम् ॥ २२ ॥

    kiṃ tena jīvatā loke suputreṇa balīyasā || pitā tu yasya narake tasya janma nirarthakam || 22 ||

    [22] जिसका पिता नरक में हो, उस बलवान सुपुत्र के जीने से संसार में क्या लाभ? उसका जन्म व्यर्थ है।

  23. ब्राह्मणा ऊचुः ॥ पर्वतस्य मुनेरत्र आश्रमो निकटे नृप ॥ गम्यतां राजशार्दूल भूतं भव्यं विजानतः ॥ २३ ॥

    brāhmaṇā ūcuḥ || parvatasya muneratra āśramo nikaṭe nṛpa || gamyatāṃ rājaśārdūla bhūtaṃ bhavyaṃ vijānataḥ || 23 ||

    [23] ब्राह्मण बोले — हे राजा, यहाँ पास ही पर्वत मुनि का आश्रम है, जो भूत और भविष्य दोनों जानते हैं। हे राजसिंह, वहाँ जाइए।

  24. तेषां श्रुत्वा ततो वाक्यं विषण्णो राजसत्तमः ॥ जगाम तत्र यत्रासौ आश्रमे पर्वतो मुनिः ॥ २४ ॥

    teṣāṃ śrutvā tato vākyaṃ viṣaṇṇo rājasattamaḥ || jagāma tatra yatrāsau āśrame parvato muniḥ || 24 ||

    [24] उनकी बात सुनकर दुखी राजा वहाँ गए जहाँ आश्रम में पर्वत मुनि रहते थे।

  25. ब्राह्मणैर्वेष्टितः शान्तैः प्रजाभिश्च समन्ततः ॥ आश्रमो विपुलस्तस्य मुनिभिः सन्निषेवितः ॥ २५ ॥

    brāhmaṇairveṣṭitaḥ śāntaiḥ prajābhiśca samantataḥ || āśramo vipulastasya munibhiḥ sanniṣevitaḥ || 25 ||

    [25] वह विशाल आश्रम शांत ब्राह्मणों और प्रजाजनों से चारों ओर घिरा था और बहुत-से मुनि वहाँ रहते थे।

  26. ऋग्वेदिभिर्याजुषैश्च सामाथर्वणकोविदैः ॥ वेष्टितो मुनिभिस्तत्र द्वितीय इव पद्मजः ॥ २६ ॥

    ṛgvedibhiryājuṣaiśca sāmātharvaṇakovidaiḥ || veṣṭito munibhistatra dvitīya iva padmajaḥ || 26 ||

    [26] ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद के ज्ञाता मुनियों से घिरे पर्वत मुनि वहाँ दूसरे ब्रह्मा जैसे लग रहे थे।

  27. दृष्ट्वा तं मुनिशार्दूलं राजा वैखानसस्तदा ॥ जगाम चावनिं मूर्ध्ना दण्डवत्प्रणनाम च ॥ २७ ॥

    dṛṣṭvā taṃ muniśārdūlaṃ rājā vaikhānasastadā || jagāma cāvaniṃ mūrdhnā daṇḍavatpraṇanāma ca || 27 ||

    [27] उन श्रेष्ठ मुनि को देखकर राजा वैखानस ने धरती पर सिर रखकर दंडवत प्रणाम किया।

  28. पप्रच्छ कुशलं तस्य सप्तस्वङ्गेष्वसौ मुनिः ॥ राज्ये निष्कण्टकत्वं च राजसौख्यसमन्वितम् ॥ २८ ॥

    papraccha kuśalaṃ tasya saptasvaṅgeṣvasau muniḥ || rājye niṣkaṇṭakatvaṃ ca rājasaukhyasamanvitam || 28 ||

    [28] मुनि ने राजा से राज्य के सातों अंगों की कुशलता पूछी, और पूछा कि राज्य निष्कंटक है और राज-सुख ठीक है न?

  29. राजोवाच ॥ तव प्रसादात्कुशलमङ्गेषु मम सप्तसु ॥ विभवेष्वनुकूलेषु कश्चिद्विघ्न उपस्थितः ॥ २९ ॥

    rājovāca || tava prasādātkuśalamaṅgeṣu mama saptasu || vibhaveṣvanukūleṣu kaścidvighna upasthitaḥ || 29 ||

    [29] राजा बोले — आपकी कृपा से मेरे राज्य के सातों अंग कुशल हैं और वैभव अनुकूल है, फिर भी एक विघ्न आ खड़ा हुआ है।

  30. एतं मे संशयं ब्रह्मन्प्रष्टुं त्वामहमागतः ॥ एवं श्रुत्वा नृपवचः पर्वतो मुनिसत्तमः ॥ ३० ॥

    etaṃ me saṃśayaṃ brahmanpraṣṭuṃ tvāmahamāgataḥ || evaṃ śrutvā nṛpavacaḥ parvato munisattamaḥ || 30 ||

    [30] हे ब्रह्मन, यही शंका पूछने मैं आपके पास आया हूँ। राजा की बात सुनकर श्रेष्ठ मुनि पर्वत ने

  31. ध्यानस्तिमितनेत्रोऽसौ भूतं भव्यं व्यचिन्तयत् ॥ मुहूर्तमेकं ध्यात्वा च प्रत्युवाच नृपोत्तमम् ॥ ३१ ॥

    dhyānastimitanetro'sau bhūtaṃ bhavyaṃ vyacintayat || muhūrtamekaṃ dhyātvā ca pratyuvāca nṛpottamam || 31 ||

    [31] ध्यान में आँखें स्थिर करके भूत और भविष्य का विचार किया। एक मुहूर्त ध्यान करके उन्होंने राजा को उत्तर दिया।

  32. मुनिरुवाच ॥ जानेऽहं तव राजेन्द्र पितुः पापं विकर्मणः ॥ पूर्वजन्मनि ते पित्रा स्वपत्नीद्वयमध्यतः ॥ ३२ ॥

    muniruvāca || jāne'haṃ tava rājendra pituḥ pāpaṃ vikarmaṇaḥ || pūrvajanmani te pitrā svapatnīdvayamadhyataḥ || 32 ||

    [32] मुनि बोले — हे राजेन्द्र, मैं तुम्हारे पिता का बुरा कर्म जानता हूँ। पिछले जन्म में तुम्हारे पिता ने अपनी दो पत्नियों में से

  33. कामासक्तेन चैकस्या ऋतुभङ्गः कृतः स्त्रियः ॥ त्राहि देहीति जल्पन्त्या अन्यस्याश्च नराधिप ॥ ३३ ॥

    kāmāsaktena caikasyā ṛtubhaṅgaḥ kṛtaḥ striyaḥ || trāhi dehīti jalpantyā anyasyāśca narādhipa || 33 ||

    [33] एक पर काम-आसक्त होकर दूसरी पत्नी का ऋतु-काल भंग किया (उसका अधिकार छीना), जबकि वह “बचाओ, दो” कहती रही।

  34. कर्मणा तेन सततं नरके पातितो ह्ययम् ॥ राजोवाच ॥ केन व्रतेन दानेन मोक्षस्तस्य भवेन्मुने ॥ ३४ ॥

    karmaṇā tena satataṃ narake pātito hyayam || rājovāca || kena vratena dānena mokṣastasya bhavenmune || 34 ||

    [34] हे राजन, उसी कर्म के कारण वे नरक में गिरे हैं। राजा बोले — हे मुनि, किस व्रत या दान से उनकी मुक्ति होगी?

  35. निरयात्पापसंयुक्तात्तन्ममाचक्ष्व पृच्छतः ॥ मुनिरुवाच ॥ मार्गशीर्षे सिते पक्षे मोक्षा नाम्नी हरेस्तिथिः ॥ ३५ ॥

    nirayātpāpasaṃyuktāttanmamācakṣva pṛcchataḥ || muniruvāca || mārgaśīrṣe site pakṣe mokṣā nāmnī harestithiḥ || 35 ||

    [35] पाप से भरे उस नरक से छुटकारे का उपाय मुझे बताइए। मुनि बोले — मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष में हरि की ‘मोक्षा’ नाम की तिथि है।

  36. सर्वैस्तु तद्व्रतं कृत्वा पित्रे पुण्यं प्रदीयताम् ॥ तस्याः पुण्यप्रभावेण मोक्षस्तस्य भविष्यति ॥ ३६ ॥

    sarvaistu tadvrataṃ kṛtvā pitre puṇyaṃ pradīyatām || tasyāḥ puṇyaprabhāveṇa mokṣastasya bhaviṣyati || 36 ||

    [36] सब लोग मिलकर वह व्रत करें और उसका पुण्य पिता को अर्पित करें। उस पुण्य के प्रभाव से उनकी मुक्ति हो जाएगी।

  37. मुनेर्वाक्यं ततः श्रुत्वा नृपः स्वगृहमागतः ॥ आग्रहायणिकी शुक्ला प्राप्ता भरतसत्तम ॥ ३७ ॥

    munervākyaṃ tataḥ śrutvā nṛpaḥ svagṛhamāgataḥ || āgrahāyaṇikī śuklā prāptā bharatasattama || 37 ||

    [37] मुनि की बात सुनकर राजा अपने घर लौट आए। हे भरतश्रेष्ठ, जब अगहन की शुक्ल एकादशी आई,

  38. अन्तःपुरचरैः सर्वैः पुत्रैर्दारैस्तदा नृपः ॥ व्रतं कृत्वा विधानेन पित्रे पुण्यं ददौ नृपः ॥ ३८ ॥

    antaḥpuracaraiḥ sarvaiḥ putrairdāraistadā nṛpaḥ || vrataṃ kṛtvā vidhānena pitre puṇyaṃ dadau nṛpaḥ || 38 ||

    [38] तब राजा ने रनिवास के सब लोगों, पुत्रों और पत्नियों के साथ विधि से व्रत किया और उसका पुण्य पिता को दे दिया।

  39. तस्मिन्दत्ते तदा पुण्ये पुष्पवृष्टिरभूद्दिवः ॥ वैखानसपिता तेन गतः स्वर्गं स्तुतो गणैः ॥ ३९ ॥

    tasmindatte tadā puṇye puṣpavṛṣṭirabhūddivaḥ || vaikhānasapitā tena gataḥ svargaṃ stuto gaṇaiḥ || 39 ||

    [39] पुण्य देते ही आकाश से फूलों की वर्षा हुई। वैखानस के पिता उस पुण्य से, देवगणों की स्तुति पाते हुए, स्वर्ग चले गए।

  40. राजानमन्तरिक्षाच्च शुद्धां गिरमभाषत ॥ स्वस्त्यस्तु ते पुत्र सदेत्यथ स त्रिदिवं गतः ॥ ४० ॥

    rājānamantarikṣācca śuddhāṃ giramabhāṣata || svastyastu te putra sadetyatha sa tridivaṃ gataḥ || 40 ||

    [40] उन्होंने आकाश से राजा से पवित्र वाणी में कहा — “बेटा, तुम्हारा सदा कल्याण हो”, और फिर स्वर्ग चले गए।

  41. एवं यः कुरुते राजन्मोक्षामेकादशीमिमाम् ॥ तस्य पापं क्षयं याति मृतो मोक्षमवाप्नुयात् ॥ ४१ ॥

    evaṃ yaḥ kurute rājanmokṣāmekādaśīmimām || tasya pāpaṃ kṣayaṃ yāti mṛto mokṣamavāpnuyāt || 41 ||

    [41] हे राजन, जो इस मोक्षा एकादशी का व्रत करता है, उसके पाप नष्ट हो जाते हैं और मृत्यु के बाद उसे मोक्ष मिलता है।

  42. नातः परतरा काचिन्मोक्षदा विमला शुभा ॥ पुण्यसंख्यां तु तेषां वै न जानेऽहं तु यैः कृता ॥ ४२ ॥

    nātaḥ paratarā kācinmokṣadā vimalā śubhā || puṇyasaṃkhyāṃ tu teṣāṃ vai na jāne'haṃ tu yaiḥ kṛtā || 42 ||

    [42] इससे बढ़कर मोक्ष देने वाली, निर्मल और शुभ कोई तिथि नहीं है। जिन्होंने यह व्रत किया, उनके पुण्य की गिनती मैं भी नहीं जानता।

  43. पठनाच्छ्रवणाद्वास्या वाजपेयफलं लभेत् ॥ चिन्तामणिसमा ह्येषा स्वर्गमोक्षप्रदायिनी ॥ ४३ ॥

    paṭhanācchravaṇādvāsyā vājapeyaphalaṃ labhet || cintāmaṇisamā hyeṣā svargamokṣapradāyinī || 43 ||

    [43] इसे पढ़ने या सुनने से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है। यह चिंतामणि के समान है, स्वर्ग और मोक्ष देने वाली है।

  44. इति श्रीब्रह्माण्डपुराणे मार्गशीर्षशुक्लैकादश्यां मोक्षानाम्न्यां माहात्म्यं संपूर्णम् ॥

    iti śrībrahmāṇḍapurāṇe mārgaśīrṣaśuklaikādaśyāṃ mokṣānāmnyāṃ māhātmyaṃ saṃpūrṇam ||

    [इति] इस प्रकार श्री ब्रह्माण्ड पुराण में मार्गशीर्ष शुक्ल ‘मोक्षा’ एकादशी का माहात्म्य पूरा हुआ।

    टिप्पणी: मूल में समाप्ति-पंक्ति “…माहात्म्यं सं०” संक्षेप में छपी है; ‘संपूर्णम्’ हमने पूरा लिखा है।

पुत्रदा एकादशी कथा (पौष शुक्ल) (56 श्लोक)

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  1. युधिष्ठिर उवाच ॥ कथिता वै त्वया कृष्ण सफलैकादशी शुभा ॥ कथयस्व प्रसादेन शुक्ला पौषस्य या भवेत् ॥ १ ॥

    yudhiṣṭhira uvāca || kathitā vai tvayā kṛṣṇa saphalaikādaśī śubhā || kathayasva prasādena śuklā pauṣasya yā bhavet || 1 ||

    [1] युधिष्ठिर बोले — हे कृष्ण, आपने शुभ सफला एकादशी की कथा सुनाई। अब कृपा करके पौष शुक्ल पक्ष की एकादशी के बारे में बताइए।

  2. किं नाम को विधिस्तस्याः को देवस्तत्र पूज्यते ॥ कस्मै तुष्टो हृषीकेश त्वमेव पुरुषोत्तम ॥ २ ॥

    kiṃ nāma ko vidhistasyāḥ ko devastatra pūjyate || kasmai tuṣṭo hṛṣīkeśa tvameva puruṣottama || 2 ||

    [2] उसका नाम क्या है, विधि क्या है, उसमें किस देवता की पूजा होती है? हे हृषीकेश, हे पुरुषोत्तम, उस व्रत से आप किस पर प्रसन्न होते हैं?

  3. श्रीकृष्ण उवाच ॥ शृणु राजन्प्रवक्ष्यामि शुक्ला पौषस्य या भवेत् ॥ तस्या विधिं महाराज लोकानां च हिताय वै ॥ ३ ॥

    śrīkṛṣṇa uvāca || śṛṇu rājanpravakṣyāmi śuklā pauṣasya yā bhavet || tasyā vidhiṃ mahārāja lokānāṃ ca hitāya vai || 3 ||

    [3] श्रीकृष्ण बोले — हे राजन, सुनो, मैं पौष शुक्ल की एकादशी और उसकी विधि लोगों के भले के लिए बताता हूँ।

  4. पूर्वेण विधिना राजन्कर्तव्यैषा प्रयत्नतः ॥ पुत्रदेति च नाम्नासौ सर्वपापहरा वरा ॥ ४ ॥

    pūrveṇa vidhinā rājankartavyaiṣā prayatnataḥ || putradeti ca nāmnāsau sarvapāpaharā varā || 4 ||

    [4] हे राजन, इसे पहले बताई गई विधि से ही ध्यानपूर्वक करना चाहिए। इसका नाम ‘पुत्रदा’ है; यह सब पाप हरने वाली श्रेष्ठ एकादशी है।

  5. नारायणोऽधिदेवोऽस्याः कामदः सिद्धिदायकः ॥ नातः परतरा काचित्त्रैलोक्ये सचराचरे ॥ ५ ॥

    nārāyaṇo'dhidevo'syāḥ kāmadaḥ siddhidāyakaḥ || nātaḥ paratarā kācittrailokye sacarācare || 5 ||

    [5] इसके अधिदेवता नारायण हैं, जो मनोकामना पूरी करते और सिद्धि देते हैं। चर-अचर सहित तीनों लोकों में इससे बढ़कर कुछ नहीं।

  6. विद्यावन्तं यशस्वन्तं लक्ष्मीवन्तं करोत्यसौ ॥ शृणु राजन्प्रवक्ष्यामि कथां पापहरां पराम् ॥ ६ ॥

    vidyāvantaṃ yaśasvantaṃ lakṣmīvantaṃ karotyasau || śṛṇu rājanpravakṣyāmi kathāṃ pāpaharāṃ parām || 6 ||

    [6] यह मनुष्य को विद्यावान, यशस्वी और लक्ष्मीवान बनाती है। हे राजन, सुनो, मैं पाप हरने वाली श्रेष्ठ कथा सुनाता हूँ।

  7. पुरी भद्रावती नाम्नी राजा तत्र सुकेतुमान् ॥ तस्य राज्ञोऽथ राज्ञी च शैब्या नाम्नीति विश्रुता ॥ ७ ॥

    purī bhadrāvatī nāmnī rājā tatra suketumān || tasya rājño'tha rājñī ca śaibyā nāmnīti viśrutā || 7 ||

    [7] भद्रावती नाम की नगरी में सुकेतुमान नाम के राजा थे। उनकी रानी शैब्या नाम से प्रसिद्ध थीं।

  8. पुत्रहीनेन राज्ञा च कालो नीतो मनोरथैः ॥ नैवात्मजं नृपो लेभे वंशकर्तारमेव च ॥ ८ ॥

    putrahīnena rājñā ca kālo nīto manorathaiḥ || naivātmajaṃ nṛpo lebhe vaṃśakartārameva ca || 8 ||

    [8] राजा के कोई पुत्र नहीं था; उनका समय बस आशा करते-करते बीत गया। उन्हें वंश चलाने वाला पुत्र नहीं मिला।

  9. तेनैव राज्ञा धर्मेण चिन्तितं बहुकालतः ॥ किं करोमि क्व गच्छामि सुतप्राप्तिः कथं भवेत् ॥ ९ ॥

    tenaiva rājñā dharmeṇa cintitaṃ bahukālataḥ || kiṃ karomi kva gacchāmi sutaprāptiḥ kathaṃ bhavet || 9 ||

    [9] धर्मात्मा राजा बहुत समय तक सोचते रहे — “मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ? पुत्र कैसे मिले?”

  10. न राष्ट्रे न पुरे सौख्यं लेभे राजा सुकेतुमान् ॥ शैब्यया कान्तया सार्द्धं प्रत्यहं दुःखितोऽभवत् ॥ १० ॥

    na rāṣṭre na pure saukhyaṃ lebhe rājā suketumān || śaibyayā kāntayā sārddhaṃ pratyahaṃ duḥkhito'bhavat || 10 ||

    [10] राजा सुकेतुमान को न राज्य में सुख मिला न नगर में। अपनी प्रिय रानी शैब्या के साथ वे हर दिन दुखी रहते थे।

  11. तावुभौ दम्पती नित्यं चिन्ताशोकपरायणौ ॥ पितरोऽस्य जलं दत्तं कवोष्णमुपभुञ्जते ॥ राज्ञः पश्चान्न पश्यामो योऽस्मान्संतर्पयिष्यति ॥ ११ ॥

    tāvubhau dampatī nityaṃ cintāśokaparāyaṇau || pitaro'sya jalaṃ dattaṃ kavoṣṇamupabhuñjate || rājñaḥ paścānna paśyāmo yo'smānsaṃtarpayiṣyati || 11 ||

    [11] पति-पत्नी दोनों सदा चिंता और शोक में डूबे रहते। उनके पितर भी उनका दिया जल (तर्पण) गुनगुना-सा (दुःख की आहों से तपा) ग्रहण करते और सोचते — “इस राजा के बाद हमें कोई नहीं दिखता जो हमें तृप्त करेगा।”

    टिप्पणी: मूल में यह श्लोक छह पादों का है, जैसा छपा है वैसा दिया है। ‘कवोष्ण’ = गुनगुना; अर्थ यह कि पितर दुःखी मन से तर्पण ग्रहण करते हैं।

  12. इत्येवं संस्मरन्तोऽस्य पितरो दुःखिनोऽभवन् ॥ न बान्धवा न मित्राणि नामात्याः सुहृदस्तथा ॥ १२ ॥

    ityevaṃ saṃsmaranto'sya pitaro duḥkhino'bhavan || na bāndhavā na mitrāṇi nāmātyāḥ suhṛdastathā || 12 ||

    [12] यह सोचकर उनके पितर भी दुखी हो गए। राजा को न बंधु अच्छे लगते, न मित्र, न मंत्री, न हितैषी,

  13. रोचन्ते तस्य भूपस्य न गजाश्वपदातयः ॥ नैराश्यं भूपतेस्तस्य मनस्येवमजायत ॥ १३ ॥

    rocante tasya bhūpasya na gajāśvapadātayaḥ || nairāśyaṃ bhūpatestasya manasyevamajāyata || 13 ||

    [13] न हाथी, घोड़े और पैदल सेना ही भाते। राजा के मन में ऐसी निराशा भर गई।

  14. नरस्य पुत्रहीनस्य नास्ति वै जन्मनः फलम् ॥ अपुत्रस्य गृहं शून्यं हृदयं दुःखितं सदा ॥ १४ ॥

    narasya putrahīnasya nāsti vai janmanaḥ phalam || aputrasya gṛhaṃ śūnyaṃ hṛdayaṃ duḥkhitaṃ sadā || 14 ||

    [14] वे सोचते — “पुत्रहीन मनुष्य के जन्म का कोई फल नहीं। बिना पुत्र के घर सूना और हृदय सदा दुखी रहता है।

  15. पितृदेवमनुष्याणां नानृणित्वं सुतं विना ॥ तस्मात्सर्वप्रयत्नेन सुतमुत्पादयेन्नरः ॥ १५ ॥

    pitṛdevamanuṣyāṇāṃ nānṛṇitvaṃ sutaṃ vinā || tasmātsarvaprayatnena sutamutpādayennaraḥ || 15 ||

    [15] पुत्र के बिना पितरों, देवों और मनुष्यों के ऋण से मुक्ति नहीं होती; इसलिए मनुष्य को हर प्रयत्न से संतान पानी चाहिए।

  16. इहलोके यशस्तेषां परलोके शुभा गतिः ॥ येषां तु पुण्यकर्तॄणां पुत्रजन्म गृहे भवेत् ॥ १६ ॥

    ihaloke yaśasteṣāṃ paraloke śubhā gatiḥ || yeṣāṃ tu puṇyakartṝṇāṃ putrajanma gṛhe bhavet || 16 ||

    [16] जिन पुण्यात्माओं के घर पुत्र जन्म लेता है, उन्हें इस लोक में यश और परलोक में शुभ गति मिलती है।

  17. आयुरारोग्यसंपत्तिस्तेषां गेहे प्रवर्तते ॥ पुत्राः पौत्राश्च लोकाश्च भवेयुः पुण्यकर्मणाम् ॥ १७ ॥

    āyurārogyasaṃpattisteṣāṃ gehe pravartate || putrāḥ pautrāśca lokāśca bhaveyuḥ puṇyakarmaṇām || 17 ||

    [17] उन पुण्य-कर्म करने वालों के घर आयु, आरोग्य और संपत्ति बनी रहती है, और पुत्र-पौत्र होते हैं।

  18. पुण्यं विना न च प्राप्तिर्विष्णुभक्तिं विना तथा ॥ पुत्राणां संपदो वापि विद्यायाश्चेति मे मतिः ॥ १८ ॥

    puṇyaṃ vinā na ca prāptirviṣṇubhaktiṃ vinā tathā || putrāṇāṃ saṃpado vāpi vidyāyāśceti me matiḥ || 18 ||

    [18] मेरा मानना है कि पुण्य और विष्णु-भक्ति के बिना पुत्र, संपत्ति या विद्या नहीं मिलती।”

  19. एवं चिन्तयमानोऽसौ राजा शर्म न लब्धवान् ॥ प्रत्यूषे चिन्तयद्राजा निशीथे चिन्तयत्तथा ॥ १९ ॥

    evaṃ cintayamāno'sau rājā śarma na labdhavān || pratyūṣe cintayadrājā niśīthe cintayattathā || 19 ||

    [19] ऐसा सोचते-सोचते राजा को चैन नहीं मिला। वे सुबह भी यही सोचते, आधी रात को भी यही सोचते।

  20. ततश्चात्मविनाशं वै विचार्याथ सुकेतुमान् ॥ आत्मघाते दुर्गतिं च चिन्तयित्वा तदा नृपः ॥ २० ॥

    tataścātmavināśaṃ vai vicāryātha suketumān || ātmaghāte durgatiṃ ca cintayitvā tadā nṛpaḥ || 20 ||

    [20] तब राजा सुकेतुमान ने अपने प्राण त्यागने तक का विचार किया, पर फिर सोचा कि आत्मघात से दुर्गति होती है।

  21. दृष्ट्वात्मदेहं प्रक्षीणमपुत्रत्वं तथैव च ॥ पुनर्विचार्यात्मबुद्ध्या ह्यात्मनो हितकारणम् ॥ २१ ॥

    dṛṣṭvātmadehaṃ prakṣīṇamaputratvaṃ tathaiva ca || punarvicāryātmabuddhyā hyātmano hitakāraṇam || 21 ||

    [21] अपने दुर्बल होते शरीर और पुत्रहीनता को देखकर उन्होंने फिर अपनी बुद्धि से अपने हित का उपाय सोचा।

  22. अश्वारूढस्ततो राजा जगाम गहनं वनम् ॥ पुरोहितादयः सर्वे न जानन्ति गतं नृपम् ॥ २२ ॥

    aśvārūḍhastato rājā jagāma gahanaṃ vanam || purohitādayaḥ sarve na jānanti gataṃ nṛpam || 22 ||

    [22] फिर राजा घोड़े पर चढ़कर घने वन में चले गए। पुरोहित आदि किसी को पता नहीं चला कि राजा कहाँ गए।

  23. गम्भीरे विपिने राजा मृगपक्षिनिषेविते ॥ विचचार तदा तस्मिन्वनवृक्षान्विलोकयन् ॥ २३ ॥

    gambhīre vipine rājā mṛgapakṣiniṣevite || vicacāra tadā tasminvanavṛkṣānvilokayan || 23 ||

    [23] पशु-पक्षियों से भरे उस गहरे वन में राजा पेड़ों को देखते हुए घूमने लगे —

  24. वटानश्वत्थान्बिल्वांश्च खर्जूरान्पनसांस्तथा ॥ बकुलांश्च सदापर्णांस्तिन्दुकांस्तिलकानपि ॥ २४ ॥

    vaṭānaśvatthānbilvāṃśca kharjūrānpanasāṃstathā || bakulāṃśca sadāparṇāṃstindukāṃstilakānapi || 24 ||

    [24] बड़, पीपल, बेल, खजूर, कटहल, मौलसिरी, सदापर्णी, तेंदू और तिलक के पेड़;

  25. शालांस्तालांस्तमालांश्च ददर्श सरलान्नृपः ॥ इङ्गुदीककुभांश्चैव श्लेष्मातकबिभीतकान् ॥ २५ ॥

    śālāṃstālāṃstamālāṃśca dadarśa saralānnṛpaḥ || iṅgudīkakubhāṃścaiva śleṣmātakabibhītakān || 25 ||

    [25] साल, ताड़, तमाल, सरल (चीड़), इंगुदी, अर्जुन, लसोड़ा और बहेड़ा;

  26. शल्लकीकरमर्दांश्च पाटलान्खदिरानपि ॥ शाकांश्चैव पलाशांश्च शोभितान्ददृशे पुनः ॥ २६ ॥

    śallakīkaramardāṃśca pāṭalānkhadirānapi || śākāṃścaiva palāśāṃśca śobhitāndadṛśe punaḥ || 26 ||

    [26] सलई, करौंदा, पाटल, खैर, सागौन और पलाश — इन सुंदर पेड़ों को उन्होंने देखा।

  27. मृगव्याघ्रवराहांश्च सिंहाञ्शाखामृगानपि ॥ गवयान्कृष्णसारांश्च सृगालाञ्शशकानपि ॥ २७ ॥

    mṛgavyāghravarāhāṃśca siṃhāñśākhāmṛgānapi || gavayānkṛṣṇasārāṃśca sṛgālāñśaśakānapi || 27 ||

    [27] हिरण, बाघ, सूअर, सिंह, बंदर, नीलगाय, काले हिरण, सियार और खरगोश;

  28. वनमार्जारकान्क्रूराञ्शल्लकांश्चमरानपि ॥ ददर्श भुजगान्राजा वल्मीकादभिनिःसृतान् ॥ २८ ॥

    vanamārjārakānkrūrāñśallakāṃścamarānapi || dadarśa bhujagānrājā valmīkādabhiniḥsṛtān || 28 ||

    [28] क्रूर वन-बिलाव, साही, चँवरी गाय, और बाँबियों से निकलते साँप भी राजा ने देखे।

  29. तथा वनगजान्मत्तान्कलभैः सह संगतान् ॥ यूथपांश्च चतुर्दन्तान्करिणीगणमध्यगान् ॥ २९ ॥

    tathā vanagajānmattānkalabhaiḥ saha saṃgatān || yūthapāṃśca caturdantānkariṇīgaṇamadhyagān || 29 ||

    [29] अपने बच्चों के साथ मस्त जंगली हाथी, और हथिनियों के झुंड के बीच चार दाँतों वाले यूथपति हाथी भी देखे।

  30. तान्दृष्ट्वा चिन्तयामास स्वात्मनः स गजान्नृपः ॥ तेषां स विचरन्मध्ये राजा शोभामवाप ह ॥ ३० ॥

    tāndṛṣṭvā cintayāmāsa svātmanaḥ sa gajānnṛpaḥ || teṣāṃ sa vicaranmadhye rājā śobhāmavāpa ha || 30 ||

    [30] उन हाथियों को देखकर राजा को अपने हाथियों की याद आई; उनके बीच घूमते हुए राजा शोभा पाने लगे।

  31. महदाश्चर्यसंयुक्तं ददर्श विपिनं नृपः ॥ क्वचिच्छिवारुतं शृण्वन्नुलूकविरुतं तथा ॥ ३१ ॥

    mahadāścaryasaṃyuktaṃ dadarśa vipinaṃ nṛpaḥ || kvacicchivārutaṃ śṛṇvannulūkavirutaṃ tathā || 31 ||

    [31] राजा ने बड़े आश्चर्यों से भरा वह वन देखा; कहीं सियारों की आवाज़ सुनी, कहीं उल्लुओं की।

  32. तांस्तान्पक्षिमृगान्पश्यन्बभ्राम वनमध्यगः ॥ एवं ददर्श गहनं नृपो मध्यंगते रवौ ॥ ३२ ॥

    tāṃstānpakṣimṛgānpaśyanbabhrāma vanamadhyagaḥ || evaṃ dadarśa gahanaṃ nṛpo madhyaṃgate ravau || 32 ||

    [32] तरह-तरह के पशु-पक्षी देखते हुए वे वन में भटकते रहे; इस तरह घने वन में घूमते-घूमते दोपहर हो गई।

  33. क्षुत्तृड्भ्यां पीडितो राजा इतश्चेतश्च धावति ॥ चिन्तयामास नृपतिः संशुष्कगलकन्धरः ॥ ३३ ॥

    kṣuttṛḍbhyāṃ pīḍito rājā itaścetaśca dhāvati || cintayāmāsa nṛpatiḥ saṃśuṣkagalakandharaḥ || 33 ||

    [33] भूख-प्यास से व्याकुल राजा इधर-उधर दौड़ने लगे; गला सूख गया, तब वे सोचने लगे —

  34. मया तु किं कृतं कर्म प्राप्तं दुःखं यदीदृशम् ॥ मया वै तोषिता देवा यज्ञैः पूजाभिरेव च ॥ ३४ ॥

    mayā tu kiṃ kṛtaṃ karma prāptaṃ duḥkhaṃ yadīdṛśam || mayā vai toṣitā devā yajñaiḥ pūjābhireva ca || 34 ||

    [34] “मैंने ऐसा कौन-सा कर्म किया कि मुझे ऐसा दुःख मिला? मैंने तो यज्ञों और पूजा से देवताओं को प्रसन्न किया,

  35. तथैव ब्राह्मणा दानैस्तोषिता मृष्टभोजनैः ॥ प्रजाश्चैव यथाकालं पुत्रवत्परिपालिताः ॥ ३५ ॥

    tathaiva brāhmaṇā dānaistoṣitā mṛṣṭabhojanaiḥ || prajāścaiva yathākālaṃ putravatparipālitāḥ || 35 ||

    [35] दान और उत्तम भोजन से ब्राह्मणों को संतुष्ट किया, और प्रजा का समय पर पुत्र की तरह पालन किया।

  36. कस्माद्दुःखं मया प्राप्तमीदृशं दारुणं महत् ॥ इति चिन्तापरो राजा जगामाथाग्रतो वनम् ॥ ३६ ॥

    kasmādduḥkhaṃ mayā prāptamīdṛśaṃ dāruṇaṃ mahat || iti cintāparo rājā jagāmāthāgrato vanam || 36 ||

    [36] फिर मुझे इतना भारी और कठोर दुःख क्यों मिला?” इसी चिंता में डूबे राजा वन में आगे बढ़े।

  37. सुकृतस्य प्रभावेण सरो दृष्टं मनोरमम् ॥ मानसेन स्पर्द्धमानं पद्मिनीपरिशोभितम् ॥ ३७ ॥

    sukṛtasya prabhāveṇa saro dṛṣṭaṃ manoramam || mānasena sparddhamānaṃ padminīpariśobhitam || 37 ||

    [37] अपने पुण्य के प्रभाव से उन्हें एक मनोहर सरोवर दिखा, जो मानसरोवर से होड़ करता था और कमलों से सुशोभित था।

  38. कारण्डवैश्चक्रवाकै राजहंसैश्च नादितम् ॥ मकरैर्बहुभिर्मत्स्यैरन्यैर्जलचरैर्युतम् ॥ ३८ ॥

    kāraṇḍavaiścakravākai rājahaṃsaiśca nāditam || makarairbahubhirmatsyairanyairjalacarairyutam || 38 ||

    [38] उसमें कारंडव, चकवे और राजहंस चहक रहे थे, और मगर, बहुत-सी मछलियाँ तथा अन्य जलजीव थे।

  39. समीपे सरसस्तत्र मुनीनामाश्रमान्बहून् ॥ ददर्श राजा लक्ष्मीवान्निमित्तैः शुभशंसिभिः ॥ ३९ ॥

    samīpe sarasastatra munīnāmāśramānbahūn || dadarśa rājā lakṣmīvānnimittaiḥ śubhaśaṃsibhiḥ || 39 ||

    [39] सरोवर के पास राजा ने मुनियों के बहुत-से आश्रम देखे; उसी समय शुभ फल बताने वाले शकुन भी हुए —

  40. सव्यात्परतरं चक्षुरपसव्यस्तथा करः ॥ प्रास्फुरन्नृपतेस्तस्य कथयञ्शोभनं फलम् ॥ ४० ॥

    savyātparataraṃ cakṣurapasavyastathā karaḥ || prāsphurannṛpatestasya kathayañśobhanaṃ phalam || 40 ||

    [40] राजा की दाहिनी आँख और दाहिना हाथ फड़कने लगे, मानो शुभ फल की सूचना दे रहे हों।

  41. तस्य तीरे मुनीन्दृष्ट्वा कुर्वाणान्नैगमं जपम् ॥ अवतीर्य हयात्तस्मान्मुनीनामग्रतः स्थितः ॥ ४१ ॥

    tasya tīre munīndṛṣṭvā kurvāṇānnaigamaṃ japam || avatīrya hayāttasmānmunīnāmagrataḥ sthitaḥ || 41 ||

    [41] सरोवर के तट पर मुनियों को वेद-मंत्रों का जप करते देखकर राजा घोड़े से उतरे और मुनियों के सामने खड़े हुए।

  42. पृथक्पृथग्ववन्दे स मुनींस्तान्संशितव्रतान् ॥ कृताञ्जलिपुटो भूत्वा दण्डवच्च प्रणम्य सः ॥ ४२ ॥

    pṛthakpṛthagvavande sa munīṃstānsaṃśitavratān || kṛtāñjalipuṭo bhūtvā daṇḍavacca praṇamya saḥ || 42 ||

    [42] उन्होंने कठोर व्रत वाले उन सब मुनियों को अलग-अलग हाथ जोड़कर दंडवत प्रणाम किया।

  43. हर्षेण महताविष्टो बभूव नृपसत्तमः ॥ तमूचुस्तेऽपि मुनयः प्रसन्नाः स्मो वयं तव ॥ ४३ ॥

    harṣeṇa mahatāviṣṭo babhūva nṛpasattamaḥ || tamūcuste'pi munayaḥ prasannāḥ smo vayaṃ tava || 43 ||

    [43] श्रेष्ठ राजा बड़े हर्ष से भर गए। मुनि भी बोले — “हम तुमसे प्रसन्न हैं।

  44. कथयस्वाद्य वै राजन्यत्ते मनसि वर्तते ॥ राजोवाच ॥ के यूयमुग्रतपसः का आख्या भवतामपि ॥ ४४ ॥

    kathayasvādya vai rājanyatte manasi vartate || rājovāca || ke yūyamugratapasaḥ kā ākhyā bhavatāmapi || 44 ||

    [44] हे राजन, जो तुम्हारे मन में है, आज कहो।” राजा बोले — “कठोर तप वाले आप कौन हैं? आपके नाम क्या हैं?

  45. किमर्थं संगता यूयं वदन्तु मम तत्त्वतः ॥ मुनय ऊचुः ॥ विश्वेदेवा वयं राजन्स्नानार्थमिह चागताः ॥ ४५ ॥

    kimarthaṃ saṃgatā yūyaṃ vadantu mama tattvataḥ || munaya ūcuḥ || viśvedevā vayaṃ rājansnānārthamiha cāgatāḥ || 45 ||

    [45] आप सब यहाँ किस लिए इकट्ठे हुए हैं? मुझे सच-सच बताइए।” मुनि बोले — “हे राजन, हम विश्वेदेव हैं, यहाँ स्नान के लिए आए हैं।

  46. माघो निकटमायात एतस्मात्पञ्चमेऽहनि ॥ अद्य ह्येकादशी राजन्पुत्रदा नाम नामतः ॥ ४६ ॥

    māgho nikaṭamāyāta etasmātpañcame'hani || adya hyekādaśī rājanputradā nāma nāmataḥ || 46 ||

    [46] माघ महीना पास है — आज से पाँचवें दिन शुरू होगा। हे राजन, आज ‘पुत्रदा’ नाम की एकादशी है।

  47. पुत्रं ददात्यसौ शुक्ला पुत्रदा पुत्रमिच्छताम् ॥ राजोवाच ॥ ममापि यत्नो मुनयः सुतस्योत्पादने महान् ॥ ४७ ॥

    putraṃ dadātyasau śuklā putradā putramicchatām || rājovāca || mamāpi yatno munayaḥ sutasyotpādane mahān || 47 ||

    [47] यह शुक्ल एकादशी पुत्र चाहने वालों को पुत्र देती है, इसलिए पुत्रदा कहलाती है।” राजा बोले — “हे मुनियो, मैं भी पुत्र पाने के लिए बहुत प्रयत्न कर रहा हूँ।

  48. यदि तुष्टा भवन्तो मे पुत्रो वै दीयतां शुभः ॥ मुनय ऊचुः ॥ अस्मिन्नेव दिने राजन्पुत्रदा नाम वर्तते ॥ ४८ ॥

    yadi tuṣṭā bhavanto me putro vai dīyatāṃ śubhaḥ || munaya ūcuḥ || asminneva dine rājanputradā nāma vartate || 48 ||

    [48] यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मुझे शुभ पुत्र का वर दीजिए।” मुनि बोले — “हे राजन, आज ही वह पुत्रदा नाम की

  49. एकादशीति विख्याता क्रियतां व्रतमुत्तमम् ॥ आशीर्वादेन चास्माकं केशवस्य प्रसादतः ॥ ४९ ॥

    ekādaśīti vikhyātā kriyatāṃ vratamuttamam || āśīrvādena cāsmākaṃ keśavasya prasādataḥ || 49 ||

    [49] एकादशी है; यह उत्तम व्रत करो। हमारे आशीर्वाद और केशव की कृपा से

  50. अवश्यं तव राजेन्द्र पुत्रप्राप्तिर्भविष्यति ॥ इत्येवं वचनात्तेषां कृतं राज्ञा व्रतं शुभम् ॥ ५० ॥

    avaśyaṃ tava rājendra putraprāptirbhaviṣyati || ityevaṃ vacanātteṣāṃ kṛtaṃ rājñā vrataṃ śubham || 50 ||

    [50] हे राजेन्द्र, तुम्हें अवश्य पुत्र मिलेगा।” उनकी बात मानकर राजा ने वह शुभ व्रत किया।

  51. द्वादश्यां पारणं कृत्वा मुनीन्नत्वा पुनः पुनः ॥ आजगाम गृहं राजा राज्ञी गर्भं समादधे ॥ ५१ ॥

    dvādaśyāṃ pāraṇaṃ kṛtvā munīnnatvā punaḥ punaḥ || ājagāma gṛhaṃ rājā rājñī garbhaṃ samādadhe || 51 ||

    [51] द्वादशी को पारण करके और मुनियों को बार-बार प्रणाम करके राजा घर लौटे। फिर रानी ने गर्भ धारण किया।

  52. मुनीनां वचनेनैव पुत्रदायाः प्रसादतः ॥ पुत्रो जातस्तथा काले तेजस्वी पुण्यकर्मकृत् ॥ ५२ ॥

    munīnāṃ vacanenaiva putradāyāḥ prasādataḥ || putro jātastathā kāle tejasvī puṇyakarmakṛt || 52 ||

    [52] मुनियों के वचन और पुत्रदा एकादशी की कृपा से समय आने पर तेजस्वी, पुण्य कर्म करने वाला पुत्र जन्मा।

  53. पितरं तोषयामास प्रजापालो बभूव सः ॥ एतस्मात्कारणाद्राजन्कर्तव्यं पुत्रदाव्रतम् ॥ ५३ ॥

    pitaraṃ toṣayāmāsa prajāpālo babhūva saḥ || etasmātkāraṇādrājankartavyaṃ putradāvratam || 53 ||

    [53] उसने अपने पिता को प्रसन्न किया और प्रजा का पालक (राजा) बना। इसलिए हे राजन, पुत्रदा का व्रत करना चाहिए।

  54. लोकानां च हितार्थाय तवाग्रे कथितं मया ॥ एतद्व्रतं तु ये मर्त्याः कुर्वन्ति पुत्रदाभिधम् ॥ ५४ ॥

    lokānāṃ ca hitārthāya tavāgre kathitaṃ mayā || etadvrataṃ tu ye martyāḥ kurvanti putradābhidham || 54 ||

    [54] लोगों के भले के लिए मैंने यह तुम्हें सुनाया। जो मनुष्य यह पुत्रदा नाम का व्रत करते हैं,

  55. पुत्रं प्राप्येह लोके तु मृतास्ते स्वर्गगामिनः ॥ पठनाच्छ्रवणाद्राजन्नश्वमेधफलं लभेत् ॥ ५५ ॥

    putraṃ prāpyeha loke tu mṛtāste svargagāminaḥ || paṭhanācchravaṇādrājannaśvamedhaphalaṃ labhet || 55 ||

    [55] वे इस लोक में पुत्र पाते हैं और मृत्यु के बाद स्वर्ग जाते हैं। हे राजन, इसे पढ़ने या सुनने से अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है।

  56. इति श्रीभविष्योत्तरपुराणे पौषशुक्लैकादश्याः पुत्रदानाम्न्या माहात्म्यं संपूर्णम् ॥

    iti śrībhaviṣyottarapurāṇe pauṣaśuklaikādaśyāḥ putradānāmnyā māhātmyaṃ saṃpūrṇam ||

    [इति] इस प्रकार श्री भविष्योत्तर पुराण में पौष शुक्ल ‘पुत्रदा’ एकादशी का माहात्म्य पूरा हुआ।

    टिप्पणी: मूल में “श्रीभविष्योत्तरपु०” संक्षेप में छपा है; ‘पुराणे’ हमने पूरा लिखा है। (श्रावण शुक्ल की एकादशी को भी कई जगह पुत्रदा कहते हैं; यह कथा पौष शुक्ल वाली है।)

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